भारत-न्यूजीलैंड FTA: $2.8 अरब का व्यापार ढाई साल में दोगुना होने की उम्मीद, रोज़गार-निवेश को बड़ा बढ़ावा
सारांश
मुख्य बातें
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर कारोबारी जगत में उत्साह का माहौल है। BRISEC चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के चेयरमैन हरवंश चावला ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को कहा कि यह समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिए दीर्घकाल में अत्यंत सकारात्मक साबित होगा, हालाँकि इसके प्रत्यक्ष परिणाम अगले छह महीने से एक वर्ष के भीतर दिखने शुरू होंगे। वर्तमान में दोनों देशों के बीच सालाना द्विपक्षीय व्यापार लगभग $2.8 अरब डॉलर है, और विशेषज्ञों का मानना है कि यह आँकड़ा निर्धारित पाँच वर्षों की बजाय दो से ढाई वर्षों में ही दोगुना हो सकता है।
व्यापार विस्तार का अनुमान
चावला ने कहा, 'वर्तमान में भारत और न्यूजीलैंड के बीच सालाना व्यापार लगभग $2.8 अरब डॉलर का है और दोनों देशों ने अगले पाँच वर्षों में इसे दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन मेरा मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह लक्ष्य पाँच साल नहीं, बल्कि दो से ढाई वर्षों में ही हासिल किया जा सकता है।' उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में दोनों देश एक-दूसरे के बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बनकर उभरेंगे।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत तेज़ी से अपने व्यापारिक गठजोड़ों का विस्तार कर रहा है और कई देशों के साथ FTA वार्ताएँ एक साथ चल रही हैं। न्यूजीलैंड के साथ यह समझौता डेयरी, कृषि, सेवाओं और प्रौद्योगिकी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में द्विपक्षीय अवसर खोलने की क्षमता रखता है।
भू-राजनीतिक चुनौतियाँ
चावला ने स्वीकार किया कि व्यापार संबंधों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति है, विशेष रूप से पश्चिम एशिया का जारी संकट। उनके अनुसार, मध्य-पूर्व में तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कमोडिटी कीमतों और सप्लाई चेन पर पड़ रहा है, जिससे उत्पादन के लिए ज़रूरी कच्चे माल की लागत बढ़ रही है और आपूर्ति में देरी भी हो रही है।
उन्होंने व्यापारियों को सतर्क करते हुए कहा, 'कई बार ऑर्डर मिलने से लेकर उसकी डिलीवरी तक कीमतों में बड़ा अंतर आ जाता है, जिसे व्यापारियों को ध्यान में रखना होगा।' यह चिंता उन निर्यातकों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है जो लंबी समयसीमा वाले बड़े ऑर्डर संभालते हैं।
निर्यातकों के लिए वित्तीय सहायता की माँग
चावला ने सरकार से निर्यातकों के लिए अधिक सहायक वित्तीय योजनाएँ लाने की माँग की। उन्होंने कहा कि निर्यात क्षेत्र को सस्ती ब्याज दरों और अधिक लचीली बैंकिंग सुविधाओं की ज़रूरत है, ताकि कारोबारियों को बड़े ऑर्डर पूरे करने के लिए पर्याप्त कार्यशील पूँजी मिल सके। आलोचकों का कहना है कि मौजूदा ऋण संरचना छोटे निर्यातकों के लिए बाधक बनती है, जिसे FTA का पूरा लाभ उठाने के लिए दूर करना ज़रूरी होगा।
रोज़गार और निवेश पर असर
रोज़गार के सवाल पर चावला ने कहा कि यदि व्यापार दोगुना होता है तो नए उद्योग, नई फैक्ट्रियाँ और बढ़ता उत्पादन रोज़गार के नए अवसर पैदा करेंगे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कंपनी का कारोबार ₹100 करोड़ से बढ़कर ₹125 करोड़ होता है, तो उसका लाभ केवल उस उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोज़गार और समग्र आर्थिक गतिविधियों में भी दिखाई देगा।
उन्होंने इस धारणा को सिरे से खारिज किया कि FTA से रोज़गार घटेगा। उनके अनुसार, व्यापार विस्तार के साथ रोज़गार और निवेश दोनों में बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो भारत-न्यूजीलैंड FTA अगले कुछ वर्षों में दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक नई विकास कहानी लिख सकता है।