चीन को काउंटर करने के लिए अमेरिका को भारत की ज़रूरत: पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राजदूत जेके त्रिपाठी ने 27 जून 2026 को कहा कि एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका के पास भारत से बड़ा कोई रणनीतिक सहयोगी नहीं है, और यही कारण है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाते दिख रहे हैं। त्रिपाठी के अनुसार, चाहे वजह कोई भी हो, अमेरिका का भारत की ओर झुकाव दोनों देशों के दीर्घकालिक हित में है।
रिश्तों का उतार-चढ़ाव भरा इतिहास
पूर्व राजदूत त्रिपाठी ने कहा कि 2007 के बाद से भारत और अमेरिका के बीच नजदीकियाँ बढ़ने लगीं। उन्होंने रेखांकित किया कि ओबामा प्रशासन ने दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। हालाँकि, ट्रंप के पहले कार्यकाल में संबंधों में खटास आई, जबकि बाइडेन प्रशासन के दौरान द्विपक्षीय रिश्तों में फिर से मधुरता लौटी।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में फिर बदले समीकरण
त्रिपाठी के अनुसार, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में शुरुआती दौर में संबंधों में वह मिठास नहीं दिखी जो बाइडेन काल में थी। उन्होंने कहा कि इस समय ट्रंप कई मोर्चों पर दबाव में हैं — ईरान के साथ युद्ध का मसला, अटकी हुई समझौता वार्ता और रूस-यूक्रेन युद्ध का अभी तक न थमना। ऐसे में कथित तौर पर ट्रंप के सलाहकारों ने उन्हें भारत की ओर रुख करने की सलाह दी होगी।
चीन फैक्टर: अमेरिका की असली मजबूरी
त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि एशिया में चीन के बढ़ते दबदबे को थामने के लिए अमेरिका को एक शक्तिशाली और विश्वसनीय क्षेत्रीय साझेदार की आवश्यकता है, और भारत इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त है। यह ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य और आर्थिक उपस्थिति लगातार बढ़ रही है।
ट्रंप की भारत यात्रा की संभावना
पूर्व राजदूत ने 2027 में राष्ट्रपति ट्रंप की संभावित भारत यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसी यात्रा दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाई देने का अवसर बन सकती है। गौरतलब है कि ट्रंप के स्वर हाल के महीनों में भारत के प्रति स्पष्ट रूप से बदले हैं, जो इस संभावित कूटनीतिक पुनर्संरेखण का संकेत देते हैं।
आगे क्या
त्रिपाठी ने कहा कि वजह चाहे जो भी हो, अमेरिका का भारत के साथ संबंध सुधारने का प्रयास स्वागत योग्य है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में व्यापार, रक्षा और तकनीक के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग की नई परतें उभर सकती हैं।