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रुबियो का दौरा 'बैंड-एड' था, भारत से रिश्ते सुधारने के लिए सिर्फ ट्रंप ही काफी: लिसा कर्टिस

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रुबियो का दौरा 'बैंड-एड' था, भारत से रिश्ते सुधारने के लिए सिर्फ ट्रंप ही काफी: लिसा कर्टिस

सारांश

व्हाइट हाउस की पूर्व अधिकारी लिसा कर्टिस का साफ़ कहना है — रुबियो का दौरा ज़रूरी था, पर काफी नहीं। भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ, पाकिस्तान और चीन की छाया के बीच असली बदलाव तभी आएगा जब ट्रंप खुद इसे प्राथमिकता दें।

मुख्य बातें

लिसा कर्टिस ने मार्को रुबियो के भारत दौरे को 'बैंड-एड' करार दिया — संबंधों की सतही मरम्मत, गहरी नहीं।
कर्टिस के अनुसार केवल राष्ट्रपति ट्रंप ही भारत-अमेरिका संबंधों में पूर्ण विश्वास बहाल कर सकते हैं।
टैरिफ , इमिग्रेशन प्रतिबंध और पाकिस्तान के साथ वाशिंगटन की नज़दीकियों ने भारत में चिंता बढ़ाई है।
क्वाड की पिछले साल कोई नेता-स्तरीय बैठक नहीं हुई — पाँच वर्षों में पहली बार।
भारत को आशंका है कि शी जिनपिंग के साथ शिखर सम्मेलन के बाद ट्रंप चीन के प्रति नरम पड़ सकते हैं।
कर्टिस ने सुझाया कि ट्रंप का भारत दौरा या सार्वजनिक रणनीतिक समर्थन विश्वास पुनर्निर्माण में सहायक होगा।

व्हाइट हाउस की पूर्व अधिकारी और दक्षिण एशिया विशेषज्ञ लिसा कर्टिस ने 28 मई 2026 को कहा कि अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो का हालिया भारत दौरा वाशिंगटन-नई दिल्ली संबंधों में एक सतही पट्टी की तरह था — और असली भरोसा बहाल करने के लिए केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही सक्षम हैं। कर्टिस वर्तमान में सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) में हिंद-प्रशांत सुरक्षा कार्यक्रम की निदेशक हैं।

रुबियो का दौरा: 'बैंड-एड' से ज़्यादा नहीं

कर्टिस ने एक इंटरव्यू में कहा, 'मुझे लगता है कि सचिव रुबियो का भारत जाना बहुत ज़रूरी था ताकि पिछले साल अमेरिका-भारत संबंधों को हुए कुछ नुकसान को ठीक करने की कोशिश की जा सके। मुझे लगता है कि उनके दौरे ने संबंधों पर एक तरह का बैंड-एड का काम किया।' उन्होंने कहा कि रुबियो के दौरे के दौरान हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण थी और यह दर्शाती है कि इस समूह में अभी भी गति बनी हुई है।

भारत की चिंताएँ: टैरिफ, इमिग्रेशन और पाकिस्तान

कर्टिस ने रेखांकित किया कि पिछले साल कई घटनाओं ने भारत को असहज किया है — जिनमें अमेरिकी टैरिफ, इमिग्रेशन पर प्रतिबंध और पाकिस्तान के साथ वाशिंगटन की बढ़ती नज़दीकियाँ शामिल हैं। उन्होंने कहा, 'यह सब भारतीय सोच में बसा हुआ है। मुझे लगता है कि इससे पता चलता है कि ट्रंप सरकार ने दूसरे कार्यकाल में भारत और भारत के साथ अपने संबंधों को पहले कार्यकाल की तरह प्राथमिकता नहीं दी है।' उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने रूसी तेल आयात जारी रखने की अमेरिकी छूट को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा है।

चीन फैक्टर और हिंद-प्रशांत चिंताएँ

कर्टिस ने कहा कि भारतीय नीति-निर्माताओं को इस बात की चिंता है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हालिया शिखर सम्मेलन के बाद ट्रंप बीजिंग के प्रति नरम रुख अपना सकते हैं। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि उस शिखर सम्मेलन के नतीजे ने शायद भारतीयों को यह विश्वास दिलाया है कि राष्ट्रपति ट्रंप चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय व्यापार पर ध्यान दे रहे हैं।' इसके साथ ही, ताइवान को हथियारों की बिक्री को सौदेबाज़ी के मोहरे की तरह इस्तेमाल किए जाने की टिप्पणियों ने पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बेचैनी बढ़ा दी है।

क्वाड की स्थिति और नेतृत्व-स्तरीय बैठक की कमी

कर्टिस ने बताया कि मंत्री-स्तरीय क्वाड संवाद सक्रिय रहा, लेकिन नेतृत्व-स्तरीय शिखर सम्मेलन के अभाव ने अनिश्चितता बनाए रखी। उन्होंने कहा, 'पिछले साल हम नेता-स्तरीय बैठक नहीं कर पाए। पाँच वर्षों में यह पहली बार था जब कोई नेता-स्तरीय बैठक नहीं हुई।' अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह समूह चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की हिंद-प्रशांत रणनीति का केंद्रीय स्तंभ माना जाता है।

आगे क्या: ट्रंप की भूमिका निर्णायक

कर्टिस का स्पष्ट मत है कि केवल ट्रंप की व्यक्तिगत पहल ही द्विपक्षीय संबंधों में गहरा सुधार ला सकती है। उन्होंने कहा, 'सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप ही असल में संबंधों को फिर से ठीक कर सकते हैं — तभी जब वह दिखाएँ कि वह संबंधों को प्राथमिकता देते हैं।' उन्होंने सुझाव दिया कि ट्रंप का भारत दौरा या सार्वजनिक रूप से भारत की रणनीतिक अहमियत पर ज़ोर देना, विश्वास पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वाशिंगटन और नई दिल्ली के विश्लेषक अब इस पर नज़र रखे हुए हैं कि क्या ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत को वही रणनीतिक प्राथमिकता मिलेगी जो पहले कार्यकाल में थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

संस्थागत नहीं। पहले कार्यकाल में क्वाड को पुनर्जीवित करना और हिंद-प्रशांत रणनीति को मज़बूत करना ट्रंप की उपलब्धि थी, लेकिन दूसरे कार्यकाल में टैरिफ और पाकिस्तान-तुष्टीकरण ने उसी पूँजी को खर्च कर दिया है। विडंबना यह है कि जो देश चीन को संतुलित करने की अमेरिकी रणनीति का सबसे बड़ा साझेदार है, वही अब वाशिंगटन की प्राथमिकता सूची में पिछड़ता दिख रहा है। बिना नेता-स्तरीय प्रतिबद्धता के, क्वाड एक कूटनीतिक ढाँचे से ज़्यादा कुछ नहीं रहेगा।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लिसा कर्टिस ने रुबियो के भारत दौरे को 'बैंड-एड' क्यों कहा?
कर्टिस के अनुसार रुबियो का दौरा ज़रूरी था, लेकिन यह केवल सतही मरम्मत था — पिछले साल टैरिफ, इमिग्रेशन प्रतिबंध और पाकिस्तान के साथ अमेरिकी नज़दीकियों से जो गहरा अविश्वास पैदा हुआ, उसे दूर करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि असली भरोसा केवल राष्ट्रपति ट्रंप की प्रत्यक्ष पहल से ही बहाल हो सकता है।
भारत-अमेरिका संबंधों में ट्रंप की भूमिका क्यों अहम है?
कर्टिस के अनुसार अमेरिकी विदेश नीति में भारत को प्राथमिकता देने का संकेत केवल राष्ट्रपति स्तर से ही आ सकता है। उन्होंने कहा कि ट्रंप का भारत दौरा या सार्वजनिक रूप से भारत की रणनीतिक अहमियत पर ज़ोर देना विश्वास पुनर्निर्माण में निर्णायक होगा।
क्वाड की नेता-स्तरीय बैठक पिछले साल क्यों नहीं हुई?
कर्टिस ने बताया कि पिछले साल क्वाड की कोई नेता-स्तरीय बैठक नहीं हुई, जो पाँच वर्षों में पहली बार था। हालाँकि मंत्री-स्तरीय संवाद जारी रहा, लेकिन नेतृत्व-स्तरीय शिखर सम्मेलन के अभाव ने समूह की गति को लेकर संशय बनाए रखा।
चीन-ट्रंप शिखर सम्मेलन का भारत पर क्या असर पड़ा?
कर्टिस के अनुसार शी जिनपिंग के साथ ट्रंप की बैठक के बाद भारत में यह चिंता बढ़ी है कि अमेरिका रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को प्राथमिकता दे सकता है। ताइवान को हथियारों की बिक्री को सौदेबाज़ी के मोहरे की तरह इस्तेमाल किए जाने की टिप्पणियों ने पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बेचैनी बढ़ाई है।
लिसा कर्टिस कौन हैं और उनकी विश्वसनीयता क्या है?
लिसा कर्टिस ने 2017 से 2021 तक राष्ट्रपति के उप-सहायक और दक्षिण व मध्य एशिया के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के वरिष्ठ निदेशक के रूप में कार्य किया। वर्तमान में वे सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) में हिंद-प्रशांत सुरक्षा कार्यक्रम की निदेशक हैं।
राष्ट्र प्रेस
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