भारत-बांग्लादेश संबंध अनिवार्य, चीन केवल इंफ्रा के लिए: रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल पीके सहगल
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) पीके सहगल ने 12 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में भारत-बांग्लादेश संबंधों, शेख हसीना के प्रत्यर्पण, बांग्लादेश-चीन समीकरण और अरुणाचल प्रदेश पर चीन की नामकरण रणनीति पर विस्तार से अपने विचार साझा किए। उनका स्पष्ट मत है कि बांग्लादेश के नए नेतृत्व को भलीभाँति पता है कि भारत के बिना उसकी आर्थिक और रणनीतिक स्थिरता संभव नहीं।
भारत-बांग्लादेश संबंध: नई शुरुआत
हाल ही में बांग्लादेश में भारत के राजदूत दिनेश त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। इस बैठक को रणनीतिक महत्व का बताते हुए सहगल ने कहा, 'इसमें कोई शक नहीं है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री साफतौर पर जानते हैं कि भारत बांग्लादेश के लिए बहुत ज़रूरी है। युनूस सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी खराब हो गए थे। वो साफतौर पर जानते हैं कि भारत के साथ संपर्क देश की आर्थिक व्यवस्था के लिए ज़रूरी है और दुनिया के साथ संपर्क के लिए हिंदुस्तान एकमात्र रास्ता है।'
गौरतलब है कि राजदूत त्रिवेदी की इस मुलाकात के अलावा रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के प्रमुख पराग जैन ने भी प्रधानमंत्री रहमान से अलग से मुलाकात की — जो इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सुरक्षा-संबंधी कई अहम मुद्दों पर बातचीत हुई।
संवेदनशील मुद्दे: पानी, सीमा और हसीना का प्रत्यर्पण
सहगल ने रेखांकित किया कि दोनों देशों के बीच 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा, जल-बँटवारा, नदियों का प्रवाह, व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और अप्रवासी जैसे कई संवेदनशील मुद्दे हैं जिन पर भारत का दबाव बांग्लादेश महसूस करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सबमें सबसे नाजुक मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण का है। उनके अनुसार, 'जहाँ तक मैं जानता हूँ, भारत किसी भी परिस्थिति में हसीना का प्रत्यर्पण नहीं करेगा।'
पाकिस्तान-बांग्लादेश नज़दीकी और उसकी सीमाएँ
सहगल ने बताया कि युनूस सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि पाकिस्तान 'चिकन नेक' क्षेत्र के 20 किलोमीटर के दायरे में एक एयरफील्ड निर्माण करना चाहता था और बांग्लादेश को ड्रोन व टैंकर देने की पेशकश कर रहा था।
हालाँकि उनका मानना है कि अब बांग्लादेश को यह एहसास हो गया है कि भारत भौगोलिक रूप से निकटतम है और संकट की घड़ी में पाकिस्तान हजारों मील दूर है। यह ऐसे समय में आया है जब नई सरकार भारत के साथ व्यावहारिक संबंधों की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
बांग्लादेश-चीन संबंध: इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित
बांग्लादेश-चीन संबंधों पर सहगल का विश्लेषण स्पष्ट है — ढाका, बीजिंग के साथ केवल बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए संबंध बनाए रखना चाहता है, न कि किसी गहरी रणनीतिक साझेदारी के लिए। उनके अनुसार बांग्लादेश चीन का 'इस्तेमाल' इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए करना चाहता है, लेकिन रणनीतिक संरेखण भारत के साथ ही रहेगा।
अरुणाचल प्रदेश पर चीन की नामकरण रणनीति
सहगल ने चीन की उस रणनीति पर भी प्रकाश डाला जिसके तहत वह अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी दर्रों, झीलों और अन्य रणनीतिक स्थानों को चीनी नाम देता रहा है। उन्होंने कहा, 'चीन का मानना है कि भविष्य में जब सीमा विवादों पर बातचीत होगी, तो ये चीनी नाम उसके दावों को और मज़बूत करेंगे।'
इसके जवाब में भारत ने एक नया मानचित्र जारी किया है जिसमें पहाड़ी दर्रों और झीलों सहित 27 रणनीतिक स्थानों को आधिकारिक भारतीय नाम दिए गए हैं — जो स्पष्ट रूप से चीन की नामकरण कूटनीति का प्रतिकार है। आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश-चीन का यह त्रिकोणीय समीकरण दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को नई दिशा दे सकता है।