इटावा में सैयद मजार को अदालत ने अवैध घोषित किया, बेदखली का आदेश

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इटावा में सैयद मजार को अदालत ने अवैध घोषित किया, बेदखली का आदेश

सारांश

इटावा के बीहड़ क्षेत्र में सैयद मजार को अदालत ने अवैध घोषित कर दिया है। दो महीनों की सुनवाई के बाद, मजार हटाने का आदेश दिया गया है। पक्षकारों ने कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे बुलडोजर कार्रवाई की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

Key Takeaways

  • सैयद मजार को अवैध घोषित किया गया है।
  • अदालत का निर्णय आरक्षित वन भूमि पर आधारित है।
  • पक्षकारों ने कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
  • बेदखली का आदेश जारी किया गया है।
  • बुलडोजर कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।

लखनऊ, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश के इटावा के बीहड़ क्षेत्र में स्थित सैयद मजार के संबंध में अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। लगभग दो महीनों तक चली सुनवाई के बाद, अदालत ने मजार को आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा मानते हुए उसे हटाने का आदेश दिया है। पक्षकार इसे 800 वर्ष पुराना बताते रहे, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके। आदेश का पालन विपक्षी पक्ष को करा दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप मजार हटाने की संभावित बुलडोजर कार्रवाई की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

वन न्यायालय के प्राधिकृत अधिकारी ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि वर्ष 1916, 1939 और 1946 के गजट के अनुसार आरक्षित वन क्षेत्र में दर्ज है। इसलिए, इस भूमि पर किसी भी प्रकार का गैर-वानिकी कार्य कानूनन अवैध है। जांच में मजार के आसपास लगभग 1800 वर्गफीट ज़मीन पर कब्जा पाया गया, जिसे अवैध मानकर हटाने का आदेश दिया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान, मजार के पक्षकार फजले इलाही को कुल पांच अवसर दिए गए थे, ताकि वे भूमि स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत कर सकें। उन्होंने मजार को 800 साल पुराना बताया, लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई ऐतिहासिक या कानूनी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। पर्याप्त समय मिलने के बावजूद साक्ष्य न देने पर न्यायालय ने कब्जा हटाने का आदेश पारित कर दिया।

यह पूरी प्रक्रिया भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 20 के तहत की गई है। इस प्रावधान के अनुसार, आरक्षित वन भूमि में किसी भी प्रकार का गैर वानिकी कार्य बिना उच्च स्तरीय अनुमति के नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर मजार को अवैध घोषित किया गया। साथ ही, धारा 61बी के तहत वाद दायर कर विधिक प्रक्रिया पूरी की गई।

इस प्रकरण की शुरुआत 23 जनवरी को हुई थी, जब वन विभाग की ओर से ध्वस्तीकरण का वाद दायर किया गया। वन रेंजर अशोक कुमार शर्मा ने मामला प्रस्तुत किया। पहली सुनवाई 5 फरवरी को हुई, जिसके बाद पक्षकारों ने कई बार समय मांगा। अदालत ने 16 फरवरी, 20 फरवरी, 23 मार्च और 28 मार्च तक दस्तावेज देने के मौके दिए, लेकिन कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। अंततः 17 अप्रैल को फैसला सुनाया गया।

वन विभाग के एसडीओ विमल कुमार के अनुसार, बढ़पुरा रेंज के फिशर वन ब्लॉक में लगभग 0.0281 हेक्टेयर भूमि पर अवैध निर्माण पाया गया था। जांच के बाद मामला न्यायालय में लाया गया। सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष कोई भी वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सका, जिसके चलते बेदखली का आदेश जारी कर दिया गया।

शनिवार को वन विभाग की ओर से मजार के पक्षकार फजले इलाही को न्यायालय का आदेश तामील करा दिया गया। इसके बाद क्षेत्र में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मजार को हटाने के लिए जल्द ही बुलडोजर कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, प्रशासन ने अभी इसकी कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है।

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पक्षकारों की कमजोर पैरवी इस फैसले का एक बड़ा कारण रही। पर्याप्त मौके मिलने के बावजूद साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाने के चलते मामला उनके खिलाफ गया और अंततः मजार को अवैध घोषित करते हुए बेदखली का आदेश जारी कर दिया गया।

Point of View

बिना ठोस साक्ष्य के उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न्याय और कानून के शासन को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
NationPress
21/04/2026

Frequently Asked Questions

सैयद मजार को अवैध क्यों घोषित किया गया?
सैयद मजार को आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा मानते हुए अवैध घोषित किया गया क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
इस फैसले का असर क्या होगा?
इस फैसले के बाद मजार को हटाने के लिए बुलडोजर कार्रवाई की जा सकती है।
क्या पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का मौका मिला था?
हां, पक्षकारों को पांच बार साक्ष्य प्रस्तुत करने का मौका दिया गया, लेकिन वे कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाए।
इस मामले की सुनवाई कब शुरू हुई थी?
इस मामले की सुनवाई 23 जनवरी को शुरू हुई थी।
क्या यह मामला उच्च अदालत में जाएगा?
अगर पक्षकारों को लगता है कि उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वे उच्च अदालत में अपील कर सकते हैं।
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