कारगिल विजय दिवस के 26 साल: रक्षा बजट ₹7.85 लाख करोड़, निर्यात 56 गुना बढ़ा — हर मोर्चे पर नया भारत
सारांश
मुख्य बातें
26 जुलाई 2025 को भारत 26वाँ कारगिल विजय दिवस मना रहा है — उस ऐतिहासिक जीत की वर्षगाँठ जब 1999 में भारतीय सैनिकों ने लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर अदम्य साहस से तिरंगा फहराया था। बीते 26 वर्षों में भारत ने अपनी सैन्य शक्ति को इस कदर बदल दिया है कि रक्षा बजट ₹7.85 लाख करोड़ तक पहुँच गया है और रक्षा निर्यात 56 गुना से अधिक बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया है।
कारगिल: बदलाव का वह मोड़
कारगिल युद्ध ने भारत की रक्षा नीति को एक निर्णायक दिशा दी। तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की कमी, आधुनिक उपकरणों की सीमित उपलब्धता और स्वदेशी उत्पादन की अनुपस्थिति — इन कमज़ोरियों ने सुधारों की नींव रखी। गौरतलब है कि उस दौर में भारत की 65-70 प्रतिशत रक्षा ज़रूरतें आयात पर निर्भर थीं; आज यह तस्वीर पलट चुकी है।
संस्थागत सुधार: CDS और DMA
उच्च रक्षा प्रबंधन में सबसे बड़ा बदलाव चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के पद की स्थापना रही। जनरल बिपिन रावत 2020 में भारत के पहले CDS बने; वर्तमान में यह ज़िम्मेदारी जनरल अनिल चौहान निभा रहे हैं। CDS के अधीन सैन्य मामलों के विभाग (DMA) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य थल, नौ और वायु सेना के बीच संयुक्त योजना और संसाधन प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है।
रक्षा बजट और स्वदेशी उत्पादन में ऐतिहासिक उछाल
भारत का रक्षा बजट 2013-14 के ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹7.85 लाख करोड़ हो गया है। इसी अवधि में पूंजीगत व्यय ₹94,587.95 करोड़ (2014-15) से बढ़कर ₹2.19 लाख करोड़ (2026-27) तक पहुँचा है। रक्षा उत्पादन 2025-26 में ₹1.78 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर रहा — 2014-15 के ₹46,429 करोड़ की तुलना में लगभग चार गुना अधिक। रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) ऑटोमैटिक रूट से 74 प्रतिशत और आधुनिक प्रौद्योगिकी के मामलों में सरकारी रूट से 100 प्रतिशत तक अनुमत है; मार्च 2026 तक ₹6,670.59 करोड़ का FDI प्राप्त हो चुका है।
रक्षा निर्यात 2013-14 के ₹686 करोड़ से 2025-26 में ₹38,424 करोड़ तक पहुँचा — 56 गुना से अधिक की वृद्धि। भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों को निर्यात किए जा रहे हैं। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहलों के परिणामस्वरूप आज देश की लगभग 65 प्रतिशत रक्षा ज़रूरतें स्वदेशी उत्पादन से पूरी हो रही हैं।
आधुनिक प्लेटफॉर्म: थल, नभ और जल
तीनों सेनाओं में अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं। अर्जुन एमके-1ए मुख्य युद्धक टैंक फरवरी 2021 में भारतीय थल सेना को सौंपा गया। आईएनएस विक्रांत — भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत — 2 सितंबर 2022 को नौसेना में शामिल हुआ। राफेल लड़ाकू विमान, अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर, ड्रोन आधारित युद्ध क्षमता, प्रोजेक्ट 17ए स्टील्थ फ्रिगेट, संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत और अनाला श्रेणी के उथले जल पनडुब्बी-रोधी युद्धपोत भी बेड़े में जुड़े हैं।
ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल का पहला सफल प्रक्षेपण 12 जून 2001 को हुआ था; इसकी मारक क्षमता 290 किलोमीटर और गति मैक 2.8 है।
अंतरिक्ष से हाइपरसोनिक तक: अगली पीढ़ी की क्षमताएँ
'मिशन शक्ति' के तहत 27 मार्च 2019 को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल का सफल परीक्षण हुआ, जिससे भारत उपग्रह-रोधी क्षमता रखने वाले चुनिंदा देशों में शामिल हो गया। 11 मार्च 2024 को 'मिशन दिव्यास्त्र' के अंतर्गत एकाधिक स्वतंत्र लक्ष्यभेदी वारहेड (MIRV) तकनीक से लैस लंबी दूरी की मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया।
29 दिसंबर 2025 को पिनाका लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेट ने 120 किलोमीटर तक की मारक क्षमता का सफल प्रदर्शन किया। 23 अगस्त 2025 को DRDO ने मिसाइल अवरोधक, कम दूरी के वायु रक्षा हथियार और लेजर प्रौद्योगिकी से युक्त उन्नत वायु रक्षा प्रणाली का सफल परीक्षण किया। इसी महीने DRDO ने कुशा मिसाइल का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया, जो लड़ाकू विमान, मिसाइल, UAV और बड़े शत्रु विमानों को लंबी दूरी व ऊँचाई पर निष्क्रिय करने में सक्षम है। हाइपरसोनिक मिसाइल विकास के अंतर्गत जनवरी 2026 में DRDO ने स्क्रैमजेट दहन प्रणाली का दीर्घकालिक ग्राउंड टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा किया और हैदराबाद में नई हाइपरसोनिक विंड टनल स्थापित की गई है।
पिछले महीने DRDO ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लंबी दूरी की भूमि-प्रहारक क्रूज मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया; साथ ही स्वदेशी 'नेत्र' हवाई पूर्व चेतावनी और नियंत्रण (AEW&C) प्रणाली को अंतिम परिचालन स्वीकृति प्रदान की गई। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए निवारक क्षमता को हर आयाम में सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।