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NIT राउरकेला का बड़ा शोध: कटहल के छिलके से 10 मिनट में 90% फ्लोराइड खत्म, पेटेंट मिला

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NIT राउरकेला का बड़ा शोध: कटहल के छिलके से 10 मिनट में 90% फ्लोराइड खत्म, पेटेंट मिला

सारांश

कूड़े में फेंके जाने वाले कटहल के छिलकों से NIT राउरकेला के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी सामग्री बनाई है जो 10 मिनट में पानी का 90–97% फ्लोराइड साफ कर देती है। पेटेंटेड इस तकनीक की लागत मात्र ₹37 प्रति ग्राम है, जो फ्लोराइड-प्रभावित ग्रामीण भारत के लिए एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प बन सकती है।

मुख्य बातें

NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलकों से फ्लोराइड-अवशोषक सामग्री विकसित की, जिसे पेटेंट मिल चुका है।
यह सामग्री मात्र 10 से 20 मिनट में पानी से 90 से 97 प्रतिशत फ्लोराइड हटाने में सक्षम पाई गई — प्रयोगशाला परीक्षणों के आधार पर।
तकनीक में सक्रिय कार्बन को जिरकोनियम से संशोधित किया जाता है; निर्माण लागत लगभग ₹37 प्रति ग्राम ।
सुस्मिता मिश्रा और डॉ.
प्रतिमा मिंज की टीम ने किया; अभी TRL-4 स्तर पर है।
WHO के अनुसार अत्यधिक फ्लोराइड फ्लोरोसिस का कारण बनता है — यह तकनीक ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक।
अगला चरण: प्रोटोटाइप विकास , दीर्घकालिक प्रभावशीलता और संचालन लागत का क्षेत्रीय मूल्यांकन।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलकों से एक ऐसी विशेष सामग्री विकसित की है जो मात्र 10 मिनट में पानी से 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने में सक्षम है। इस नवाचार को पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है, जो इसे भविष्य के जल-शोधन समाधानों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बनाता है।

तकनीक कैसे काम करती है

इस तकनीक में सबसे पहले कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन तैयार किया जाता है। इसके बाद उसमें जिरकोनियम मिलाकर फ्लोराइड को पकड़ने की क्षमता को और अधिक बढ़ाया जाता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में 1 से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर फ्लोराइड सांद्रता वाले पानी पर इस सामग्री को आजमाया गया, जिसमें 10 से 20 मिनट के भीतर 90 से 97 प्रतिशत फ्लोराइड हटाने की क्षमता दर्ज की गई।

गौरतलब है कि यह परिणाम नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों पर आधारित हैं और वास्तविक क्षेत्रीय उपयोग में इसकी प्रभावशीलता का आकलन अभी किया जाना शेष है।

शोध दल और उद्देश्य

यह तकनीक NIT राउरकेला की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और शोधार्थी डॉ. प्रतिमा मिंज के नेतृत्व वाले शोध दल ने विकसित की है। प्रो. मिश्रा के अनुसार, शोध का मूल उद्देश्य कृषि अपशिष्ट को जल शुद्धीकरण के काम में लाना था — यानी जो छिलका अब तक कूड़े में जाता था, उसे एक उपयोगी संसाधन में बदलना।

शोध को प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर-4 (Technology Readiness Level-4) तक पहुँचाया जा चुका है। इस सामग्री को तैयार करने की अनुमानित लागत बिजली और रसायनों सहित करीब ₹37 प्रति ग्राम बताई गई है।

मौजूदा तकनीकों की सीमाएँ और इस शोध की प्रासंगिकता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पेयजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा दाँतों और हड्डियों को नुकसान पहुँचाने वाली फ्लोरोसिस बीमारी का कारण बन सकती है। भारत के राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश और ओडिशा सहित कई राज्यों में भूजल में फ्लोराइड की अधिकता एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती रही है।

मौजूदा रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्रक्रिया में पर्याप्त पानी की बर्बादी होती है और कैल्शियम व मैग्नीशियम जैसे आवश्यक खनिज भी बाहर निकल जाते हैं। वहीं कुछ अन्य विधियों में रसायनों का उपयोग अनिवार्य होता है, जिससे लागत और पर्यावरणीय चिंताएँ बढ़ती हैं। ऐसे में कृषि अपशिष्ट से निर्मित यह सामग्री एक किफायती और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में देखी जा रही है।

आम जनता पर संभावित असर

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक विशेष रूप से उन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है जहाँ भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है और महँगे जल-शोधन संयंत्र लगाना संभव नहीं। घरेलू तथा सामुदायिक स्तर पर इसके उपयोग की संभावना इसे स्थानीय जल-सुरक्षा का एक व्यावहारिक माध्यम बना सकती है।

आगे की राह

अब शोध दल इस सामग्री का भौतिक प्रोटोटाइप (prototype) विकसित करने की दिशा में काम करेगा। साथ ही दीर्घकालिक उपयोग में इसकी टिकाऊ क्षमता, व्यावहारिक प्रभावशीलता और संचालन लागत का मूल्यांकन भी किया जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में सस्ती और टिकाऊ जल-शोधन तकनीकों की माँग लगातार बढ़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन प्रयोगशाला से खेत तक की दूरी अक्सर कम आँकी जाती है — TRL-4 का अर्थ है कि व्यावसायिक उपयोग अभी वर्षों दूर है। भारत में फ्लोराइड-प्रभावित क्षेत्रों में दशकों से सस्ती तकनीक की तलाश जारी है, और कई शोध प्रोटोटाइप चरण पर आकर रुक गए हैं। असली परीक्षण यह होगा कि ₹37 प्रति ग्राम की लागत सामुदायिक स्तर पर किफायती बनती है या नहीं, और क्या यह वास्तविक भूजल की जटिल रासायनिक संरचना में भी उतनी ही प्रभावी रहती है। सरकारी वित्तपोषण और उद्योग भागीदारी के बिना यह नवाचार भी पिछले कई शोधों की तरह अकादमिक पत्रिकाओं तक सीमित रह सकता है।
RashtraPress
14 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

NIT राउरकेला की कटहल छिलके वाली फ्लोराइड हटाने की तकनीक क्या है?
NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलकों से तैयार सक्रिय कार्बन को जिरकोनियम से संशोधित कर एक विशेष जल-शोधन सामग्री बनाई है। यह सामग्री प्रयोगशाला परीक्षणों में 10 से 20 मिनट के भीतर पानी से 90 से 97 प्रतिशत फ्लोराइड हटाने में सफल रही और इसे पेटेंट भी मिल चुका है।
पानी में फ्लोराइड की अधिकता से क्या नुकसान होता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पेयजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा फ्लोरोसिस नामक बीमारी का कारण बन सकती है, जिससे दाँत और हड्डियाँ कमज़ोर होती हैं। भारत के कई राज्यों में भूजल में फ्लोराइड की अत्यधिक मौजूदगी एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या रही है।
यह तकनीक मौजूदा RO फिल्टर से बेहतर कैसे है?
रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्रक्रिया में काफी पानी बर्बाद होता है और कैल्शियम व मैग्नीशियम जैसे उपयोगी खनिज भी बाहर निकल जाते हैं। कटहल छिलके से बनी यह सामग्री कृषि अपशिष्ट पर आधारित है, रसायन-मुक्त है, और इसकी अनुमानित लागत करीब ₹37 प्रति ग्राम बताई गई है — हालाँकि क्षेत्रीय उपयोग में तुलनात्मक प्रभावशीलता अभी जाँचनी शेष है।
यह तकनीक अभी किस चरण में है और कब तक उपलब्ध हो सकती है?
शोध अभी प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर-4 (TRL-4) पर है, जिसका अर्थ है यह प्रयोगशाला स्तर पर सत्यापित हो चुकी है। अगला चरण भौतिक प्रोटोटाइप विकास और वास्तविक परिस्थितियों में दीर्घकालिक परीक्षण है; व्यावसायिक उपलब्धता की कोई तारीख अभी घोषित नहीं की गई है।
यह शोध किन क्षेत्रों के लिए सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकता है?
शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक विशेष रूप से उन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक है जहाँ भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है और महँगे जल-शोधन संयंत्र लगाना व्यावहारिक नहीं। इसे घरेलू और सामुदायिक, दोनों स्तरों पर उपयोग में लाने की संभावना तलाशी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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