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NIT राउरकेला की पेटेंटेड तकनीक: केंचुए और हाइड्रोपोनिक्स से डेयरी उद्योग का प्रदूषित पानी होगा साफ

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NIT राउरकेला की पेटेंटेड तकनीक: केंचुए और हाइड्रोपोनिक्स से डेयरी उद्योग का प्रदूषित पानी होगा साफ

सारांश

NIT राउरकेला के वैज्ञानिकों ने केंचुए, जलीय पौधे और हाइड्रोपोनिक्स को मिलाकर एक पेटेंटेड जल-उपचार प्रणाली बनाई है — मात्र ₹10,000 की लागत में, जो डेयरी उद्योग के प्रदूषित पानी को कृषि-योग्य बनाती है और अवशेष पौधों से बायोगैस भी निकाल सकती है।

मुख्य बातें

NIT राउरकेला के प्रो.
काकोली करार पॉल और डॉ.
प्रज्ञान दास ने डेयरी अपशिष्ट जल उपचार की पेटेंटेड बहु-स्तरीय जैविक प्रणाली विकसित की।
तकनीक में केंचुए, जलीय पौधे, फ्लाई ऐश पेलेट्स, सूक्ष्मजीव और हाइड्रोपोनिक्स को एकीकृत किया गया है।
प्रयोगशाला स्तर पर लागत मात्र ₹10,000 ; क्षमता प्रतिदिन 30 लीटर अपशिष्ट जल उपचार।
उपचारित जल में फॉस्फेट जैसे पोषक तत्व बने रहते हैं, जिससे यह सिंचाई के लिए उपयुक्त है।
प्रयुक्त जलीय पौधों से पशु चारा, बायोगैस और बायोडीजल बनाया जा सकता है।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के वैज्ञानिकों ने 22 मई 2026 को एक पेटेंटेड बहु-स्तरीय जैविक प्रणाली विकसित की है, जो केंचुए, जलीय पौधे, सूक्ष्मजीव और हाइड्रोपोनिक्स को एकीकृत कर डेयरी उद्योग के अपशिष्ट जल को शुद्ध करती है। यह तकनीक न केवल प्रदूषण नियंत्रण में कारगर है, बल्कि उपचारित जल और जैविक अवशेषों को कृषि व ऊर्जा उत्पादन में पुनः उपयोग योग्य बनाती है।

समस्या: डेयरी अपशिष्ट जल का खतरा

पनीर, दही और चीज़ निर्माण इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल में फैट, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की अत्यधिक मात्रा होती है। जब यह जल सीधे नदियों या तालाबों में मिलता है, तो जलाशयों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। गौरतलब है कि पारंपरिक फिल्ट्रेशन तकनीकों में फिल्टर के शीघ्र अवरुद्ध हो जाने की समस्या इस क्षेत्र में एक बड़ी बाधा रही है।

तकनीक का स्वरूप: चार-चरणीय जैविक प्रणाली

प्रोफेसर काकोली करार पॉल और शोधार्थी डॉ. प्रज्ञान दास द्वारा विकसित इस प्रणाली में अपशिष्ट जल सर्वप्रथम एक वर्मी-फिल्टर रिएक्टर में प्रवेश करता है, जहाँ केंचुए बड़े जैविक अणुओं को विखंडित करते हैं और जलीय पौधों की जड़ें फिल्टर को अवरुद्ध होने से बचाती हैं। इसके बाद जल रेत की परत से गुज़रता है, जो ठोस अशुद्धियों को पृथक करती है।

तीसरे चरण में फ्लाई ऐश से निर्मित पेलेट्स जल में उपस्थित फॉस्फोरस एवं अन्य प्रदूषकों का अवशोषण करते हैं। इसके पश्चात जल कंकड़ों की परत से होकर गुज़रता है, जहाँ लाभकारी सूक्ष्मजीव अवशिष्ट प्रदूषकों को विघटित करते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स: अंतिम और सर्वाधिक प्रभावी चरण

इस प्रणाली का सबसे विशिष्ट चरण हाइड्रोपोनिक चैंबर है, जहाँ पौधों की जड़ें सीधे जल में स्थित रहती हैं। ये जड़ें जल में ऑक्सीजन निःसृत करती हैं, जिससे लाभकारी जीवाणुओं की वृद्धि त्वरित होती है और प्रदूषण स्तर में और कमी आती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह संपूर्ण प्रणाली प्रयोगशाला स्तर पर मात्र ₹10,000 की लागत में तैयार की गई है।

क्षमता और व्यावहारिक उपयोग

यह प्रणाली प्रतिदिन लगभग 30 लीटर डेयरी अपशिष्ट जल का उपचार कर सकती है और आवश्यकतानुसार इसे बड़े औद्योगिक पैमाने पर विस्तारित किया जा सकता है। उपचारित जल में फॉस्फेट जैसे पोषक तत्व बने रहते हैं, जिससे यह सिंचाई के लिए उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त, प्रक्रिया में उपयोग किए गए जलीय पौधों को पशु चारे, बायोगैस और बायोडीजल उत्पादन में प्रयुक्त किया जा सकता है।

महत्व और आगे की राह

यह तकनीक 'कचरे से संसाधन' (Waste-to-Resource) की अवधारणा को मूर्त रूप देती है — एक ऐसे समय में जब भारत के औद्योगिक जल प्रदूषण पर नियामकीय दबाव बढ़ रहा है। इस तकनीक को पेटेंट प्राप्त हो चुका है, जो इसके व्यावसायीकरण की संभावनाओं को बल देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसे डेयरी क्लस्टरों में अपनाया जाए, तो यह लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए एक सस्ती और टिकाऊ जल-उपचार विकल्प बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 की प्रयोगशाला लागत प्रभावशाली है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि औद्योगिक पैमाने पर स्केलिंग की लागत और दक्षता कितनी व्यावहारिक रहती है। पेटेंट मिलना एक सकारात्मक संकेत है, परंतु भारत में कई शोध-स्तरीय तकनीकें व्यावसायीकरण की दहलीज़ पर अटक जाती हैं। सरकार और उद्योग जगत की साझेदारी के बिना यह नवाचार प्रयोगशाला की चारदीवारी तक ही सीमित रह सकता है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

NIT राउरकेला की यह जल-उपचार तकनीक क्या है?
यह एक पेटेंटेड बहु-स्तरीय जैविक प्रणाली है जिसमें केंचुए, जलीय पौधे, फ्लाई ऐश पेलेट्स, सूक्ष्मजीव और हाइड्रोपोनिक्स को एकीकृत कर डेयरी उद्योग के अपशिष्ट जल को शुद्ध किया जाता है। यह तकनीक ₹10,000 की लागत में प्रतिदिन 30 लीटर दूषित जल का उपचार कर सकती है।
इस तकनीक में केंचुओं की क्या भूमिका है?
केंचुए अपशिष्ट जल में मौजूद बड़े जैविक अणुओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में विखंडित करते हैं, जिससे सूक्ष्मजीव उन्हें आसानी से नष्ट कर सकते हैं। साथ ही, जलीय पौधों की जड़ें फिल्टर को अवरुद्ध होने से बचाती हैं — जो पारंपरिक तकनीकों की प्रमुख कमज़ोरी थी।
उपचारित पानी का उपयोग कहाँ किया जा सकता है?
उपचारित जल में फॉस्फेट जैसे पोषक तत्व बने रहते हैं, इसलिए इसे सीधे कृषि सिंचाई में उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, प्रक्रिया में उपयोग किए गए जलीय पौधों से पशु चारा, बायोगैस और बायोडीजल भी तैयार किया जा सकता है।
क्या यह तकनीक केवल डेयरी उद्योग के लिए है?
फिलहाल यह प्रणाली विशेष रूप से डेयरी अपशिष्ट जल — जिसमें फैट, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की अधिकता होती है — के उपचार के लिए विकसित की गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसे आवश्यकतानुसार बड़े औद्योगिक पैमाने पर भी विस्तारित किया जा सकता है।
इस शोध का व्यावसायिक भविष्य क्या है?
तकनीक को पेटेंट मिल चुका है, जो इसके व्यावसायीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालाँकि, प्रयोगशाला से औद्योगिक पैमाने तक की स्केलिंग और उद्योग-अनुसंधान साझेदारी इसके व्यापक अपनाए जाने की कुंजी होगी।
राष्ट्र प्रेस
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