NIT राउरकेला की पेटेंटेड तकनीक: केंचुए और हाइड्रोपोनिक्स से डेयरी उद्योग का प्रदूषित पानी होगा साफ
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के वैज्ञानिकों ने 22 मई 2026 को एक पेटेंटेड बहु-स्तरीय जैविक प्रणाली विकसित की है, जो केंचुए, जलीय पौधे, सूक्ष्मजीव और हाइड्रोपोनिक्स को एकीकृत कर डेयरी उद्योग के अपशिष्ट जल को शुद्ध करती है। यह तकनीक न केवल प्रदूषण नियंत्रण में कारगर है, बल्कि उपचारित जल और जैविक अवशेषों को कृषि व ऊर्जा उत्पादन में पुनः उपयोग योग्य बनाती है।
समस्या: डेयरी अपशिष्ट जल का खतरा
पनीर, दही और चीज़ निर्माण इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल में फैट, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की अत्यधिक मात्रा होती है। जब यह जल सीधे नदियों या तालाबों में मिलता है, तो जलाशयों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है। गौरतलब है कि पारंपरिक फिल्ट्रेशन तकनीकों में फिल्टर के शीघ्र अवरुद्ध हो जाने की समस्या इस क्षेत्र में एक बड़ी बाधा रही है।
तकनीक का स्वरूप: चार-चरणीय जैविक प्रणाली
प्रोफेसर काकोली करार पॉल और शोधार्थी डॉ. प्रज्ञान दास द्वारा विकसित इस प्रणाली में अपशिष्ट जल सर्वप्रथम एक वर्मी-फिल्टर रिएक्टर में प्रवेश करता है, जहाँ केंचुए बड़े जैविक अणुओं को विखंडित करते हैं और जलीय पौधों की जड़ें फिल्टर को अवरुद्ध होने से बचाती हैं। इसके बाद जल रेत की परत से गुज़रता है, जो ठोस अशुद्धियों को पृथक करती है।
तीसरे चरण में फ्लाई ऐश से निर्मित पेलेट्स जल में उपस्थित फॉस्फोरस एवं अन्य प्रदूषकों का अवशोषण करते हैं। इसके पश्चात जल कंकड़ों की परत से होकर गुज़रता है, जहाँ लाभकारी सूक्ष्मजीव अवशिष्ट प्रदूषकों को विघटित करते हैं।
हाइड्रोपोनिक्स: अंतिम और सर्वाधिक प्रभावी चरण
इस प्रणाली का सबसे विशिष्ट चरण हाइड्रोपोनिक चैंबर है, जहाँ पौधों की जड़ें सीधे जल में स्थित रहती हैं। ये जड़ें जल में ऑक्सीजन निःसृत करती हैं, जिससे लाभकारी जीवाणुओं की वृद्धि त्वरित होती है और प्रदूषण स्तर में और कमी आती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह संपूर्ण प्रणाली प्रयोगशाला स्तर पर मात्र ₹10,000 की लागत में तैयार की गई है।
क्षमता और व्यावहारिक उपयोग
यह प्रणाली प्रतिदिन लगभग 30 लीटर डेयरी अपशिष्ट जल का उपचार कर सकती है और आवश्यकतानुसार इसे बड़े औद्योगिक पैमाने पर विस्तारित किया जा सकता है। उपचारित जल में फॉस्फेट जैसे पोषक तत्व बने रहते हैं, जिससे यह सिंचाई के लिए उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त, प्रक्रिया में उपयोग किए गए जलीय पौधों को पशु चारे, बायोगैस और बायोडीजल उत्पादन में प्रयुक्त किया जा सकता है।
महत्व और आगे की राह
यह तकनीक 'कचरे से संसाधन' (Waste-to-Resource) की अवधारणा को मूर्त रूप देती है — एक ऐसे समय में जब भारत के औद्योगिक जल प्रदूषण पर नियामकीय दबाव बढ़ रहा है। इस तकनीक को पेटेंट प्राप्त हो चुका है, जो इसके व्यावसायीकरण की संभावनाओं को बल देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसे डेयरी क्लस्टरों में अपनाया जाए, तो यह लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए एक सस्ती और टिकाऊ जल-उपचार विकल्प बन सकती है।