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सतत जल प्रबंधन में भारत बन सकता है विश्व नेता, प्रकृति-आधारित तकनीक से मिलेगी राह: विशेषज्ञ

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सतत जल प्रबंधन में भारत बन सकता है विश्व नेता, प्रकृति-आधारित तकनीक से मिलेगी राह: विशेषज्ञ

सारांश

भारत का 80% सीवेज बिना उपचार के बह जाता है — लेकिन एक देसी स्टार्टअप ने गाय के पाचन तंत्र से प्रेरणा लेकर ऐसी तकनीक बनाई है जिसमें न बिजली चाहिए, न रसायन। 24 राज्यों और तीन देशों में फैले इस समाधान ने 9 अरब लीटर गंदे पानी को साफ किया है।

मुख्य बातें

भारत का लगभग 80 प्रतिशत सीवेज बिना उपचार के जल स्रोतों में बह जाता है, जिससे व्यापक प्रदूषण होता है।
ईसीओएसटीपी टेक्नोलॉजीज ने आईआईटी जम्मू के साथ मिलकर गाय के पाचन तंत्र पर आधारित ग्रेविटी-बेस्ड वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट प्रणाली विकसित की है।
इस प्रणाली में बिजली, रसायन या मैकेनिकल उपकरण की आवश्यकता नहीं होती।
अब तक 9 अरब लीटर से अधिक अपशिष्ट जल का शोधन किया जा चुका है।
स्टार्टअप 24 राज्यों में सक्रिय है और बांग्लादेश, मालदीव, मोज़ाम्बिक व केन्या में विस्तार कर रहा है।
विशेषज्ञ भरथन ने समर दावोस 2026 में कहा कि प्रकृति-आधारित समाधान भारत को वैश्विक जल नेतृत्व दिला सकते हैं।

डालियान (चीन) में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 'एनुअल मीटिंग ऑफ द न्यू चैंपियंस' (समर दावोस) के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि भारत, प्रकृति से प्रेरित अभिनव तकनीकों को अपनाकर सतत जल प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। ये तकनीकें ऊर्जा की खपत को घटाती हैं और अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग को अधिक प्रभावी बनाती हैं।

भारत की वेस्टवॉटर चुनौती

ईसीओएसटीपी टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और सीईओ भरथन ने समर दावोस के मंच पर कहा कि भारत में बढ़ता अपशिष्ट जल संकट, घरेलू इनोवेशन के ज़रिए पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करने का एक बड़ा अवसर है। उन्होंने बताया कि देश का लगभग 80 प्रतिशत सीवेज बिना किसी उपचार के ही नदियों, झीलों और जल स्रोतों में बहा दिया जाता है, जिससे व्यापक जल प्रदूषण फैलता है।

बायोमिमिक्री से प्रेरित अनूठी तकनीक

ईसीओएसटीपी टेक्नोलॉजीज ने बायोमिमिक्री — यानी प्राकृतिक प्रक्रियाओं की नकल करने वाली विज्ञान शाखा — से प्रेरणा लेकर एक विशेष वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट प्रणाली विकसित की है। इस प्रणाली में गाय के पाचन तंत्र के चार कक्षोंरूमेन, रेटिकुलम, ओमासम और एबोमासम — की कार्यप्रणाली को आधार बनाया गया है।

भरथन के अनुसार, पारंपरिक सीवेज ट्रीटमेंट प्रणालियाँ एअरेशन प्रक्रियाओं पर निर्भर होती हैं, जिनमें भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है और परिचालन लागत भी अधिक होती है। इसके विपरीत, कंपनी का ग्रेविटी-बेस्ड सिस्टम विशेष रूप से तैयार किए गए बैक्टीरिया और भूमिगत चैंबर का उपयोग करता है — जिसमें न बिजली, न रसायन और न ही कोई मैकेनिकल उपकरण की आवश्यकता होती है।

आईआईटी जम्मू के साथ साझेदारी

यह तकनीक आईआईटी जम्मू के साथ संयुक्त रूप से विकसित की गई है। इसे इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि सीवेज को पुनः उपयोग योग्य स्वच्छ जल में परिवर्तित किया जा सके — बिना किसी ऑपरेटर, गतिशील पुर्जों या निरंतर विद्युत आपूर्ति की ज़रूरत के। भरथन ने बताया कि अब तक इस प्रणाली के माध्यम से भारत भर में 9 अरब लीटर से अधिक अपशिष्ट जल का शोधन किया जा चुका है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विस्तार

यह स्टार्टअप वर्तमान में 24 राज्यों में अपनी सेवाएँ दे रहा है और बांग्लादेश तथा मालदीव तक अपना कारोबार विस्तारित कर चुका है। कंपनी अब मोज़ाम्बिक और केन्या जैसे अफ्रीकी बाज़ारों में भी टिकाऊ जल उपचार समाधान लेकर प्रवेश कर रही है।

विशेषज्ञ की राय: तकनीकी समाधान ज़रूरी

भरथन ने स्पष्ट किया कि भारत में अपशिष्ट जल की समस्या केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक गहरी तकनीकी चुनौती भी है — क्योंकि मौजूदा ट्रीटमेंट प्रणालियाँ अक्सर महंगी और ऊर्जा-गहन होती हैं। उनके अनुसार, प्रकृति-आधारित समाधान भारतीय परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त हैं और ये जल संरक्षण तथा पर्यावरण प्रदूषण में कमी लाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यह दृष्टिकोण भारत को न केवल घरेलू जल संकट से उबारने, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक हरित तकनीक निर्यातक के रूप में स्थापित करने की संभावना रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और ईसीओएसटीपी जैसे स्टार्टअप का उभरना इस बात का संकेत है कि समाधान सरकारी ढाँचे से बाहर से आ रहे हैं। लेकिन 9 अरब लीटर की उपलब्धि, देश की विशाल ज़रूरत के सामने अभी भी एक छोटी बूँद है। असली सवाल यह है कि क्या इस तकनीक को नगर निगमों और सरकारी जल बोर्डों के साथ स्केल किया जा सकता है — जहाँ खरीद प्रक्रियाएँ धीमी हैं और परंपरागत ठेकेदारों का वर्चस्व है। समर दावोस जैसे मंचों पर वाहवाही मिलना और ज़मीन पर बदलाव लाना — ये दोनों अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईसीओएसटीपी टेक्नोलॉजीज की वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट तकनीक क्या है?
ईसीओएसटीपी टेक्नोलॉजीज ने बायोमिमिक्री से प्रेरित एक ग्रेविटी-बेस्ड सीवेज ट्रीटमेंट प्रणाली विकसित की है, जो गाय के पाचन तंत्र के चार कक्षों की कार्यप्रणाली पर आधारित है। इसमें बिजली, रसायन या मैकेनिकल उपकरण की ज़रूरत नहीं होती और यह सीवेज को पुनः उपयोग योग्य स्वच्छ जल में बदल देती है।
भारत में अपशिष्ट जल की समस्या कितनी गंभीर है?
भारत का लगभग 80 प्रतिशत सीवेज बिना किसी उपचार के नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों में बहा दिया जाता है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
ईसीओएसटीपी की तकनीक पारंपरिक सीवेज ट्रीटमेंट से कैसे अलग है?
पारंपरिक सीवेज ट्रीटमेंट प्रणालियाँ एअरेशन पर निर्भर होती हैं जिनमें भारी ऊर्जा खपत और उच्च परिचालन लागत होती है। ईसीओएसटीपी का सिस्टम गुरुत्वाकर्षण और विशेष बैक्टीरिया का उपयोग करता है, जिससे बिजली और रखरखाव की लागत लगभग शून्य हो जाती है।
यह तकनीक किन देशों में उपलब्ध है?
यह तकनीक भारत के 24 राज्यों में उपलब्ध है और बांग्लादेश तथा मालदीव तक विस्तारित हो चुकी है। कंपनी अब मोज़ाम्बिक और केन्या जैसे अफ्रीकी बाज़ारों में भी प्रवेश कर रही है।
समर दावोस 2026 में भारत के जल प्रबंधन पर क्या चर्चा हुई?
डालियान (चीन) में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 'एनुअल मीटिंग ऑफ द न्यू चैंपियंस' में विशेषज्ञों ने कहा कि भारत प्रकृति-आधारित तकनीकों के ज़रिए सतत जल प्रबंधन में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है। ईसीओएसटीपी के सीईओ भरथन ने बताया कि इस तरह के घरेलू इनोवेशन पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ पहुँचा सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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