NIT राउरकेला की 3-D कंपोजिट तकनीक को पेटेंट, विमान-अंतरिक्ष यान होंगे हल्के और मज़बूत
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक अभिनव 3-डी रीइन्फोर्स्ड हाइब्रिड कंपोजिट तकनीक विकसित की है, जो विमान, अंतरिक्ष यान, रक्षा उपकरण और पवन ऊर्जा संरचनाओं में उपयोग होने वाली सामग्री को पहले से कहीं अधिक मज़बूत, टिकाऊ और क्षति-सहनशील बना सकती है। इस नवाचार को 31 जुलाई 2026 तक आधिकारिक पेटेंट प्राप्त हो चुका है, जो भारत के एयरोस्पेस सामग्री अनुसंधान में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
तकनीक की पृष्ठभूमि और ज़रूरत
आधुनिक वाणिज्यिक विमानों, लड़ाकू जेट, रॉकेट और उपग्रह प्रक्षेपण यानों में धातुओं की जगह फाइबर-रीइन्फोर्स्ड पॉलिमर (FRP) कंपोजिट का व्यापक उपयोग होता है। ये सामग्री वज़न में अत्यंत हल्की होती हैं, फिर भी मज़बूती में धातुओं को टक्कर देती हैं। इनका उपयोग हाई-स्पीड रेल, पवन टरबाइन और हाइड्रोजन भंडारण टैंकों में भी होता है।
हालाँकि, दीर्घकालिक अत्यधिक दबाव और भार के कारण इन कंपोजिट सामग्रियों में दरारें पड़ने, परतों के अलग होने और संरचनात्मक मज़बूती घटने जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक एयरोस्पेस उद्योग हल्की और टिकाऊ सामग्री की खोज में अरबों डॉलर निवेश कर रहा है।
नई तकनीक में क्या है ख़ास
NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने ग्लास फाइबर और ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स को मिलाकर एक नया 3-डी रीइन्फोर्स्ड हाइब्रिड कंपोजिट तैयार किया है। निर्माण प्रक्रिया के दौरान इन दोनों सामग्रियों को कंपोजिट की मोटाई की दिशा में व्यवस्थित किया जाता है, जिससे फाइबर, ग्राफीन और एपॉक्सी मैट्रिक्स के बीच बेहतर आंतरिक जुड़ाव बनता है।
इस तकनीक की विशेषता यह है कि ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स का उपयोग बिना किसी रासायनिक संशोधन के किया गया है। शोधकर्ताओं ने पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया में केवल मामूली बदलाव करते हुए क्योरिंग के दौरान 800 वोल्ट, 50 हर्ट्ज एसी विद्युत क्षेत्र का उपयोग किया। इसका सीधा अर्थ है कि यह तकनीक मौजूदा औद्योगिक उत्पादन प्रणालियों के साथ आसानी से एकीकृत की जा सकती है — बड़े पैमाने पर ढाँचागत बदलाव की ज़रूरत नहीं।
विशेषज्ञों की राय और उपयोग क्षेत्र
NIT राउरकेला के सहायक प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार प्रस्ती के अनुसार, यह तकनीक उन सभी क्षेत्रों के लिए उपयोगी है जहाँ हल्के लेकिन अत्यधिक मज़बूत और क्षति-सहनशील सामग्री की आवश्यकता होती है। विमानों के पैनल, ऑटोमोबाइल की क्रैश संरचनाएँ, पवन टरबाइन ब्लेड, प्रेशर वेसल, समुद्री संरचनाएँ और अन्य उन्नत इंजीनियरिंग उत्पाद इसके प्रमुख उपयोग होंगे।
संस्थान के प्रोफेसर बंकिम चंद्र राय ने कहा कि यह तकनीक ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, रखरखाव लागत कम करने और सतत विनिर्माण को बढ़ावा देने में सहायक होगी। उनके अनुसार, उन्नत सामग्री के क्षेत्र में यह नवाचार आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मज़बूती देगा। गौरतलब है कि यदि विमान का वज़न कम रखते हुए उसकी मज़बूती बढ़ाई जाए, तो ईंधन की खपत घटती है और परिचालन क्षमता बढ़ती है — जो एयरलाइन उद्योग की दीर्घकालिक प्राथमिकता है।
प्रयोगशाला परिणाम और आगे की राह
संस्थान के अनुसार, प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में यह नया कंपोजिट पारंपरिक सामग्री की तुलना में अधिक मज़बूत साबित हुआ और क्षति को बेहतर तरीके से सहन करने में सक्षम रहा। शोध दल अब वास्तविक आकार की संरचनाओं पर परीक्षण और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में दीर्घकालिक टिकाऊपन के अध्ययन की योजना बना रहा है।
इस तकनीक को प्रयोगशाला से उद्योग तक पहुँचाने के लिए प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग और औद्योगिक साझेदारी पर काम शुरू हो चुका है। यह कदम भारत को वैश्विक एयरोस्पेस सामग्री बाज़ार में एक स्वतंत्र तकनीकी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।