IIT गुवाहाटी की नई तकनीक से हरित हाइड्रोजन उत्पादन में 51% की बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित शोध

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IIT गुवाहाटी की नई तकनीक से हरित हाइड्रोजन उत्पादन में 51% की बढ़ोतरी, अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित शोध

सारांश

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक विशेष कम्पोजिट कोटिंग विकसित की है जो सूर्य की रोशनी से हरित हाइड्रोजन उत्पादन को 51% तक बढ़ा देती है। यह तकनीक बुलबुला-अवरोध की पुरानी समस्या को हल करती है और अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है — हालाँकि अभी यह प्रयोगशाला स्तर पर है।

मुख्य बातें

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए नई कम्पोजिट कोटिंग तकनीक विकसित की है।
नई तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन में 51% और ऑक्सीजन उत्पादन में 44% की वृद्धि दर्ज की गई है।
तकनीक में कार्बन नाइट्राइड (प्रकाश-सक्रिय पदार्थ) को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर जोड़ा गया है।
उत्तम मन्ना और प्रो.
मोहम्मद कुरेशी के नेतृत्व में किया गया और एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
फिलहाल यह शोध प्रयोगशाला स्तर पर है और व्यापक व्यावसायिक उपयोग से पहले आगे सत्यापन आवश्यक है।

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक अभिनव कम्पोजिट कोटिंग तकनीक विकसित की है, जिससे सूर्य की रोशनी की सहायता से बनने वाले हरित हाइड्रोजन के उत्पादन में 51 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह शोध एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है और फिलहाल प्रयोगशाला स्तर पर है, जिसे आगे और सत्यापन की आवश्यकता बताई गई है।

शोध की पृष्ठभूमि और आवश्यकता

जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने की वैश्विक कोशिशों के बीच हरित हाइड्रोजन एक महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा विकल्प के रूप में उभरा है। पारंपरिक हाइड्रोजन उत्पादन प्रक्रियाओं में बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं, जबकि हरित हाइड्रोजन सूर्य के प्रकाश की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके तैयार किया जाता है — एक प्रक्रिया जिसमें प्रदूषण नगण्य होता है।

हालाँकि, इस प्रक्रिया में दो प्रमुख तकनीकी बाधाएँ चिरकाल से बनी हुई थीं। पहली, इलेक्ट्रोड पर लगी उत्प्रेरक परत समय के साथ कमज़ोर होकर अलग होने लगती थी। दूसरी, गैस के बुलबुले सतह पर चिपक जाते थे, जिससे उत्पादन की गति धीमी पड़ जाती थी।

नई कम्पोजिट कोटिंग तकनीक कैसे काम करती है

इन चुनौतियों का समाधान खोजते हुए आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक विशेष कम्पोजिट कोटिंग तैयार की। इसमें कार्बन नाइट्राइड नामक प्रकाश-सक्रिय पदार्थ को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर जोड़ा गया।

पारंपरिक पद्धतियों में फोटोकैटेलिस्ट को सतह पर एक अलग परत के रूप में लगाया जाता था, लेकिन इस शोध में उसे सीधे कोटिंग के भीतर समाहित किया गया। इससे उत्प्रेरक अधिक सुरक्षित रहा और पानी को विभाजित करने के लिए अधिक सक्रिय सतह उपलब्ध हुई। नई परत की बदौलत गैस के बुलबुले सतह पर नहीं टिक पाते, जिससे उत्पादन प्रक्रिया निरंतर और अधिक दक्षता के साथ चलती रहती है।

शोध के मुख्य परिणाम

आईआईटी गुवाहाटी के अनुसार, इस तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन में 51 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, ऑक्सीजन उत्पादन में भी 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई। यह सुधार पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में उल्लेखनीय है — चाहे उनमें अलग बुलबुला-प्रतिरोधी परत हो या न हो।

यह शोध प्रो. उत्तम मन्ना और प्रो. मोहम्मद कुरेशी के नेतृत्व में डॉ. हृषिकेश सरमा तथा शोध विद्वारों अल्पना साहू, अंशिका चौधरी, सुमंत सरकार, सौरव मंडल और लिंगराज साहू ने मिलकर किया है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आईआईटी गुवाहाटी के रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. उत्तम मन्ना ने कहा, 'इस अध्ययन के परिणामस्वरूप हमने हाइड्रोजन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। इस तकनीक को व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है। भविष्य में अन्य उत्प्रेरकों का भी परीक्षण किया जा सकता है ताकि हरित हाइड्रोजन उत्पादन को और उन्नत बनाया जा सके।'

प्रो. मोहम्मद कुरेशी ने अगले चरण की योजना साझा करते हुए कहा, 'हम पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इस तकनीक को बेहतर फोटोकैटेलिस्ट के साथ विकसित करने की योजना बना रहे हैं। भविष्य में हम इसे बड़े उपकरणों पर लागू करने और व्यावहारिक सौर हाइड्रोजन उत्पादन प्रणालियों में इस्तेमाल करने पर भी काम करेंगे।'

आगे की राह

आईआईटी गुवाहाटी ने स्पष्ट किया है कि यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और इन निष्कर्षों को आगे व्यापक सत्यापन की आवश्यकता है। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल रही, तो यह नवीकरणीय ऊर्जा को संग्रहित करने और सौर ऊर्जा को ईंधन में बदलने वाली प्रणालियों को भी बेहतर बनाने में सहायक हो सकती है। भारत की राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन नीति के लक्ष्यों के संदर्भ में यह शोध एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन प्रयोगशाला से व्यावसायिक उत्पादन तक की दूरी भारतीय ऊर्जा अनुसंधान में अक्सर सबसे बड़ी बाधा साबित होती है। 51% की वृद्धि का दावा तभी सार्थक होगा जब यह नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों से बाहर, वास्तविक औद्योगिक परिवेश में भी टिके। गौरतलब है कि भारत की राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की महत्वाकांक्षाएँ बड़ी हैं, पर घरेलू तकनीकी नवाचार और नीति-समर्थित स्केलअप के बीच की खाई अभी भी चौड़ी है। इस शोध को सरकारी वित्तपोषण और उद्योग भागीदारी मिले तो यह उस खाई को पाटने में सहायक हो सकता है।
RashtraPress
19 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईआईटी गुवाहाटी ने हरित हाइड्रोजन उत्पादन में कितनी वृद्धि हासिल की है?
आईआईटी गुवाहाटी के शोध के अनुसार नई कम्पोजिट कोटिंग तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन में 51 प्रतिशत से अधिक और ऑक्सीजन उत्पादन में 44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और आगे व्यापक सत्यापन की आवश्यकता है।
हरित हाइड्रोजन क्या है और यह पारंपरिक हाइड्रोजन से कैसे अलग है?
हरित हाइड्रोजन सूर्य के प्रकाश की सहायता से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके तैयार किया जाता है, जिसमें ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नगण्य होता है। इसके विपरीत, पारंपरिक तरीकों से हाइड्रोजन बनाने पर बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है।
आईआईटी गुवाहाटी की नई कोटिंग तकनीक कैसे काम करती है?
इस तकनीक में कार्बन नाइट्राइड नामक प्रकाश-सक्रिय पदार्थ को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर जोड़ा गया है। फोटोकैटेलिस्ट को सीधे कोटिंग के भीतर समाहित करने से उत्प्रेरक अधिक सुरक्षित रहता है और गैस के बुलबुले सतह पर नहीं चिपकते, जिससे उत्पादन प्रक्रिया अधिक दक्षता से चलती है।
यह शोध किसने किया और कहाँ प्रकाशित हुआ है?
यह शोध आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. उत्तम मन्ना और प्रो. मोहम्मद कुरेशी के नेतृत्व में डॉ. हृषिकेश सरमा तथा शोध विद्वानों अल्पना साहू, अंशिका चौधरी, सुमंत सरकार, सौरव मंडल और लिंगराज साहू ने मिलकर किया है। इसके निष्कर्ष एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में शोध-पत्र के रूप में प्रकाशित हुए हैं।
यह तकनीक व्यावसायिक उपयोग के लिए कब तक उपलब्ध हो सकती है?
आईआईटी गुवाहाटी ने स्पष्ट किया है कि यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और व्यावसायिक उपयोग से पहले आगे सत्यापन आवश्यक है। शोधकर्ता इसे बड़े उपकरणों पर लागू करने और व्यावहारिक सौर हाइड्रोजन उत्पादन प्रणालियों में इस्तेमाल करने की योजना पर काम कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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