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NIT राउरकेला को पेटेंट: ₹45,000 की एक्सट्रूडर प्रणाली से प्लास्टिक कचरा बनेगा 3D प्रिंटर फिलामेंट

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NIT राउरकेला को पेटेंट: ₹45,000 की एक्सट्रूडर प्रणाली से प्लास्टिक कचरा बनेगा 3D प्रिंटर फिलामेंट

सारांश

NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने मात्र ₹45,000 में ऐसी एक्सट्रूडर प्रणाली बनाई है जो प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटर फिलामेंट में बदल सकती है। पेटेंट प्राप्त यह तकनीक एक साथ प्लास्टिक प्रदूषण और महँगे फिलामेंट — दोनों समस्याओं का समाधान है।

मुख्य बातें

NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने ₹45,000 की लागत में प्लास्टिक कचरे से 3D प्रिंटर फिलामेंट बनाने वाली एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की।
तकनीक का पेटेंट प्रो.
संध्यारानी बिस्वास , प्रो.
सुजीत सेन , जगदीश उदय खाटू , हिमांशु सिंह और किरण सुना को संयुक्त रूप से मिला।
प्रणाली में PID तापमान नियंत्रक और नियंत्रित शीतलन व्यवस्था शामिल है, जिससे फिलामेंट में संतोषजनक यांत्रिक गुण और आयामी सटीकता सुनिश्चित होती है।
तकनीक वाहन, विमान, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा और ड्रोन उद्योग में उपयोगी फिलामेंट उत्पादन को सक्षम बनाती है।
पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग से नए प्लास्टिक पर निर्भरता घटेगी और प्लास्टिक कचरे का पुनरुपयोग बढ़ेगा।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने मात्र ₹45,000 की लागत में एक अभिनव एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की है, जो प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटिंग के लिए उपयोगी कंपोजिट फिलामेंट में बदल सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधीन इस प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान ने इस तकनीक का पेटेंट भी सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है, जो पर्यावरण संरक्षण और उन्नत विनिर्माण — दोनों क्षेत्रों में एक साथ योगदान देती है।

3D प्रिंटिंग और फिलामेंट की अहमियत

जहाँ सामान्य प्रिंटर में स्याही का उपयोग होता है, वहीं 3D प्रिंटर में फिलामेंट कच्चे माल की भूमिका निभाता है। आज यह तकनीक चिकित्सा, रक्षा और उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्रों में तेज़ी से पाँव पसार रही है — शरीर के मॉडल, कृत्रिम अंग, ड्रोन के पुर्जे, ब्रैकेट, खिलौने और सजावटी सामान सभी इसी तकनीक से तैयार हो रहे हैं।

सबसे प्रचलित विधि फ्यूज्ड डिपॉजिशन मॉडलिंग (FDM) है, जिसमें प्लास्टिक फिलामेंट को गर्म करके पिघलाया जाता है और फिर परत-दर-परत जमा करके वांछित वस्तु तैयार की जाती है। हालाँकि, अच्छी गुणवत्ता का फिलामेंट महँगा होता है और कमज़ोर गुणवत्ता वाले फिलामेंट से बनी वस्तुओं की मज़बूती व सटीकता प्रभावित होती है।

पुरानी समस्याएँ और नई तकनीक का समाधान

पुनर्चक्रित प्लास्टिक से फिलामेंट बनाने के प्रयास पहले भी हुए हैं, लेकिन अधिक प्रसंस्करण लागत, सामग्री की बर्बादी और कम मज़बूती जैसी बाधाएँ बनी रहीं। NIT राउरकेला की नई एक्सट्रूडर प्रणाली इन्हीं चुनौतियों का समाधान करती है।

इस प्रणाली में नियंत्रित शीतलन व्यवस्था और PID तापमान नियंत्रक सहित कई उन्नत घटक एकीकृत किए गए हैं, जिससे फिलामेंट निर्माण प्रक्रिया पर बेहतर नियंत्रण संभव होता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस तकनीक से तैयार फिलामेंट में संतोषजनक यांत्रिक गुण और अपेक्षित आयामी सटीकता पाई गई है। इसमें पुनर्चक्रित प्लास्टिक के साथ अन्य सुदृढ़ीकरण सामग्री भी मिलाई जा सकती है, जिससे फिलामेंट और अधिक मज़बूत व टिकाऊ बनता है।

शोधकर्ताओं की राय

NIT राउरकेला के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. संध्यारानी बिस्वास ने कहा कि यह तकनीक फिलामेंट उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति है। उनके अनुसार, इससे बेहतर यांत्रिक गुणों वाले पुर्जे बनाए जा सकते हैं और पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग से पर्यावरण को भी लाभ होगा।

केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. सुजीत सेन ने बताया कि यह प्रणाली विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक को उपयोगी 3D प्रिंटर फिलामेंट में परिवर्तित कर सकती है। उन्होंने कहा कि इससे एक चक्रीय व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिसमें प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय मूल्यवान उत्पादों में रूपांतरित किया जाए।

उपयोग के संभावित क्षेत्र

इस तकनीक से तैयार फिलामेंट का अनुप्रयोग कई उद्योगों में संभव है — वाहन एवं विमान उद्योग में विशेष पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स व उपभोक्ता उत्पाद, शैक्षणिक संस्थान व शोध प्रयोगशालाएँ, दंत चिकित्सा मॉडल, चिकित्सकीय स्कैफोल्ड, मरीज़-अनुकूलित कृत्रिम अंग तथा ड्रोन के हल्के एवं मज़बूत पुर्जे।

यह पेटेंट प्रो. संध्यारानी बिस्वास, प्रो. सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। गौरतलब है कि यह तकनीक एक साथ दो बड़ी समस्याओं — प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन और सस्ते, मज़बूत 3D फिलामेंट की उपलब्धता — का समाधान प्रस्तुत करती है।

आगे की संभावनाएँ

यह शोध ऐसे समय में आया है जब भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या गंभीर होती जा रही है और 3D प्रिंटिंग की माँग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि इस तकनीक का व्यावसायिक विस्तार होता है, तो यह न केवल नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि छोटे उद्यमियों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए किफ़ायती फिलामेंट उत्पादन का रास्ता भी खोलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 की लागत वाली यह एक्सट्रूडर प्रणाली प्रभावशाली है, लेकिन असली कसौटी प्रयोगशाला से उद्योग तक की यात्रा होगी — जहाँ भारतीय शोध अक्सर अटक जाता है। पेटेंट मिलना एक पड़ाव है, व्यावसायीकरण मंज़िल नहीं। यह भी देखना होगा कि क्या यह तकनीक बड़े पैमाने पर उत्पादन में वही गुणवत्ता बनाए रख सकती है जो प्रयोगशाला में मिली। भारत में 3D प्रिंटिंग बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है, और यदि NIT राउरकेला इस तकनीक को स्टार्टअप या MSME तक पहुँचाने में सफल होता है, तो यह 'वेस्ट टू वेल्थ' का एक ठोस उदाहरण बन सकता है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

NIT राउरकेला की नई एक्सट्रूडर प्रणाली क्या है?
यह एक कम लागत वाली तकनीक है जो प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटर के लिए उपयोगी कंपोजिट फिलामेंट में बदलती है। इसे मात्र ₹45,000 की लागत में विकसित किया गया है और इसका पेटेंट भी हासिल किया जा चुका है।
3D प्रिंटर फिलामेंट बनाने में पुनर्चक्रित प्लास्टिक की क्या चुनौतियाँ थीं?
पहले की कोशिशों में अधिक प्रसंस्करण लागत, सामग्री की बर्बादी और कम मज़बूती प्रमुख बाधाएँ थीं। NIT राउरकेला की प्रणाली में PID तापमान नियंत्रक और नियंत्रित शीतलन व्यवस्था से इन समस्याओं पर काबू पाया गया है।
इस तकनीक से तैयार फिलामेंट का उपयोग कहाँ-कहाँ हो सकता है?
इस फिलामेंट का उपयोग वाहन व विमान उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा (कृत्रिम अंग, दंत मॉडल, स्कैफोल्ड), ड्रोन के पुर्जे और शैक्षणिक शोध प्रयोगशालाओं में किया जा सकता है।
इस पेटेंट से पर्यावरण को क्या फायदा होगा?
यह तकनीक प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय मूल्यवान फिलामेंट में बदलने की सुविधा देती है, जिससे नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम होगी और एक चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
यह पेटेंट किन शोधकर्ताओं को मिला है?
यह पेटेंट NIT राउरकेला के प्रो. संध्यारानी बिस्वास, प्रो. सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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