NIT राउरकेला को पेटेंट: ₹45,000 की एक्सट्रूडर प्रणाली से प्लास्टिक कचरा बनेगा 3D प्रिंटर फिलामेंट
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने मात्र ₹45,000 की लागत में एक अभिनव एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की है, जो प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटिंग के लिए उपयोगी कंपोजिट फिलामेंट में बदल सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधीन इस प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान ने इस तकनीक का पेटेंट भी सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है, जो पर्यावरण संरक्षण और उन्नत विनिर्माण — दोनों क्षेत्रों में एक साथ योगदान देती है।
3D प्रिंटिंग और फिलामेंट की अहमियत
जहाँ सामान्य प्रिंटर में स्याही का उपयोग होता है, वहीं 3D प्रिंटर में फिलामेंट कच्चे माल की भूमिका निभाता है। आज यह तकनीक चिकित्सा, रक्षा और उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्रों में तेज़ी से पाँव पसार रही है — शरीर के मॉडल, कृत्रिम अंग, ड्रोन के पुर्जे, ब्रैकेट, खिलौने और सजावटी सामान सभी इसी तकनीक से तैयार हो रहे हैं।
सबसे प्रचलित विधि फ्यूज्ड डिपॉजिशन मॉडलिंग (FDM) है, जिसमें प्लास्टिक फिलामेंट को गर्म करके पिघलाया जाता है और फिर परत-दर-परत जमा करके वांछित वस्तु तैयार की जाती है। हालाँकि, अच्छी गुणवत्ता का फिलामेंट महँगा होता है और कमज़ोर गुणवत्ता वाले फिलामेंट से बनी वस्तुओं की मज़बूती व सटीकता प्रभावित होती है।
पुरानी समस्याएँ और नई तकनीक का समाधान
पुनर्चक्रित प्लास्टिक से फिलामेंट बनाने के प्रयास पहले भी हुए हैं, लेकिन अधिक प्रसंस्करण लागत, सामग्री की बर्बादी और कम मज़बूती जैसी बाधाएँ बनी रहीं। NIT राउरकेला की नई एक्सट्रूडर प्रणाली इन्हीं चुनौतियों का समाधान करती है।
इस प्रणाली में नियंत्रित शीतलन व्यवस्था और PID तापमान नियंत्रक सहित कई उन्नत घटक एकीकृत किए गए हैं, जिससे फिलामेंट निर्माण प्रक्रिया पर बेहतर नियंत्रण संभव होता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस तकनीक से तैयार फिलामेंट में संतोषजनक यांत्रिक गुण और अपेक्षित आयामी सटीकता पाई गई है। इसमें पुनर्चक्रित प्लास्टिक के साथ अन्य सुदृढ़ीकरण सामग्री भी मिलाई जा सकती है, जिससे फिलामेंट और अधिक मज़बूत व टिकाऊ बनता है।
शोधकर्ताओं की राय
NIT राउरकेला के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. संध्यारानी बिस्वास ने कहा कि यह तकनीक फिलामेंट उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति है। उनके अनुसार, इससे बेहतर यांत्रिक गुणों वाले पुर्जे बनाए जा सकते हैं और पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग से पर्यावरण को भी लाभ होगा।
केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. सुजीत सेन ने बताया कि यह प्रणाली विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक को उपयोगी 3D प्रिंटर फिलामेंट में परिवर्तित कर सकती है। उन्होंने कहा कि इससे एक चक्रीय व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिसमें प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय मूल्यवान उत्पादों में रूपांतरित किया जाए।
उपयोग के संभावित क्षेत्र
इस तकनीक से तैयार फिलामेंट का अनुप्रयोग कई उद्योगों में संभव है — वाहन एवं विमान उद्योग में विशेष पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स व उपभोक्ता उत्पाद, शैक्षणिक संस्थान व शोध प्रयोगशालाएँ, दंत चिकित्सा मॉडल, चिकित्सकीय स्कैफोल्ड, मरीज़-अनुकूलित कृत्रिम अंग तथा ड्रोन के हल्के एवं मज़बूत पुर्जे।
यह पेटेंट प्रो. संध्यारानी बिस्वास, प्रो. सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। गौरतलब है कि यह तकनीक एक साथ दो बड़ी समस्याओं — प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन और सस्ते, मज़बूत 3D फिलामेंट की उपलब्धता — का समाधान प्रस्तुत करती है।
आगे की संभावनाएँ
यह शोध ऐसे समय में आया है जब भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या गंभीर होती जा रही है और 3D प्रिंटिंग की माँग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि इस तकनीक का व्यावसायिक विस्तार होता है, तो यह न केवल नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि छोटे उद्यमियों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए किफ़ायती फिलामेंट उत्पादन का रास्ता भी खोलेगी।