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जगदीशचंद्र माथुर: 12 वर्ष में शुरू हुई लेखन यात्रा, 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' नाम देने वाले हिंदी नाटककार

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जगदीशचंद्र माथुर: 12 वर्ष में शुरू हुई लेखन यात्रा, 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' नाम देने वाले हिंदी नाटककार

सारांश

12 वर्ष की आयु में कलम उठाने वाले जगदीशचंद्र माथुर ने हिंदी रंगमंच को नई ऊँचाई दी और भारतीय प्रसारण को 'आकाशवाणी' व 'दूरदर्शन' जैसे सांस्कृतिक नाम दिए। उनकी विरासत साहित्य और संस्थाओं — दोनों में जीवित है।

मुख्य बातें

जगदीशचंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ।
मात्र 12 वर्ष की आयु में 1929 में 'बाल सखा' के लिए 'मुर्खेश्वर राजा' प्रहसन और 'लवकुश' नाटक लिखा।
1937 में लिखे एकांकी 'भोर का तारा' में स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना और जन-पीड़ा को स्वर दिया।
1954 में आकाशवाणी (AIR) के महानिदेशक बने और ऑल इंडिया रेडियो को 'आकाशवाणी' नाम दिया।
1959 में भारतीय टेलीविजन को 'दूरदर्शन' नाम देने का श्रेय माथुर को ही जाता है।
प्रमुख कृतियों में 'भोर का तारा' , 'विजय की बेला' और 'कोणार्क' शामिल हैं।

हिंदी रंगमंच के शिखर पुरुष जगदीशचंद्र माथुर ने मात्र 12 वर्ष की आयु में अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ की और आगे चलकर भारतीय सूचना-प्रसारण जगत को 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' जैसे अमर नाम दिए। उनका साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था — वह स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना, ग्रामीण जीवन की सादगी और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा का सशक्त वाहक था। 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में खुर्जा के निकट एक गाँव में जन्मे माथुर की रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

बचपन और साहित्यिक संस्कार

जगदीशचंद्र माथुर का बचपन एक छोटे कस्बे में बीता, जहाँ उन्होंने ग्रामीण जीवन को बहुत निकट से देखा। प्रकृति की सुंदरता, गाँव के लोगों का सादा जीवन और लोक संस्कृति की समृद्ध परंपराओं ने उनकी रचनाशीलता को गहरे रंग दिए। उनके पिता एक आदर्शवादी शिक्षक थे जो चाहते थे कि उनका पुत्र और उनके विद्यार्थी उनसे भी अधिक योग्य बनें — इसी संस्कार ने माथुर को दूसरी-तीसरी कक्षा से ही विद्यालय के कार्यक्रमों में अभिनय की ओर प्रेरित किया।

एक ललित निबंध में उन्होंने स्वयं लिखा था: 'सौंदर्य मेरी साधना है, किंतु पुरुषार्थ मेरी सौंदर्य साधना से भी परे लोकोत्तर सत्य है।' इन शब्दों में उनके व्यक्तित्व का सार छिपा है — सौंदर्यबोध और कर्मठता का अद्भुत संगम।

मुख्य साहित्यिक घटनाक्रम

माथुर का साहित्यिक जीवन 1929 में प्रारंभ हुआ जब वे केवल 12 वर्ष के थे। उन्होंने बाल पत्रिका 'बाल सखा' के लिए 'मुर्खेश्वर राजा' नामक प्रहसन लिखा और उसी वर्ष 'लवकुश' नाटक की भी रचना की। यह ऐसे समय में आया जब भारत अभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन था और स्वतंत्रता आंदोलन की लहरें पूरे देश में फैल रही थीं।

1937 में उन्होंने एकांकी 'भोर का तारा' लिखा, जिसमें सरकारी व्यवस्था का अंग बन जाने की पीड़ा और जन-चेतना जगाने की आकांक्षा एक साथ मुखरित होती है। उनकी प्रमुख कृतियों — 'भोर का तारा', 'विजय की बेला' और 'कोणार्क' — में स्वतंत्रता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

नाट्य-लेखन की विशिष्ट शैली

माथुर ने अपने नाट्य लेखन के लिए इतिहास और पुराण का आश्रय लिया, किंतु उनका उद्देश्य भूतकाल का पुनर्कथन नहीं, बल्कि समकालीन समस्याओं का चित्रण था। गौरतलब है कि उन्होंने नाटक, एकांकी, निबंध और रेखाचित्र जैसी विधाओं को अपनाया और विभिन्न पत्रिकाओं में समय-समय पर उनके लेख प्रकाशित हुए। उनका साहित्य-क्षेत्र विषय की दृष्टि से असीम था, भले ही उन्होंने चुनिंदा विधाओं में ही लिखा।

आकाशवाणी और दूरदर्शन को नई पहचान

देश की स्वतंत्रता के बाद निर्माण के नए दौर में माथुर ने प्रसारण जगत को भी अपनी दूरदृष्टि से संवारा। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) का नाम बदलकर 'आकाशवाणी' किया — एक ऐसा नाम जो भारतीय संवेदना और संस्कृति से सीधे जुड़ता है। 1954 में वे आकाशवाणी के महानिदेशक बने और इस पद पर रहते हुए अनेक कलाकारों और साहित्यकारों को राष्ट्रीय प्रसारण से जोड़ा।

1959 में जब भारत में टेलीविजन का सूत्रपात हुआ, तब भी यह माथुर ही थे जिन्होंने उसे 'दूरदर्शन' नाम दिया — एक ऐसा शब्द जो दशकों बाद भी भारतीय पहचान का पर्याय बना हुआ है। 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' — ये केवल संस्थाओं के नाम नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।

विरासत और महत्व

जगदीशचंद्र माथुर को याद करना भारत में सूचना-संचार माध्यमों की क्रांति को याद करना है। उन्होंने साहित्य और प्रशासन — दोनों क्षेत्रों में ऐसी छाप छोड़ी जो आज भी अमिट है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को यह स्मरण कराती रहेंगी कि साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बशर्ते दृष्टि राष्ट्रीय हो। 'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' जैसे नाम देकर उन्होंने सिद्ध किया कि भाषाई संवेदनशीलता नीति-निर्माण का भी हिस्सा हो सकती है — एक सबक जो आज के डिजिटल युग में भी उतना ही प्रासंगिक है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उन्हें केवल नाटककार के रूप में याद करती है, जबकि भारतीय सार्वजनिक प्रसारण की सांस्कृतिक नींव रखने में उनका योगदान उतना ही बड़ा है।
RashtraPress
30 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगदीशचंद्र माथुर कौन थे?
जगदीशचंद्र माथुर हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार, एकांकीकार और प्रशासक थे जिनका जन्म 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। वे 1954 में आकाशवाणी के महानिदेशक बने और उन्होंने भारतीय टेलीविजन को 'दूरदर्शन' नाम दिया।
जगदीशचंद्र माथुर ने लेखन कब शुरू किया?
माथुर ने 1929 में मात्र 12 वर्ष की आयु में लेखन शुरू किया। उन्होंने 'बाल सखा' पत्रिका के लिए 'मुर्खेश्वर राजा' नामक प्रहसन और उसी वर्ष 'लवकुश' नाटक की रचना की।
'आकाशवाणी' और 'दूरदर्शन' नाम किसने दिए?
ये दोनों नाम जगदीशचंद्र माथुर ने दिए। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) का नाम बदलकर 'आकाशवाणी' किया और 1959 में जब भारत में टेलीविजन प्रसारण शुरू हुआ, तब उसे 'दूरदर्शन' नाम दिया।
जगदीशचंद्र माथुर की प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?
माथुर की प्रमुख रचनाओं में 'भोर का तारा' (1937), 'विजय की बेला', 'कोणार्क' और 'लवकुश' शामिल हैं। इनके अलावा उन्होंने निबंध और रेखाचित्र भी लिखे जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।
माथुर के साहित्य में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव कैसे दिखता है?
माथुर ने ब्रिटिश शासन और जन-पीड़ा को निकट से देखा था, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट है। उन्होंने इतिहास और पुराण के पात्रों के माध्यम से समकालीन दमन और स्वतंत्रता की आकांक्षा को अभिव्यक्त किया, विशेषकर 'भोर का तारा' और 'विजय की बेला' में।
राष्ट्र प्रेस
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