जगदीशचंद्र माथुर: हिंदी नाटक और रेडियो के वह शिल्पकार जिन्होंने आकाशवाणी से घर-घर पहुँचाई हिंदी

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
जगदीशचंद्र माथुर: हिंदी नाटक और रेडियो के वह शिल्पकार जिन्होंने आकाशवाणी से घर-घर पहुँचाई हिंदी

सारांश

जगदीशचंद्र माथुर — ICS अधिकारी, आकाशवाणी के महानिदेशक और 'कोणार्क' जैसे कालजयी नाटकों के रचयिता — ने हिंदी साहित्य और प्रसारण को एक साथ समृद्ध किया। 16 जुलाई 1917 को जन्मे और 14 मई 1978 को दिवंगत हुए माथुर की विरासत आज भी हिंदी नाट्य-परंपरा का आधार-स्तंभ है।

मुख्य बातें

जगदीशचंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई 1917 को शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ; निधन 14 मई 1978 को।
उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस (ICS) में चयन के बाद आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में कार्य किया।
प्रमुख कृतियों में 'कोणार्क' , 'भोर का तारा' , 'पहला राजा' और 'शारदीया' शामिल हैं; 'कोणार्क' सर्वाधिक चर्चित रहा।
सुमित्रानंदन पंत , रामधारी सिंह 'दिनकर' और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे साहित्यकारों को रेडियो से जोड़ने में उनकी अहम भूमिका रही।
भारत में टेलीविजन की शुरुआत 1949 में उनके कार्यकाल के दौरान हुई।

हिंदी साहित्य के इतिहास में जगदीशचंद्र माथुर एक ऐसा नाम है जिन्होंने केवल शब्द नहीं लिखे, बल्कि एक पूरे युग की अभिव्यक्ति को नई दिशा दी। 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में जन्मे माथुर ने हिंदी नाटक, रंगमंच और रेडियो प्रसारण — तीनों क्षेत्रों में ऐसी छाप छोड़ी जो आज भी अमिट है। 14 मई 1978 को उनके निधन के दशकों बाद भी उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य की कक्षाओं और मंचों पर जीवंत हैं।

शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

माथुर का बचपन और शिक्षा का बड़ा हिस्सा खुर्जा और फिर प्रयाग (इलाहाबाद) में बीता। प्रयाग विश्वविद्यालय का साहित्यिक वातावरण उनके भीतर रचनात्मकता का बीज बो गया। उन्हीं दिनों उन्होंने नाटक और एकांकी लिखने शुरू किए, जो उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं 'चाँद' और 'रूपाभ' में प्रकाशित हुए। यह वह दौर था जब हिंदी साहित्य अपनी आधुनिक पहचान गढ़ रहा था, और माथुर उस प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार बन गए।

प्रशासक और साहित्यकार — दोहरी भूमिका

माथुर की मेधा केवल साहित्य तक सीमित नहीं थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका चयन प्रतिष्ठित इंडियन सिविल सर्विस (ICS) में हुआ, जो उस समय असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने बिहार सरकार में शिक्षा सचिव, भारत सरकार में आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। बाद में वे हिंदी सलाहकार के पद पर भी रहे। गौरतलब है कि इन विशाल प्रशासनिक दायित्वों के बावजूद उनका लेखन कभी नहीं रुका — यह संयोजन उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट बनाता है।

प्रमुख कृतियाँ और नाट्य-विरासत

माथुर ने नाटक को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना; उनके लिए यह समाज की गहराई को समझने और दर्शाने का औज़ार था। उनकी प्रमुख कृतियों में 'भोर का तारा', 'कोणार्क', 'ओ मेरे सपने', 'शारदीया', 'पहला राजा', 'दस तस्वीरें' और 'जिन्होंने जीना जाना' शामिल हैं। इनमें 'कोणार्क' सर्वाधिक चर्चित रहा, जिसने मंच पर व्यापक लोकप्रियता अर्जित की। उनके नाटकों में इतिहास, संस्कृति और सामाजिक प्रश्न — तीनों का सुंदर समन्वय दिखता है, जो उन्हें समकालीन नाटककारों से अलग करता है।

आकाशवाणी और रेडियो युग में योगदान

माथुर का सबसे दूरगामी योगदान शायद रेडियो और प्रसारण के क्षेत्र में रहा। जब आकाशवाणी अपने शुरुआती दौर में थी, तब उन्होंने हिंदी को घर-घर तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे उन चुनिंदा व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह 'दिनकर' और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे दिग्गज साहित्यकारों को रेडियो से जोड़ा और उनकी रचनाओं को जनसामान्य तक पहुँचाया। इसी दौर में उन्होंने हिंदी को एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह आगे बढ़ाया — यह ऐसे समय में आया जब स्वतंत्र भारत अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ कर रहा था।

टेलीविजन और संचार के नए युग से जुड़ाव

भारत में टेलीविजन की शुरुआत 1949 में हुई, जो माथुर के कार्यकाल का ही समय था। उन्होंने इस नए माध्यम को भी साहित्य और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया। यह उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण था कि वे हर नए संचार माध्यम को हिंदी और भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति का मंच बनाने में जुट जाते थे। जगदीशचंद्र माथुर की विरासत आज भी हिंदी नाटक और प्रसारण के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसकी नींव पर दशकों तक हिंदी प्रसारण टिका रहा। फिर भी मुख्यधारा की साहित्यिक चर्चाओं में उन्हें वह केंद्रीय स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी हैं — यह हिंदी आलोचना की एक बड़ी चूक है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जगदीशचंद्र माथुर कौन थे?
जगदीशचंद्र माथुर हिंदी के प्रमुख नाटककार, ICS अधिकारी और आकाशवाणी के महानिदेशक थे, जिनका जन्म 16 जुलाई 1917 को शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने हिंदी नाटक, रंगमंच और रेडियो प्रसारण तीनों को समृद्ध किया।
जगदीशचंद्र माथुर की सबसे प्रसिद्ध कृति कौन सी है?
उनका नाटक 'कोणार्क' सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय कृति मानी जाती है, जिसने हिंदी रंगमंच पर व्यापक प्रभाव छोड़ा। इसके अलावा 'भोर का तारा', 'पहला राजा' और 'शारदीया' भी उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
आकाशवाणी में जगदीशचंद्र माथुर का क्या योगदान था?
माथुर ने आकाशवाणी के महानिदेशक के रूप में हिंदी को घर-घर तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह 'दिनकर' और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे साहित्यकारों को रेडियो से जोड़ा।
जगदीशचंद्र माथुर का निधन कब हुआ?
जगदीशचंद्र माथुर का निधन 14 मई 1978 को हुआ। उनकी साहित्यिक और प्रसारण विरासत आज भी हिंदी के इतिहास में जीवंत है।
जगदीशचंद्र माथुर ने किन पदों पर कार्य किया?
उन्होंने बिहार सरकार में शिक्षा सचिव, भारत सरकार में आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव और हिंदी सलाहकार के पदों पर कार्य किया। ICS में चयन उनके प्रशासनिक जीवन की शुरुआत थी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 6 महीने पहले
  4. 8 महीने पहले
  5. 9 महीने पहले
  6. 9 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 10 महीने पहले