जीविका-दीदी की लाइब्रेरी: बिहार के 1 लाख ग्रामीण युवाओं को मिल रहा करियर का रास्ता
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के ग्रामीण इलाकों में जीविका द्वारा संचालित सामुदायिक पुस्तकालय सह करियर विकास केंद्र — 'जीविका-दीदी की लाइब्रेरी' — किशोरों और युवाओं के लिए शिक्षा व रोज़गार के नए द्वार खोल रही है। 17 सितंबर 2026 तक राज्यभर में 118 ऐसे केंद्र सक्रिय हैं, जिनसे अब तक 1 लाख से अधिक युवा जुड़ चुके हैं। यह पहल उन ग्रामीण युवाओं को लक्षित करती है जिनके पास प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए न पर्याप्त संसाधन हैं, न अनुकूल वातावरण।
मुख्य घटनाक्रम
विभाग के आँकड़ों के अनुसार, ये 118 पुस्तकालय संकुल स्तरीय संघों के माध्यम से संचालित होते हैं और सप्ताह के सातों दिन सुबह 9:30 बजे से शाम 5 बजे तक खुले रहते हैं। एक साथ 5,000 से 7,000 शिक्षार्थियों के बैठकर पढ़ने की व्यवस्था उपलब्ध है। प्रतिदिन औसतन प्रत्येक केंद्र पर 50 से 70 शिक्षार्थी पहुँचते हैं, जिनमें करीब 61 प्रतिशत लड़कियाँ हैं — यह आँकड़ा दर्शाता है कि यह योजना ग्रामीण छात्राओं के बीच विशेष रूप से प्रभावशाली रही है।
क्या-क्या सुविधाएँ मिलती हैं
इन केंद्रों में भौतिक पुस्तकों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ कंप्यूटर, टैबलेट, इंटरनेट और ऑनलाइन पठन-पाठन सामग्री के ज़रिए डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा भी उपलब्ध है। प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की तैयारी के लिए करियर काउंसिलिंग, मेंटरिंग और ऑनलाइन आवेदन सहायता भी दी जाती है। स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए NIOS, BBOSE और IGNOU जैसे संस्थानों में नामांकन में भी मदद की जाती है।
विद्या-दीदी: केंद्र की धुरी
प्रत्येक पुस्तकालय में एक प्रशिक्षित सामुदायिक पेशेवर 'विद्या-दीदी (डिजिटल एडुप्रेन्योर)' के रूप में कार्य करती हैं, जो दैनिक संचालन, समन्वय, सुरक्षा और सेवाओं की व्यवस्था संभालती हैं। यह मॉडल न केवल युवाओं को शिक्षा देता है बल्कि स्थानीय महिलाओं को रोज़गार और नेतृत्व का अवसर भी देता है — एक साथ दो सामाजिक उद्देश्यों को साधता हुआ। गौरतलब है कि इन केंद्रों का स्वामित्व और प्रबंधन भी संबंधित क्षेत्र के संकुल स्तरीय संघ के हाथों में ही है, जिससे स्थानीय जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
ज़मीन पर असर: एक परिवार की कहानी
सारण जिले के सोनपुर प्रखंड की नया गाँव पंचायत की निवासी चाँद मुनि देवी — जो जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं — के बेटे ने इसी लाइब्रेरी में पढ़ाई की और अब बिहार पुलिस में नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लाइब्रेरी खुलने के बाद उनके बेटे को पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल और ज़रूरी संसाधन मिले, जिसका नतीजा सरकारी नौकरी के रूप में सामने आया। उनके शब्दों में, यह पहल 'सैकड़ों परिवारों के सपनों को नई उड़ान दे रही है।'
क्या होगा आगे
यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण बिहार में शिक्षा की पहुँच और गुणवत्ता को लेकर चिंताएँ लगातार बनी रही हैं। आजीविका संवर्द्धन के लिए विशेषज्ञों के माध्यम से कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते रहेंगे। जीविका की यह पहल ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और बेहतर भविष्य की दिशा में प्रेरित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है — और यदि नामांकन की मौजूदा गति बनी रही, तो अगले एक-दो वर्षों में लाभार्थियों की संख्या कई गुना बढ़ सकती है।