जीविका और पीएमएफएमई योजना से ललिता देवी बनीं 'लखपति दीदी', ₹2 लाख की मदद से खड़ा किया अचार-पापड़ का कारोबार

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जीविका और पीएमएफएमई योजना से ललिता देवी बनीं 'लखपति दीदी', ₹2 लाख की मदद से खड़ा किया अचार-पापड़ का कारोबार

सारांश

दूसरों के घरों में काम करने वाली भागलपुर की ललिता देवी आज 'लखपति दीदी' हैं — जीविका समूह और पीएमएफएमई योजना से मिले ₹2 लाख ने उनके पारंपरिक हुनर को कारोबार में बदल दिया। अब वे खुद कमाती हैं, चार बेटियाँ पढ़ाती हैं और गाँव की अन्य महिलाओं को रोज़गार भी देती हैं।

मुख्य बातें

ललिता देवी , भागलपुर के विशनपुर जिच्छो गाँव की निवासी, जीविका स्वयं सहायता समूह और पीएमएफएमई योजना से जुड़कर 'लखपति दीदी' बनीं।
पीएमएफएमई योजना के तहत ₹5 लाख के ऋण आवेदन पर प्रारंभ में ₹2 लाख की वित्तीय सहायता मिली, जिससे अचार-पापड़ का कारोबार शुरू हुआ।
ललिता देवी अब स्वयं अच्छी आमदनी के साथ-साथ गाँव की अन्य महिलाओं को रोज़गार भी दे रही हैं।
उनकी चार बेटियाँ पढ़ाई के साथ-साथ कारोबार में भी सहयोग कर रही हैं।
पीएमएफएमई योजना के तहत महिलाओं को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाज़ार उपलब्धता का लाभ मिल रहा है।

बिहार के भागलपुर जिले के गोराडीह प्रखंड स्थित विशनपुर जिच्छो गांव की ललिता देवी आज 'लखपति दीदी' के नाम से जानी जाती हैं — और यह बदलाव संभव हुआ बिहार सरकार की जीविका स्वयं सहायता समूह योजना और केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) की बदौलत। 17 मई को सामने आई उनकी यह कहानी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल बन चुकी है।

संघर्ष से शुरुआत

कुछ साल पहले तक ललिता देवी दूसरों के घरों में काम करके परिवार का गुज़ारा चलाती थीं। चार बेटियों की परवरिश और घर की ज़िम्मेदारियाँ एक साथ निभाना उनके लिए बेहद कठिन था। गाँव के लोग ताने मारते थे कि इतनी गरीबी में बेटियों की पढ़ाई और शादी कैसे होगी। यह ऐसे समय की बात है जब ग्रामीण बिहार में महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर बेहद सीमित थे।

जीविका समूह से मिली नई राह

जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद ललिता देवी की ज़िंदगी में बदलाव की शुरुआत हुई। उनके पास अचार, पापड़, बड़ी और पकौड़ी बनाने का पारंपरिक हुनर पहले से था — जीविका ने इसे व्यवसाय का रूप देने का रास्ता दिखाया। इसके बाद उन्होंने पीएमएफएमई योजना के तहत ₹5 लाख के ऋण के लिए आवेदन किया, और प्रारंभिक चरण में उन्हें ₹2 लाख की वित्तीय सहायता मिली।

इसी राशि से उन्होंने छोटे पैमाने पर अचार-पापड़ का कारोबार शुरू किया। ललिता देवी ने बताया, 'पहले मुझे ₹2 लाख मिले, तो मुझे हिम्मत आई कि मैं इस पैसे से कुछ कर सकती हूँ। इस पैसे से मैंने व्यापार की शुरुआत की।'

आज की तस्वीर: खुद कमाई, दूसरों को रोज़गार

आज ललिता देवी का कारोबार लगातार विस्तार पा रहा है। वे न केवल खुद अच्छी आमदनी कर रही हैं, बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं को भी रोज़गार दे रही हैं। उनकी तीनों बेटियाँ पढ़ाई के साथ-साथ कारोबार में भी हाथ बँटा रही हैं। उन्होंने कहा, 'पहले हमें कोई नहीं जानता था, लेकिन अब भागलपुर में एक अलग पहचान बन गई है। योजना से आगे और भी पैसा लेकर मैं अपने व्यापार को बढ़ाऊँगी।'

गौरतलब है कि यह केवल एक महिला की सफलता की कहानी नहीं है — पीएमएफएमई योजना के तहत बिहार में ऐसी सैकड़ों महिलाएँ वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाज़ार उपलब्धता का लाभ उठा रही हैं।

योजना का व्यापक असर

जीविका कार्यक्रम बिहार की ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। पीएमएफएमई योजना केंद्र सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जो सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को संगठित क्षेत्र से जोड़ने और उन्हें बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बनाने पर केंद्रित है। ललिता देवी जैसी महिलाएँ अब आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ रही हैं और अपने समुदाय के लिए प्रेरणा स्रोत बन रही हैं।

आगे की राह

ललिता देवी का इरादा है कि वे पीएमएफएमई योजना के तहत और ऋण लेकर अपने कारोबार का विस्तार करें। परिवार की आर्थिक स्थिति मज़बूत होने से उनकी बेटियों का भविष्य भी उज्ज्वल हो रहा है। यह कहानी बताती है कि सही नीतिगत समर्थन मिले तो ग्रामीण महिलाएँ न केवल खुद बदलती हैं, बल्कि अपने पूरे गाँव की तस्वीर बदल देती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी सफलताएँ अपवाद हैं या नियम। पीएमएफएमई जैसी योजनाओं में ऋण स्वीकृति और वास्तविक संवितरण के बीच की खाई अक्सर ग्रामीण लाभार्थियों को हतोत्साहित करती है — ललिता देवी को ₹5 लाख के आवेदन पर पहले केवल ₹2 लाख मिले, यह उसी प्रक्रियागत जटिलता की झलक है। जीविका और पीएमएफएमई का संयोजन बिहार में महिला उद्यमिता का एक व्यावहारिक मॉडल बन सकता है, बशर्ते ऋण वितरण, बाज़ार लिंकेज और कौशल प्रशिक्षण की निरंतरता सुनिश्चित हो। एक अकेली सफलता की कहानी नीतिगत सफलता का प्रमाण नहीं होती — ज़रूरत है राज्यव्यापी डेटा की जो बताए कि कितनी 'लखपति दीदियाँ' वाकई उस दर्जे पर टिकी हैं।
RashtraPress
17 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीविका स्वयं सहायता समूह और पीएमएफएमई योजना क्या है?
जीविका बिहार सरकार का स्वयं सहायता समूह कार्यक्रम है जो ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है। पीएमएफएमई (प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना) केंद्र सरकार की योजना है जो सूक्ष्म खाद्य उद्यमों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाज़ार लिंकेज प्रदान करती है।
ललिता देवी को पीएमएफएमई योजना से कितनी सहायता मिली?
ललिता देवी ने पीएमएफएमई योजना के तहत ₹5 लाख के ऋण के लिए आवेदन किया था, जिसमें से प्रारंभिक चरण में उन्हें ₹2 लाख की वित्तीय सहायता मिली। इसी राशि से उन्होंने अचार-पापड़ का कारोबार शुरू किया।
ललिता देवी 'लखपति दीदी' कैसे बनीं?
भागलपुर के विशनपुर जिच्छो गाँव की ललिता देवी जीविका समूह से जुड़ीं और पीएमएफएमई योजना के ज़रिए ₹2 लाख की सहायता पाकर अचार, पापड़, बड़ी और पकौड़ी बनाने के अपने पारंपरिक हुनर को व्यवसाय में बदला। आज वे अच्छी कमाई कर रही हैं और गाँव की अन्य महिलाओं को भी रोज़गार दे रही हैं।
क्या पीएमएफएमई योजना का लाभ बिहार की अन्य महिलाओं को भी मिल रहा है?
हाँ, पीएमएफएमई योजना के तहत बिहार में ग्रामीण महिलाओं को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाज़ार उपलब्धता का लाभ मिल रहा है। ललिता देवी जैसी कई महिलाएँ आत्मनिर्भर बनकर दूसरों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन रही हैं।
ललिता देवी आगे अपने कारोबार को कैसे बढ़ाने की योजना बना रही हैं?
ललिता देवी ने बताया कि वे पीएमएफएमई योजना के तहत और ऋण लेकर अपने अचार-पापड़ के कारोबार का विस्तार करना चाहती हैं। उनकी तीनों बेटियाँ पहले से ही पढ़ाई के साथ कारोबार में सहयोग कर रही हैं।
राष्ट्र प्रेस
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