15 अक्टूबर 2026
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जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: अभाविप का आरोप — कांग्रेस-लेफ्ट आरोपी प्रोफेसर को बचाने में जुटे

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जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: अभाविप का आरोप — कांग्रेस-लेफ्ट आरोपी प्रोफेसर को बचाने में जुटे

सारांश

जेएनयू में छात्राओं द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप और जाँच में चार महीने की देरी — अब अभाविप ने सीधे कांग्रेस-लेफ्ट पर निशाना साधा है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक संबंध संस्थागत न्याय-प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं।

मुख्य बातें

जेएनयू में कांग्रेस सांसद प्रोफेसर के विरुद्ध छात्राओं ने यौन उत्पीड़न की गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं।
शिकायत सामने आने के बाद लगभग चार महीने तक जाँच की प्रगति पर सवाल बने रहे; POSH अधिनियम 2013 के तहत 90 दिनों में जाँच अनिवार्य है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-लेफ्ट से जुड़े तत्व आरोपी को बचाने और भ्रामक सूचनाएँ फैलाने में लगे हैं।
अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ.
वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने निष्पक्ष जाँच, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा और दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई की माँग की।
अभाविप का कहना है कि उसके विरोध प्रदर्शन के बाद ही मामले में कार्रवाई की गति बढ़ी।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने 15 अक्टूबर 2026 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कथित यौन उत्पीड़न के आरोपी कांग्रेस सांसद प्रोफेसर के मामले में कांग्रेस-लेफ्ट से जुड़े कुछ तत्वों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अभाविप के अनुसार, ये लोग आरोपी को बचाने, भ्रामक सूचनाएँ फैलाने और मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रहे हैं — जो कि निंदनीय है।

मामले की पृष्ठभूमि

जेएनयू की कई छात्राओं ने कांग्रेस सांसद प्रोफेसर के विरुद्ध यौन उत्पीड़न की गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं। विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को इन शिकायतों की जाँच सौंपी गई, लेकिन अभाविप के अनुसार जाँच प्रक्रिया में हुई देरी गंभीर सवाल खड़े करती है।

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 की धारा 11(4) के अनुसार जाँच 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए, और धारा 13(4) के अनुसार जाँच पूरी होने के 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए। इसके बावजूद, शिकायतें सामने आने के बाद लगभग चार महीने तक जाँच की प्रगति को लेकर अनिश्चितता बनी रही।

अभाविप की भूमिका और माँगें

अभाविप का दावा है कि उसके द्वारा विरोध प्रदर्शन और आवाज़ उठाए जाने के बाद ही मामले में कार्रवाई की दिशा में तेज़ी आई। संगठन ने जाँच में तेज़ी लाने, शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने और आरोपी को जाँच प्रभावित करने से रोकने की माँग की थी।

अभाविप ने स्पष्ट किया है कि वह तीन माँगें रखती है: पहली — शिकायतों की पूर्णतः निष्पक्ष जाँच; दूसरी — जाँच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप न हो; तीसरी — जो भी दोषी पाया जाए, उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित हो।

कांग्रेस-लेफ्ट पर आरोप

अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा, 'कांग्रेस-लेफ्ट से जुड़े कुछ लोगों द्वारा इस गंभीर मामले में भ्रामक सूचनाएँ फैलाकर अभाविप को बदनाम करने और मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास किया जा रहा है। जब अभाविप ने जाँच में देरी पर सवाल उठाए और छात्राओं को न्याय दिलाने की माँग की, तब इस विषय पर जवाबदेही तय करने की जगह भ्रम फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण है। छात्राओं की सुरक्षा और न्याय से बढ़कर कोई राजनीतिक हित नहीं हो सकता।'

सोलंकी ने आगे कहा, 'आरोपी को बचाने और न्याय के मूल प्रश्न से ध्यान भटकाने के किसी भी प्रयास का अभाविप पुरज़ोर विरोध करेगी।' उन्होंने यह भी माँग की कि कथित पत्रों और दावों के माध्यम से भ्रामक सूचनाएँ फैलाकर न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने के मामलों की भी नियमानुसार जाँच हो।

ICC की जवाबदेही पर सवाल

गौरतलब है कि आईसीसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अभाविप का तर्क है कि कानूनी समय-सीमा के बावजूद जाँच में हुई देरी स्वीकार्य नहीं है। आलोचकों का कहना है कि जब आरोपी किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो, तो संस्थागत तंत्र की स्वायत्तता और निष्पक्षता और अधिक परखी जाती है।

यह ऐसे समय में आया है जब देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों में यौन उत्पीड़न-रोधी तंत्र की प्रभावशीलता को लेकर व्यापक बहस चल रही है। अभाविप की यह माँग है कि शिकायतकर्ताओं पर किसी भी प्रकार का दबाव न डाला जाए और उनकी आवाज़ को कमज़ोर करने के किसी भी प्रयास को रोका जाए।

आगे क्या होगा

अभाविप ने संकेत दिया है कि यदि जाँच में और देरी हुई या शिकायतकर्ताओं को दबाया गया, तो संगठन और तीव्र आंदोलन करेगा। मामले की सुनवाई और आईसीसी की अंतिम रिपोर्ट का सभी पक्षों को इंतज़ार है। इस प्रकरण का नतीजा न केवल जेएनयू, बल्कि देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यौन उत्पीड़न-रोधी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता के लिए भी मिसाल बनेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो संस्थागत शिकायत-तंत्र कितना स्वतंत्र रह पाता है। आईसीसी की कानूनी समय-सीमा का उल्लंघन और जाँच में चार महीने की देरी अपने आप में गंभीर प्रशासनिक विफलता है, जिस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की आड़ में ध्यान नहीं जाना चाहिए। अभाविप की माँगें तथ्यात्मक हैं, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि जाँच-प्रक्रिया किसी भी राजनीतिक दल — सत्तापक्ष या विपक्ष — के दबाव से मुक्त हो। असली कसौटी यह होगी कि ICC अपनी अंतिम रिपोर्ट में पारदर्शिता बरतती है या नहीं।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला क्या है?
जेएनयू में कांग्रेस सांसद प्रोफेसर के विरुद्ध कई छात्राओं ने यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज कराई हैं। मामला विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के पास जाँच के लिए है, लेकिन जाँच में हुई देरी को लेकर अभाविप समेत कई पक्षों ने सवाल उठाए हैं।
अभाविप ने कांग्रेस-लेफ्ट पर क्या आरोप लगाए हैं?
अभाविप का आरोप है कि कांग्रेस-लेफ्ट से जुड़े कुछ लोग आरोपी प्रोफेसर को बचाने, भ्रामक सूचनाएँ फैलाने और कथित पत्रों के ज़रिए मामले को दूसरी दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। संगठन ने इसे छात्राओं के न्याय के अधिकार के साथ खिलवाड़ बताया है।
POSH अधिनियम के तहत जाँच की समय-सीमा क्या है?
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 की धारा 11(4) के अनुसार ICC को जाँच 90 दिनों के भीतर पूरी करनी होती है। धारा 13(4) के तहत जाँच पूरी होने के 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
अभाविप ने इस मामले में क्या माँगें रखी हैं?
अभाविप की तीन प्रमुख माँगें हैं: मामले की पूर्णतः निष्पक्ष जाँच, जाँच प्रक्रिया में किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक, और दोषी पाए जाने पर कठोरतम कार्रवाई। इसके साथ ही संगठन ने भ्रामक सूचनाएँ फैलाने वालों के विरुद्ध भी नियमानुसार जाँच की माँग की है।
इस मामले में आगे क्या होने की संभावना है?
ICC की अंतिम रिपोर्ट का इंतज़ार सभी पक्षों को है। अभाविप ने चेताया है कि यदि जाँच में और देरी हुई या शिकायतकर्ताओं पर दबाव डाला गया, तो वह और तीव्र आंदोलन करेगी। इस मामले का नतीजा देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ICC की विश्वसनीयता के लिए भी मिसाल बनेगा।
राष्ट्र प्रेस
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