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नोबेल विजेता जोआचिम फ्रैंक: भारत में क्रायो-EM उपकरण 6 से बढ़ाकर 20+ करने होंगे, AI केवल सहायक है

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नोबेल विजेता जोआचिम फ्रैंक: भारत में क्रायो-EM उपकरण 6 से बढ़ाकर 20+ करने होंगे, AI केवल सहायक है

सारांश

नोबेल विजेता प्रो. जोआचिम फ्रैंक की चेतावनी सीधी है — भारत के पास प्रतिभा है, पर उपकरण नहीं। क्रायो-EM के मात्र 6 उपकरणों के साथ वैश्विक बराबरी असंभव है। उन्होंने AI को 'सहायक' करार देते हुए कहा कि डेटा-रहित क्षेत्रों में AI 'पूरी तरह अंधा' है।

मुख्य बातें

जोआचिम फ्रैंक (कोलंबिया विश्वविद्यालय) ने 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में भारत के वैज्ञानिक बुनियादी ढाँचे पर बड़ी टिप्पणी की।
भारत में क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के अभी केवल 6 उपकरण हैं; प्रतिस्पर्धी बनने के लिए इन्हें 20 या अधिक करना होगा।
AI को उन्होंने 'सहायक' बताया, 'प्रेरक शक्ति' नहीं — डेटा-रहित क्षेत्रों में AI कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकता ।
युवा वैज्ञानिकों को ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी।
भारत में राष्ट्रीय संसाधन केंद्र स्थापित करने की वकालत की ताकि शोधकर्ता नमूने भेज सकें।
चिकित्सा के भविष्य को व्यक्ति-केंद्रित उपचार की दिशा में आगे बढ़ाने की जरूरत बताई।

कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. जोआचिम फ्रैंक ने 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत को विश्वस्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रतिस्पर्धी बनने के लिए अपने वैज्ञानिक बुनियादी ढाँचे में — विशेषकर क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (क्रायो-EM) तकनीक में — तत्काल और ठोस निवेश बढ़ाना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) वैज्ञानिक अनुसंधान की प्रेरक शक्ति नहीं, बल्कि केवल सहायक भूमिका में है।

बुनियादी ढाँचे की गंभीर कमी

प्रो. फ्रैंक ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता की सराहना करते हुए कहा, 'भारत स्पष्ट रूप से एक उपमहाद्वीप है, जहाँ अवसर और क्षमता बहुत अधिक हैं, खासकर मानव क्षमता। वास्तव में जिस चीज की जरूरत है, वह है हार्डवेयर तकनीक।' उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र — संरचनात्मक जीवविज्ञान — में भारत में क्रायो-EM के केवल छह उपकरण उपलब्ध हैं, जो इस तकनीक में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं की संख्या के मुकाबले बेहद कम हैं।

उनके अनुसार, 'भारत को प्रतिस्पर्धी बनने के लिए इनकी संख्या बढ़ाकर कम से कम 20 या उससे अधिक करनी होगी।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी में निवेश तो हुआ है, लेकिन दवा विकास जैसे क्षेत्रों में क्रायो-EM ही उभरती हुई और अधिक प्रासंगिक तकनीक है। 'इस बेहद सीमित निवेश के साथ भारत को बराबरी पर आने में अभी लंबा समय लगेगा' — यह उनका स्पष्ट मत था।

AI की भूमिका और सीमाएँ

वैज्ञानिक अनुसंधान में AI की बढ़ती चर्चा पर प्रो. फ्रैंक ने सतर्क रुख अपनाया। उन्होंने कहा, 'मैं AI को सहायक मानता हूँ, न कि प्रेरक शक्ति। AI की क्षमताओं को लेकर बहुत बड़ी गलतफहमी है।' उनके अनुसार विज्ञान अनुभव-आधारित है और AI केवल उन्हीं क्षेत्रों में काम कर सकता है जहाँ डेटा पहले से उपलब्ध हो।

उन्होंने संरचनात्मक जीवविज्ञान का उदाहरण दिया — AI ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी और क्रायो-EM से दशकों में जुटाए गए विशाल डेटा से सीखा है। लेकिन अनुसंधान के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहाँ कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं है। 'इन क्षेत्रों में AI पूरी तरह अंधा है — यह कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकता,' उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि AI स्वायत्त नहीं हो सकता और इसे स्वायत्त नहीं होना चाहिए।

युवा वैज्ञानिकों के लिए संदेश

जानकारी के अतिभार के इस दौर में युवा वैज्ञानिकों की दिशाहीनता पर प्रो. फ्रैंक ने सहानुभूति जताई। उन्होंने स्वीकार किया कि जब उन्होंने स्वयं वैज्ञानिक जीवन शुरू किया था, तब भी ऐसी ही उलझन थी — लेकिन उस समय इंटरनेट नहीं था और जानकारी सीमित थी। 'आज स्थिति बिल्कुल उलट है। जानकारी की बाढ़ है, इसलिए अपना रास्ता ढूंढना बहुत मुश्किल हो सकता है,' उन्होंने कहा।

उनका सुझाव था कि युवा वैज्ञानिकों को उन वैश्विक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो समाज के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं — जैसे ग्लोबल वार्मिंग और निष्पक्ष राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौतियाँ। 'इन समस्याओं के समाधान में निवेश करना होगा और इसे इस तरह प्रस्तुत करना होगा कि युवा वैज्ञानिकों को स्पष्ट रास्ते दिखाई दें,' उन्होंने कहा।

राष्ट्रीय संसाधन केंद्र और व्यक्तिगत चिकित्सा का भविष्य

भारत में विश्वस्तरीय खोजों को बढ़ावा देने के लिए प्रो. फ्रैंक ने राष्ट्रीय संसाधन केंद्र स्थापित करने की वकालत की, जहाँ देशभर के शोधकर्ता अपने नमूने भेज सकें। उन्होंने कहा कि निवेश वहाँ किया जाना चाहिए जहाँ उसका सर्वाधिक महत्व हो।

चिकित्सा विज्ञान के भविष्य पर उनका दृष्टिकोण था कि आज दवाएं एक काल्पनिक 'औसत व्यक्ति' को ध्यान में रखकर विकसित की जाती हैं। उनके अनुसार, 'चिकित्सा को वास्तव में व्यक्तिगत, पूरी तरह व्यक्ति-केंद्रित उपचार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।' संरचनात्मक जीवविज्ञान और क्रायो-EM इसी लक्ष्य को साकार करने में सहायक हैं। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत अपनी स्वास्थ्य सेवा और फार्मा क्षेत्र को वैश्विक मानकों पर लाने की कोशिश कर रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर विश्वस्तरीय उपकरण और राष्ट्रीय संसाधन केंद्रों की कमी इस मानव पूंजी को बर्बाद होने देती है। AI को 'सहायक' बताने का उनका तर्क उस व्यापक भ्रम को भी तोड़ता है जिसमें नीति-निर्माता AI को बुनियादी अनुसंधान का विकल्प मान बैठते हैं — जबकि बिना डेटा के AI कुछ नहीं कर सकता, और डेटा बनाने के लिए उपकरण चाहिए। निवेश की यह कड़ी टूटी हुई है।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नोबेल विजेता प्रो. जोआचिम फ्रैंक ने भारत के बारे में क्या कहा?
प्रो. फ्रैंक ने कहा कि भारत में मानव क्षमता और अवसर बहुत अधिक हैं, लेकिन हार्डवेयर तकनीक — खासकर क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी उपकरणों — की गंभीर कमी है। उन्होंने इसे भारत की वैश्विक वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा में सबसे बड़ी बाधा बताया।
क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (क्रायो-EM) क्या है और भारत में इसकी क्या स्थिति है?
क्रायो-EM एक अत्याधुनिक तकनीक है जो जैविक अणुओं की संरचना का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करती है और दवा विकास में अहम भूमिका निभाती है। प्रो. फ्रैंक के अनुसार भारत में अभी केवल 6 ऐसे उपकरण हैं, जबकि प्रतिस्पर्धी बनने के लिए कम से कम 20 या उससे अधिक की जरूरत है।
प्रो. फ्रैंक के अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधान में AI की क्या भूमिका है?
प्रो. फ्रैंक के अनुसार AI केवल एक सहायक उपकरण है, न कि प्रेरक शक्ति। उन्होंने कहा कि AI केवल उन्हीं क्षेत्रों में काम कर सकता है जहाँ पर्याप्त डेटा उपलब्ध हो, और जहाँ डेटा नहीं है वहाँ AI 'पूरी तरह अंधा' है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि AI को स्वायत्त नहीं होना चाहिए।
भारत में विश्वस्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान बढ़ाने के लिए प्रो. फ्रैंक का क्या सुझाव है?
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत में राष्ट्रीय संसाधन केंद्र स्थापित होने चाहिए जहाँ शोधकर्ता अपने नमूने भेज सकें, और निवेश उन क्षेत्रों में हो जहाँ उसका सर्वाधिक प्रभाव हो। उन्होंने संरचनात्मक जीवविज्ञान और क्रायो-EM को आणविक चिकित्सा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
प्रो. फ्रैंक ने युवा वैज्ञानिकों को क्या सलाह दी?
उन्होंने युवा वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे जानकारी की बाढ़ में दिशाहीन होने की बजाय ग्लोबल वार्मिंग और निष्पक्ष राजनीतिक परिस्थितियों जैसी वैश्विक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि युवाओं को स्पष्ट दिशा मिले।
राष्ट्र प्रेस
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