कैंचीधाम में गौरैया लगभग गायब, ध्वनि प्रदूषण से पक्षी विविधता पर संकट
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कैंचीधाम और आसपास की पहाड़ियों में गौरैया समेत कई पक्षी प्रजातियाँ तेज़ी से कम हो रही हैं। 10 अक्टूबर 2026 को सामने आई इस चिंताजनक स्थिति में बर्ड वाचर और वन विभाग के अधिकारियों ने बढ़ते ध्वनि प्रदूषण, वाहनों की अत्यधिक आवाजाही और पर्यटन के बढ़ते दबाव को प्रमुख कारण बताया है। कभी पक्षियों के कलरव से गूंजने वाली कैंचीधाम से पांगरा तक की पहाड़ियाँ अब सूनी होती जा रही हैं।
क्या है स्थिति
बर्ड वाचर जगजीवन सिंह धामी के अनुसार, घरों के आसपास आसानी से दिखने वाली गौरैया अब कैंचीधाम क्षेत्र में लगभग गायब हो चुकी है। उनका कहना है कि जब किसी भी जगह पर पर्यटन बढ़ता है तो स्थानीय लोगों के अलावा वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं। लाफिंग थ्रश समेत कई पक्षी प्रजातियाँ और जलस्रोतों के पास बड़ी संख्या में पाए जाने वाले पक्षी अब इस क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं।
धामी ने बताया कि करीब तीन वर्ष पहले तक लोग बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन के साथ-साथ यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और पक्षी जीवन का भी आनंद लेने आते थे। लेकिन बढ़ते पर्यटन के साथ वाहनों की आवाजाही और मानवीय गतिविधियों में वृद्धि ने पक्षियों के प्राकृतिक आवास को गहरी चोट पहुँचाई है।
नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व और जैव विविधता
नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व वर्ष 2016 में अस्तित्व में आया था। यह रिजर्व करीब 114 वर्ग किलोमीटर में फैला है और 1,000 से 2,611 मीटर की ऊँचाई वाले भूभाग को समेटे हुए है। कैंचीधाम का इलाका इसी रिजर्व से सटा हुआ है।
गौरतलब है कि कैंचीधाम से पांगरा तक का क्षेत्र ब्रिटिश काल से ही बर्ड वाचिंग के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। नैनीताल वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल के अनुसार, इस क्षेत्र में कभी पक्षियों की लगभग 3,000 प्रजातियाँ पाई जाती थीं, लेकिन अब उनकी मौजूदगी में ध्यान देने योग्य कमी महसूस की जा रही है।
ध्वनि प्रदूषण और वाहनों का दबाव
वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल ने ध्वनि प्रदूषण को एक गंभीर चुनौती बताया। उनके मुताबिक, वाहनों के लगातार शोर से पक्षियों के प्रजनन और घोंसले बनाने के अनुकूल वातावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि हाईवे के आसपास कुछ पेड़ों की पत्तियों के रंग में बदलाव दिखाई दे रहा है, जो बढ़ते प्रदूषण का संकेत है।
आनंद लाल ने बताया कि कैंचीधाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और पहाड़ के अन्य क्षेत्रों को जोड़ने वाला हाईवे भी इसी मार्ग से गुजरता है, जिससे सड़क पर वाहनों का दबाव काफी अधिक रहता है। यह ऐसे समय में चिंताजनक है जब पूरे उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन तेज़ रफ्तार से बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के सुझाव और आगे की राह
बर्ड वाचर जगजीवन सिंह धामी ने सुझाव दिया कि क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाए, जिसमें यह दर्ज किया जाए कि पहले कौन-कौन सी पक्षी प्रजातियाँ और पेड़-पौधे मौजूद थे और वर्तमान में उनकी स्थिति क्या है। इस अध्ययन के आधार पर घटती प्रजातियों की पहचान कर उनके संरक्षण की प्रभावी योजना बनाई जा सकती है।
वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल ने सुझाव दिया कि कैंचीधाम में इलेक्ट्रिक और प्रदूषण-रहित वाहनों के संचालन को बढ़ावा दिया जाए, ताकि वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी लाई जा सके। यह कदम न केवल पक्षी जीवन बल्कि समग्र पारिस्थितिकी तंत्र के लिए लाभकारी होगा। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इस क्षेत्र की अनूठी जैव विविधता हमेशा के लिए खो सकती है।