19 सितंबर 2026
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गयाजी में पितृपक्ष मेला-2026 से पहले 'हमर मगध' सेमिनार, मगही भाषा और मगध की विरासत पर विद्वानों का मंथन

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गयाजी में पितृपक्ष मेला-2026 से पहले 'हमर मगध' सेमिनार, मगही भाषा और मगध की विरासत पर विद्वानों का मंथन

सारांश

पितृपक्ष मेला-2026 के ठीक पहले गयाजी में 'हमर मगध' सेमिनार ने एक ज़रूरी सवाल उठाया — क्या मगही भाषा और मगध की हज़ारों साल पुरानी विरासत नई पीढ़ी तक पहुँच पा रही है? विद्वानों, युवाओं और जिला प्रशासन ने मिलकर इस चुनौती को संबोधित करने की कोशिश की।

मुख्य बातें

19 सितंबर 2026 को गयाजी में जिला प्रशासन द्वारा 'हमर मगध' सेमिनार आयोजित किया गया।
सेमिनार में मगध का इतिहास, मगही भाषा, आध्यात्मिक परंपरा, कला, साहित्य और संगीत — कुल पाँच विषयों पर सत्र हुए।
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने मगही भाषा में संबोधन देते हुए भाषा संरक्षण और युवाओं को अवसर देने का आह्वान किया।
पाँच चयनित छात्र-छात्राओं ने मगध की संस्कृति और ज्ञान परंपरा पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
सेमिनार के बाद जी.डी.
गोयनका स्कूल और गुरुकुल संगीत विद्यालय के कलाकारों सहित अनेक कलाकारों ने बिहार की लोक विरासत पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं।
कार्यक्रम का उद्देश्य पितृपक्ष मेला-2026 से पहले श्रद्धालुओं और स्थानीय युवाओं में मगध की विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।

बिहार के गयाजी में पितृपक्ष मेला-2026 के शुभारंभ से ठीक पहले 19 सितंबर 2026 को जिला प्रशासन ने 'हमर मगध' सेमिनार का आयोजन किया, जिसमें मगध के इतिहास, मगही भाषा, आध्यात्मिक परंपरा, कला, साहित्य और संगीत पर विद्वानों एवं विशेषज्ञों ने गहन विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य गया और मगध की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी से जोड़ना था।

सेमिनार का स्वरूप और विषय-क्रम

सेमिनार में विषय प्रवेश के बाद अनेक सत्रों में वक्ताओं ने मगध की विरासत और वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। 'मगध का इतिहास एवं विरासत' विषय पर डॉ. मनीष सिन्हा और प्रो. सुधांशु झा ने मगध की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विस्तार से प्रस्तुत किया। 'मगध का शिक्षा, संस्कार एवं संस्कृति' विषय पर डॉ. राम कृष्ण मिश्र ने मगध की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।

'मगध की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि' विषय पर स्वामी वेंकटेश्वरानाचार्य जी महाराज ने मगध की आध्यात्मिक विरासत और उसकी विशिष्ट पहचान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बुद्ध और महावीर के शांति व अहिंसा के संदेश आज भी इस धरती पर गूंजते हैं।

कला, साहित्य, संगीत और मगही भाषा पर विशेष सत्र

'मगध की कला, साहित्य एवं संगीत' विषय पर पं. राजेन्द्र सिजुआर, प्रो. (डॉ.) के. के. नारायण एवं डॉ. राकेश कुमार सिन्हा (रवि) ने क्षेत्र की कलात्मक और सांगीतिक परंपराओं के विभिन्न आयामों को उजागर किया। 'मगध की भाषा एवं इसका स्वाद' विषय पर डॉ. सच्चिदानंद प्रेमी ने मगही भाषा की विशेषताओं, उसकी मिठास और लोकजीवन से उसके गहरे संबंध को रेखांकित किया।

यह ऐसे समय में आया है जब मगही सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण को लेकर देशभर में चिंता बढ़ रही है। गौरतलब है कि मगही भाषा को अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला है, जो इसके पैरोकारों के लिए एक लंबे समय से चला आ रहा मुद्दा है।

युवाओं की सहभागिता और जिलाधिकारी का संबोधन

सेमिनार में पाँच चयनित छात्र-छात्राओं ने मगध के इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा पर अपने दृष्टिकोण साझा किए, जो कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने मगही भाषा में संबोधन देते हुए कहा कि मगध की धरती पर उसके संस्कार, संस्कृति और मगही भाषा के विकास पर चर्चा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है।

उन्होंने कहा कि पाटलिपुत्र के वैभव और नालंदा की ज्ञान परंपरा ने विश्व को प्रभावित किया है। उन्होंने आगे कहा कि मगही भाषा मगध के लोगों की पहचान से जुड़ी है और इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए शिक्षा पर ज़ोर देने तथा युवाओं को नए अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा के समृद्ध होने से समाज और राष्ट्र भी समृद्ध होता है।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और समापन

सेमिनार के बाद आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में संगीत शिक्षक आशुतोष, गया के कलाकार जगजीत रौशन, जी.डी. गोयनका स्कूल और गुरुकुल संगीत विद्यालय के कलाकारों ने गायन, बिहार लोक नृत्य और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। इन प्रस्तुतियों के ज़रिए मगध और बिहार की लोक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। समापन अवसर पर प्रतिभागियों और कलाकारों को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया और बिहार गीत की प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ।

जिला प्रशासन के अनुसार, इस सेमिनार के माध्यम से पितृपक्ष मेला-2026 से पहले गया आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय युवाओं में मगध की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया। आने वाले पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के आगमन की उम्मीद है, जिससे यह आयोजन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा एक दिवसीय सेमिनार से आगे जाने की है। मगही भाषा दशकों से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की प्रतीक्षा में है — एक सेमिनार में उत्साहजनक भाषण इस संरचनात्मक कमी को नहीं भर सकता। जिला प्रशासन की पहल तब सार्थक होगी जब यह वार्षिक अनुष्ठान बनने की बजाय मगही को स्कूली पाठ्यक्रम और सरकारी मान्यता तक ले जाने के ठोस प्रयासों में तब्दील हो। नालंदा और पाटलिपुत्र का गौरव बार-बार याद दिलाना ज़रूरी है, पर उससे भी ज़रूरी है कि मगध की ज़िंदा भाषा और संस्कृति को नीतिगत समर्थन मिले।
RashtraPress
19 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'हमर मगध' सेमिनार क्या था और इसका उद्देश्य क्या रहा?
'हमर मगध' सेमिनार गयाजी के जिला प्रशासन द्वारा 19 सितंबर 2026 को पितृपक्ष मेला-2026 से पहले आयोजित एक सांस्कृतिक-शैक्षणिक कार्यक्रम था। इसका उद्देश्य मगध के इतिहास, मगही भाषा, आध्यात्मिक परंपरा, कला और साहित्य को नई पीढ़ी से जोड़ना था।
सेमिनार में किन विषयों पर चर्चा हुई?
सेमिनार में मगध का इतिहास एवं विरासत, शिक्षा-संस्कार-संस्कृति, आध्यात्मिक पृष्ठभूमि, कला-साहित्य-संगीत और मगही भाषा — कुल पाँच प्रमुख विषयों पर अलग-अलग सत्र हुए। प्रत्येक सत्र में क्षेत्र के विशेषज्ञों और विद्वानों ने अपने विचार रखे।
मगही भाषा को लेकर सेमिनार में क्या कहा गया?
डॉ. सच्चिदानंद प्रेमी ने मगही भाषा की विशेषताओं, उसकी मिठास और लोकजीवन से उसके गहरे संबंध को रेखांकित किया। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने मगही में ही संबोधन देते हुए कहा कि भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए शिक्षा पर ज़ोर देना और युवाओं को नए अवसर देना ज़रूरी है।
पितृपक्ष मेला-2026 से पहले यह सेमिनार क्यों आयोजित किया गया?
जिला प्रशासन के अनुसार, पितृपक्ष मेले के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु गया आते हैं। इस अवसर का उपयोग कर मगध की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को लेकर आगंतुकों और स्थानीय युवाओं में जागरूकता बढ़ाना इस आयोजन का मकसद था।
सेमिनार में युवाओं की क्या भूमिका रही?
सेमिनार में पाँच चयनित छात्र-छात्राओं ने मगध के इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा पर अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। यह युवा सहभागिता कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही और इसने आयोजन को पीढ़ियों के बीच सेतु बनाने के उद्देश्य को मूर्त रूप दिया।
राष्ट्र प्रेस
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