पुलक सागर जी महाराज बोले: अच्छाई के वेश में आई बुराई से लड़ना सबसे कठिन
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय संत एवं 'भारत गौरव' उपाधि से सम्मानित आचार्य 108 श्री पुलक सागर जी महाराज ने 9 जुलाई को चित्तौड़गढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि जब तक भारत ऋषियों और संतों की शिक्षाओं का अनुसरण करता रहेगा, देश का भविष्य सुरक्षित रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि देश में बन रहा मौजूदा माहौल आने वाली पीढ़ियों को धर्म और नैतिकता से दूर कर सकता है।
युवाओं को दिशाहीनता की चेतावनी
महाराज जी ने कहा कि आज के युवाओं के पास ऊर्जा और गति तो है, किंतु सही दिशा का अभाव है। उन्होंने कहा, 'जल्दी और ज़्यादा पाने की होड़ में युवा दिशाहीन हो जाता है।' उनके अनुसार, चित्तौड़गढ़ का किला उन लोगों की याद दिलाता है जिन्होंने इसे बनाने में अपना सर्वस्व न्योछावर किया — वे चले गए, लेकिन किला आज भी अडिग खड़ा है। उन्होंने राम और कृष्ण का उदाहरण देते हुए कहा कि न राम अयोध्या को साथ ले गए, न कृष्ण मथुरा को — यह धरा पर सब धरा रह जाता है।
ईमानदारी और शांति का संदेश
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि बेईमानी की राह पर सफलता तो मिल सकती है, किंतु मन की शांति नहीं। उन्होंने कहा, 'बेईमानी से भोजन मिल सकता है, पर भूख नहीं; पानी मिल सकता है, पर प्यास नहीं।' उन्होंने सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भर युवाओं को सचेत किया कि वे हज़ारों अनजान लोगों से तो जुड़े हैं, लेकिन अपने माता-पिता और परिजनों से संवाद टूट गया है।
धर्म नहीं, इंसानियत की ज़रूरत
उन्होंने कहा कि आज समाज को धर्म की बड़ी-बड़ी बातों से अधिक इंसानियत के पाठ की आवश्यकता है। उनके शब्दों में, 'हम अंतरिक्ष में उड़ना सीख गए, समुद्र में तैरना सीख गए, लेकिन धरती पर इंसान की तरह चलना नहीं सीख पाए।' उन्होंने कहा कि मंदिर-मस्जिद बनाने से बड़ा काम एक-दूसरे से मानवीय रूप से जुड़ना है।
आस्था के नाम पर दिखावे पर सवाल
महाराज जी ने धार्मिक आस्था के बढ़ते प्रदर्शन पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्राएँ और मंदिरों में बढ़ती भीड़ वास्तविक भक्ति का प्रमाण नहीं है — यह माहौल बनाने की कोशिश भर है। उन्होंने एक तीखी बात कही: 'बुराई जब बुराई के रूप में सामने आती है, तो उससे लड़ना सरल होता है; लेकिन जब वह अच्छाई का मुखौटा पहनकर आती है, तो पहचानना और लड़ना दोनों कठिन हो जाते हैं।' उन्होंने रावण के साधु वेश का उदाहरण देते हुए कहा कि सीता भी उस छल का शिकार हुई थीं — और आज की जनता उसी स्थिति में है।
३२ वर्षों की साधना और संकल्प
महाराज जी ने बताया कि वे पिछले 32 वर्षों से निरंतर समाज-जागरण का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैं यह दावा नहीं करता कि पूरी दुनिया बदल दूँगा — मेरा काम सिर्फ आवाज़ लगाना है, कोई सुने या न सुने। मेरा कर्तव्य जागृत करना है।' उनका स्वप्न है कि पूरे हिंदुस्तान में इंसानियत की स्थापना हो और एक मज़बूत, नैतिक समाज का निर्माण हो।