कलबुर्गी तुअर दाल (GI टैग #353) को 'मन की बात' में PM मोदी का उल्लेख, मालदीव निर्यात से कारोबारियों में नई उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
कलबुर्गी (कर्नाटक) की जीआई टैग प्राप्त तुअर दाल — जिसे स्थानीय भाषा में 'तोगरी खानाजा' यानी 'तुअर का खजाना' कहा जाता है — अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दस्तक दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में इस दाल का ज़िक्र करते हुए इसे स्थानीय उत्पादों के वैश्विक मंच तक पहुँचने का जीवंत उदाहरण बताया। यह दाल अब मालदीव को निर्यात हो रही है, जिससे कल्याण कर्नाटक क्षेत्र के दाल मिल कारोबारियों और किसानों में भविष्य को लेकर उत्साह की लहर है।
कलबुर्गी तुअर दाल की खासियत
कर्नाटक के कलबुर्गी जिले की तुअर दाल को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग संख्या 353 प्राप्त है, जो इसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को आधिकारिक मान्यता देता है। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र की मिट्टी में चूना पत्थर की उपस्थिति दाल के पोषण गुणों को विशेष बनाती है। इसीलिए यहाँ उगाई जाने वाली तुअर दाल साधारण किस्मों से अलग मानी जाती है।
पोषण संबंधी आँकड़ों के अनुसार, प्रति 100 ग्राम कलबुर्गी तुअर दाल में 22.30 ग्राम प्रोटीन, 1.70 ग्राम वसा, 3.50 ग्राम खनिज, 57.60 ग्राम कार्बोहाइड्रेट और 335 किलो कैलोरी ऊर्जा पाई जाती है। इसमें कैल्शियम की मात्रा 73 मिलीग्राम बताई गई है। कुल प्रोटीन सामग्री 18 से 23 प्रतिशत तक होती है, जो इसे पोषण के लिहाज़ से समृद्ध बनाती है।
मन की बात और निर्यात का नया अध्याय
प्रधानमंत्री मोदी ने 'मन की बात' में बताया कि गुलबर्गा (कलबुर्गी का पुराना नाम) की तुअर दाल अब मालदीव में भी पहुँच रही है। यह उल्लेख महज एक रेडियो कार्यक्रम की बात नहीं है — इसने एक स्थानीय उत्पाद को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। गौरतलब है कि इस व्यवसाय में अब कई परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ी भी सक्रिय रूप से जुड़ चुकी है, जो इस उद्योग की पारंपरिक गहराई को दर्शाता है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार 'एक जिला, एक उत्पाद' जैसी पहलों के ज़रिये स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाज़ार से जोड़ने की कोशिश कर रही है। कलबुर्गी तुअर दाल उस नीति का एक व्यावहारिक उदाहरण बन रही है।
कारोबारियों की माँग और उद्योग की चुनौतियाँ
दाल मिल एसोसिएशन के संचालक प्रतीश तापड़िया ने बताया कि कलबुर्गी की तुअर दाल में पोटेशियम और कैल्शियम की मात्रा बाज़ार में उपलब्ध सामान्य तुअर दाल की तुलना में अधिक पाई जाती है, जो प्रयोगशाला जाँच रिपोर्टों में भी सामने आई है। उन्होंने इसे स्वाद और ऊर्जा संरक्षण, दोनों दृष्टियों से विशेष गुणवत्ता का उत्पाद बताया।
तापड़िया ने केंद्र सरकार से माँग की है कि तुअर दाल उद्योग को कृषि आधारित उद्योग की श्रेणी में शामिल किया जाए। उनके अनुसार, वर्तमान में यह उद्योग इस श्रेणी में नहीं आता, जिससे किसानों और दाल मिल संचालकों को मिलने वाले नीतिगत लाभ सीमित हो जाते हैं। इस वर्गीकरण से उन्हें सरकारी योजनाओं का सीधा फ़ायदा मिल सकता है।
आम जनता और किसानों पर असर
कलबुर्गी के अलावा बीदर, यादगीर, विजयपुरा और कर्नाटक के अन्य जिलों में भी तुअर दाल की खेती होती है, जो देश की दाल संबंधी ज़रूरतों में अहम योगदान देती है। स्थानीय कारोबारियों का मानना है कि विदेशों से दाल आयात को नियंत्रित करने और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने से इस क्षेत्र के किसानों को उचित मूल्य और नए बाज़ार मिल सकते हैं।
यदि निर्यात के लिए अनुकूल नीतिगत माहौल और पर्याप्त पहचान मिले, तो कलबुर्गी से तुअर दाल का निर्यात मालदीव से आगे और देशों तक विस्तार पा सकता है। 'मन की बात' में उल्लेख के बाद इस दिशा में प्रयास और तेज़ होने की उम्मीद है।