जंतर-मंतर पर धारा 163: कपिल सिब्बल बोले — खतरा समाज को नहीं, शासन को है
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने 10 अक्टूबर को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए बीएनएसएस की धारा 163 लागू करना और प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करना लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ्तार लोगों को अज्ञात स्थानों पर ले जाकर बेरहमी से पीटा जा रहा है।
धारा 163 पर सिब्बल का कानूनी सवाल
सिब्बल ने कहा, धारा 163 या पुरानी धारा 144 तभी लगाई जाती है जब समाज में किसी हिंसक घटना की आशंका हो और सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरा हो। उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई भी नागरिक या सामाजिक समूह यह शिकायत लेकर नहीं आया कि प्रदर्शनकारियों के आने से उन्हें खतरा है, तो यह प्रतिबंध किस आधार पर लगाया गया।
सिब्बल ने अपने शब्दों में कहा कि पुलिस को जानकारी होती है कि अगर हिंसा की आशंका हो तो धारा लगाना उचित भी है — 'लगानी भी चाहिए' — लेकिन यहाँ समाज का कोई वर्ग शिकायतकर्ता नहीं था। उनके अनुसार, यह धारा समाज की नहीं बल्कि 'शासन की सुरक्षा' के लिए लगाई गई।
विमान में गिरफ्तारी का मामला
सिब्बल ने एक विशेष घटना का हवाला देते हुए कहा कि अभिजीत दिपके और आशुतोष राणा को हवाई जहाज के अंदर ही गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उड़ान के दौरान धारा 163 का कोई भौगोलिक आधार नहीं बनता। उन्होंने पूछा कि विमान में बैठे व्यक्ति से किस सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा था।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर से प्रदर्शनकारी कई दिनों पहले से 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर एकत्र होने की घोषणा कर चुके थे। सिब्बल ने कहा कि इतने व्यापक पूर्व-ऐलान के बाद भी यदि प्रशासन ने प्रतिबंध लगाया, तो यह शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार को सीधे कुचलना है।
हिरासत में मारपीट के आरोप
सिब्बल ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों को ऐसी जगहों पर ले जाया जा रहा है जो किसी को ज्ञात नहीं, और वहाँ उन्हें बेरहमी से पीटा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं — गिरफ्तारी औपचारिक होनी चाहिए और यह बताया जाना चाहिए कि व्यक्ति को कहाँ ले जाया जा रहा है।
गौरतलब है कि इस प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए कथित तौर पर 28 बटालियन, सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस की हजारों की संख्या में तैनाती की गई। सिब्बल ने इसे अनुपातहीन बल-प्रयोग बताया।
ज्ञानेश कुमार प्रसंग
सिब्बल ने यह भी कहा कि सरकार को डर था कि यदि देशभर से लोग एकत्र हो गए तो ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना पड़ सकता है और उसके बाद और भी लोगों पर दबाव आ सकता है। उनके अनुसार, यह सारी कार्रवाई किसी एक अधिकारी की नहीं बल्कि सरकार की अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए की गई।
आलोचकों का कहना है कि यदि सिब्बल के आरोप सत्यापित होते हैं, तो यह विपक्षी आवाजों को दबाने की एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हो सकता है — एक ऐसा पैटर्न जो पिछले कुछ वर्षों में अनेक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान देखा गया है। मामले की जाँच और सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने आनी बाकी है।