10 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

जंतर-मंतर पर धारा 163: कपिल सिब्बल बोले — खतरा समाज को नहीं, शासन को है

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
जंतर-मंतर पर धारा 163: कपिल सिब्बल बोले — खतरा समाज को नहीं, शासन को है

सारांश

जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन रोकने के लिए धारा 163 और हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती — कपिल सिब्बल का सवाल है कि जब समाज के किसी वर्ग ने खतरे की शिकायत नहीं की, तो यह कार्रवाई किसकी सुरक्षा के लिए थी? उनका जवाब: शासन की।

मुख्य बातें

राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने 10 अक्टूबर को केंद्र सरकार पर जंतर-मंतर प्रदर्शन रोकने के लिए बीएनएसएस धारा 163 के दुरुपयोग का आरोप लगाया।
सिब्बल के अनुसार समाज के किसी वर्ग ने खतरे की शिकायत नहीं की — प्रतिबंध 'शासन की सुरक्षा' के लिए लगाया गया।
अभिजीत दिपके और आशुतोष राणा को कथित तौर पर हवाई जहाज के अंदर ही गिरफ्तार किया गया।
सिब्बल ने आरोप लगाया कि गिरफ्तार लोगों को अज्ञात स्थानों पर ले जाकर बेरहमी से पीटा जा रहा है।
प्रदर्शन नियंत्रण के लिए कथित तौर पर 28 बटालियन , सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस की भारी तैनाती की गई।
सिब्बल ने ज्ञानेश कुमार का नाम लेते हुए कहा कि सरकार उनके इस्तीफे की माँग से बचने के लिए प्रदर्शन दबा रही है।

राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने 10 अक्टूबर को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए बीएनएसएस की धारा 163 लागू करना और प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करना लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ्तार लोगों को अज्ञात स्थानों पर ले जाकर बेरहमी से पीटा जा रहा है।

धारा 163 पर सिब्बल का कानूनी सवाल

सिब्बल ने कहा, धारा 163 या पुरानी धारा 144 तभी लगाई जाती है जब समाज में किसी हिंसक घटना की आशंका हो और सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरा हो। उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई भी नागरिक या सामाजिक समूह यह शिकायत लेकर नहीं आया कि प्रदर्शनकारियों के आने से उन्हें खतरा है, तो यह प्रतिबंध किस आधार पर लगाया गया।

सिब्बल ने अपने शब्दों में कहा कि पुलिस को जानकारी होती है कि अगर हिंसा की आशंका हो तो धारा लगाना उचित भी है — 'लगानी भी चाहिए' — लेकिन यहाँ समाज का कोई वर्ग शिकायतकर्ता नहीं था। उनके अनुसार, यह धारा समाज की नहीं बल्कि 'शासन की सुरक्षा' के लिए लगाई गई।

विमान में गिरफ्तारी का मामला

सिब्बल ने एक विशेष घटना का हवाला देते हुए कहा कि अभिजीत दिपके और आशुतोष राणा को हवाई जहाज के अंदर ही गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उड़ान के दौरान धारा 163 का कोई भौगोलिक आधार नहीं बनता। उन्होंने पूछा कि विमान में बैठे व्यक्ति से किस सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा था।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर से प्रदर्शनकारी कई दिनों पहले से 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर एकत्र होने की घोषणा कर चुके थे। सिब्बल ने कहा कि इतने व्यापक पूर्व-ऐलान के बाद भी यदि प्रशासन ने प्रतिबंध लगाया, तो यह शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार को सीधे कुचलना है।

हिरासत में मारपीट के आरोप

सिब्बल ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों को ऐसी जगहों पर ले जाया जा रहा है जो किसी को ज्ञात नहीं, और वहाँ उन्हें बेरहमी से पीटा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं — गिरफ्तारी औपचारिक होनी चाहिए और यह बताया जाना चाहिए कि व्यक्ति को कहाँ ले जाया जा रहा है।

गौरतलब है कि इस प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए कथित तौर पर 28 बटालियन, सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस की हजारों की संख्या में तैनाती की गई। सिब्बल ने इसे अनुपातहीन बल-प्रयोग बताया।

ज्ञानेश कुमार प्रसंग

सिब्बल ने यह भी कहा कि सरकार को डर था कि यदि देशभर से लोग एकत्र हो गए तो ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना पड़ सकता है और उसके बाद और भी लोगों पर दबाव आ सकता है। उनके अनुसार, यह सारी कार्रवाई किसी एक अधिकारी की नहीं बल्कि सरकार की अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए की गई।

आलोचकों का कहना है कि यदि सिब्बल के आरोप सत्यापित होते हैं, तो यह विपक्षी आवाजों को दबाने की एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हो सकता है — एक ऐसा पैटर्न जो पिछले कुछ वर्षों में अनेक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान देखा गया है। मामले की जाँच और सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने आनी बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि यह प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था के वास्तविक खतरे पर आधारित होना चाहिए, न कि राजनीतिक असुविधा पर। विमान के भीतर गिरफ्तारी और अज्ञात हिरासत स्थलों के आरोप — यदि सत्यापित हों — तो ये प्रक्रियागत कानून के गंभीर उल्लंघन हैं जिन पर न्यायिक जाँच बनती है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर राजनीतिक बयानबाजी पर केंद्रित रहती है, लेकिन असली मुद्दा यह है कि क्या कार्यपालिका शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिए आपातकालीन कानूनी शक्तियों का नियमित हथियार बना रही है। यह पैटर्न नया नहीं है, लेकिन हर बार जब यह दोहराया जाता है तो संवैधानिक जवाबदेही की माँग और तीखी हो जाती है।
RashtraPress
10 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जंतर-मंतर पर बीएनएसएस धारा 163 क्यों लगाई गई?
प्रशासन ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा 163 लागू की। हालाँकि कपिल सिब्बल का आरोप है कि समाज के किसी वर्ग ने खतरे की कोई औपचारिक शिकायत नहीं की थी, इसलिए यह प्रतिबंध कानूनी रूप से संदिग्ध है।
कपिल सिब्बल ने किन गिरफ्तारियों पर सवाल उठाए?
सिब्बल ने अभिजीत दिपके और आशुतोष राणा की हवाई जहाज के अंदर हुई गिरफ्तारी का विशेष उल्लेख किया। उनका तर्क है कि उड़ान के दौरान धारा 163 का कोई भौगोलिक आधार नहीं बनता, इसलिए यह गिरफ्तारी कानूनी रूप से अनुचित है।
हिरासत में मारपीट के आरोप क्या हैं?
कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों को अज्ञात स्थानों पर ले जाकर बेरहमी से पीटा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार गिरफ्तारी औपचारिक होनी चाहिए और हिरासत स्थल की जानकारी दी जानी चाहिए — जो कथित तौर पर नहीं हो रहा।
ज्ञानेश कुमार का इस मामले से क्या संबंध है?
सिब्बल ने कहा कि सरकार को डर था कि यदि देशभर से लोग जंतर-मंतर पर एकत्र हो गए तो ज्ञानेश कुमार पर इस्तीफे का दबाव बन सकता है। उनके अनुसार यही राजनीतिक भय इस पूरी कार्रवाई की असली वजह है।
इस प्रदर्शन को रोकने के लिए कितनी सुरक्षा तैनात की गई?
कपिल सिब्बल के अनुसार इस प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए कथित तौर पर 28 बटालियन, सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस के हजारों जवान तैनात किए गए। उन्होंने इसे एक शांतिपूर्ण विरोध के लिए अनुपातहीन बल-प्रयोग बताया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 15 मिनट पहले
  2. 6 घंटे पहले
  3. 10 घंटे पहले
  4. कल
  5. कल
  6. कल
  7. 1 सप्ताह पहले
  8. 2 महीने पहले