30 अक्टूबर 2026
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कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली परंपरा: शिखर पर जलती है अखंड मशाल, कार्तिक मास तक रहती है प्रज्वलित

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कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली परंपरा: शिखर पर जलती है अखंड मशाल, कार्तिक मास तक रहती है प्रज्वलित

सारांश

कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर की दीपावली परंपरा अनूठी है — शिखर पर जलाई गई अखंड मशाल नरक चतुर्दशी से त्रिपुरारी पूर्णिमा तक प्रज्वलित रहती है। पद्मपुराण के अनुसार कार्तिक मास में यहाँ दीप जलाना महायज्ञ के बराबर माना गया है, और लाखों श्रद्धालु पंचगंगा स्नान के बाद माँ अंबाबाई के दर्शन करते हैं।

मुख्य बातें

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है।
दीपावली पर नरक चतुर्दशी से त्रिपुरारी पूर्णिमा तक मंदिर शिखर पर अखंड मशाल प्रज्वलित रहती है।
पद्मपुराण के अनुसार, कार्तिक मास में शक्ति तीर्थ पर दीप जलाना महायज्ञ के समतुल्य पुण्यदायी है।
भक्त भोर में पंचगंगा नदी में कार्तिक स्नान व दीपदान कर माँ अंबाबाई के दर्शन करते हैं।
दीपावली पर देवी को बहुमूल्य सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है।
मंदिर का किरणोत्सव वर्ष में दो बार होता है, जब सूर्य की किरणें सीधे देवी के चरणों को स्पर्श करती हैं।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित श्री अंबाबाई मंदिर (महालक्ष्मी मंदिर) में दीपावली के अवसर पर एक अनूठी सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है — मंदिर के शिखर पर विशेष दीया और अखंड मशाल प्रज्वलित की जाती है, जो नरक चतुर्दशी से कार्तिक मास की त्रिपुरारी पूर्णिमा तक निरंतर जलती रहती है। यह परंपरा कार्तिक स्नान और अनुष्ठानों का अभिन्न अंग मानी जाती है, और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है और शक्ति-उपासना की अटूट परंपरा का जीवंत प्रतीक है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, तिरुपति बालाजी की यात्रा के पश्चात कोल्हापुर अंबाबाई के दर्शन अत्यंत शुभ फलदायी माने जाते हैं। यह मंदिर इतिहास, आस्था और वास्तुकला का एक असाधारण संगम है, जहाँ सच्चे मन से माँगी गई हर मन्नत पूरी होती है — यह विश्वास भक्तों की पीढ़ियों से चला आ रहा है।

मंदिर का सबसे विख्यात आकर्षण किरणोत्सव है, जो वर्ष में दो बार आयोजित होता है। इस विशेष अवसर पर डूबते सूर्य की किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर देवी अंबाबाई के चरणों को स्पर्श करती हैं — एक ऐसी खगोलीय घटना जो प्राचीन मंदिर स्थापत्य की अद्वितीय वास्तुकला का प्रमाण है।

दीपावली की अखंड मशाल परंपरा

दीपावली के पावन पर्व पर नरक चतुर्दशी से आरंभ होकर कार्तिक मास की त्रिपुरारी पूर्णिमा तक मंदिर के शिखर पर विशेष दीपदान और मशाल प्रज्वलित की जाती है। यह मशाल अगली अमावस्या अथवा निर्धारित तिथि तक अखंड रूप से जलती रहती है। मान्यता है कि शिखर पर जलती यह मशाल माता महालक्ष्मी की कृपा का प्रतीक है और भक्तों के जीवन से अज्ञान, कठिनाइयों तथा आर्थिक संकट का अंधकार दूर करती है।

पद्मपुराण एवं अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, कार्तिक मास में विष्णु या शक्ति तीर्थस्थलों पर दीप प्रज्वलित करने से महान यज्ञों के समतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस अवधि में देशभर से श्रद्धालु कोल्हापुर पहुँचते हैं।

भक्तों की आस्था और कार्तिक स्नान की रीत

इस पावन काल में श्रद्धालु भोर में पंचगंगा नदी में स्नान करते हैं, दीपदान करते हैं और तत्पश्चात मंदिर में माँ अंबाबाई के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। यह कार्तिक स्नान की सनातन परंपरा का अभिन्न अंग है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि दीपावली की रात या इस पूरे कार्तिक काल में माँ अंबाबाई के दर्शन मात्र से ऋण, आर्थिक संकट एवं धन-सम्बन्धी समस्याएँ दूर होती हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

दीपावली पर देवी की विशेष सज्जा

दीपावली के शुभ दिनों में माँ अंबाबाई को विशेष रूप से बहुमूल्य सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। मंदिर की सजावट, दीप-मालाओं की रोशनी और भक्तों का उत्साह मिलकर एक अलौकिक वातावरण का निर्माण करते हैं। प्रशासन की ओर से विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं ताकि दर्शनार्थियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

गौरतलब है कि यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है — यह भारत की सांस्कृतिक विरासत और मंदिर-स्थापत्य की अमूल्य धरोहर का जीवंत उदाहरण भी है। कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर की यह अखंड मशाल परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आस्था और संस्कृति के इस अद्वितीय संगम को अक्षुण्ण रखती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो आधुनिक शोर में भी अटूट बनी हुई है। किरणोत्सव जैसी खगोलीय घटनाएँ बताती हैं कि हमारे प्राचीन वास्तुकारों की दृष्टि कितनी सूक्ष्म थी, जिसे आज की मुख्यधारा की कवरेज अक्सर महज 'धार्मिक' खबर मानकर सतही तरीके से दर्ज करती है। इस परंपरा का पद्मपुराण-आधारित पुण्य-संदर्भ यह भी रेखांकित करता है कि भारत की श्रुति-स्मृति परंपरा ने सदियों से तीर्थस्थलों को समाज की सामूहिक चेतना से किस गहराई से जोड़ा है।
RashtraPress
30 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली की अखंड मशाल परंपरा क्या है?
दीपावली के अवसर पर नरक चतुर्दशी से कार्तिक मास की त्रिपुरारी पूर्णिमा तक मंदिर के शिखर पर विशेष दीया और अखंड मशाल प्रज्वलित की जाती है। यह मशाल निर्धारित तिथि तक निरंतर जलती रहती है और भक्तों के जीवन में माता महालक्ष्मी की कृपा का प्रतीक मानी जाती है।
कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर कितने शक्तिपीठों में से एक है?
कोल्हापुर स्थित श्री अंबाबाई मंदिर महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है। हिंदू मान्यता के अनुसार तिरुपति बालाजी की यात्रा के बाद यहाँ दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
किरणोत्सव क्या है और यह कोल्हापुर मंदिर में कैसे होता है?
किरणोत्सव वर्ष में दो बार होने वाली वह अनूठी खगोलीय घटना है, जब डूबते सूर्य की किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर देवी अंबाबाई के चरणों को स्पर्श करती हैं। यह प्राचीन मंदिर-स्थापत्य की वास्तुकला कौशल का अद्भुत उदाहरण है।
कार्तिक मास में कोल्हापुर में दीपदान का क्या महत्व है?
पद्मपुराण सहित अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, कार्तिक मास में विष्णु या शक्ति तीर्थस्थलों पर दीप जलाने से महान यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता के चलते श्रद्धालु भोर में पंचगंगा नदी में स्नान कर दीपदान करते हैं और माँ अंबाबाई के दर्शन करते हैं।
दीपावली पर कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर में देवी की सज्जा कैसे होती है?
दीपावली के पावन दिनों में माँ अंबाबाई को विशेष रूप से बहुमूल्य सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। मंदिर में दीप-मालाओं और विशेष सजावट के साथ एक अलौकिक वातावरण निर्मित होता है और भक्तों के लिए विशेष दर्शन व्यवस्था की जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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