BJP सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी का बड़ा आरोप: भारत बांग्लादेश छिटमहल से दिल्ली SIR विरोध तक साजिश का दावा
सारांश
मुख्य बातें
तेलंगाना से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी ने 17 अक्टूबर 2026 को भारत बांग्लादेश सीमा पर दशकों पुराने एन्क्लेव (छिटमहल) विवाद को नई दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरुद्ध चल रहे विरोध प्रदर्शनों से सीधे जोड़ा है। रेड्डी ने आरोप लगाया कि सीमाई विसंगतियों के कारण हुए अवैध प्रवासन का असर आज मतदाता सूचियों की शुद्धता पर देखा जा सकता है और मौजूदा विरोध प्रदर्शन एक समन्वित अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा हैं।
छिटमहल विवाद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित एक वीडियो में रेड्डी ने बताया कि 2015 से पहले भारत बांग्लादेश सीमा दुनिया की सबसे जटिल अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक थी। उन्होंने कहा कि भारत के 111 एन्क्लेव बांग्लादेश के भीतर और बांग्लादेश के 51 एन्क्लेव भारत के भीतर स्थित थे। कुछ स्थानों पर स्थिति और भी पेचीदा थी, जहाँ एक देश का भूभाग दूसरे देश के भूभाग के अंदर स्थित भूभाग में समाया हुआ था।
रेड्डी के अनुसार, विभाजन के दौर से चली आ रही इन विसंगतियों के कारण वहाँ रहने वाले लोग कई दशकों तक प्रशासनिक सेवाओं, पहचान दस्तावेजों और नागरिकता से जुड़ी गंभीर समस्याओं से जूझते रहे। उन्होंने कहा, "ऐसी मूर्खतापूर्ण सीमाएं राजनीतिक हितों के लिए बनाई गई थीं। ये विभाजन के समय से लेकर हाल तक, यानी 2015 तक जारी रहीं, जब नरेंद्र मोदी सरकार आई।"
2015 भूमि सीमा समझौते की भूमिका
रेड्डी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद से पारित 2015 के भूमि सीमा समझौते (Land Boundary Agreement) के ज़रिये इस दीर्घकालीन समस्या का समाधान किया गया। समझौते के तहत दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय अदला बदली हुई और संबंधित निवासियों को नागरिकता चुनने का विकल्प दिया गया। इसी के साथ दोनों देशों की सीमाओं के भीतर विद्यमान दूसरे देश के भूभागों की जटिल व्यवस्था औपचारिक रूप से समाप्त हुई।
गौरतलब है कि यह समझौता केवल BJP सरकार की नहीं, बल्कि दशकों की द्विपक्षीय वार्ता का परिणाम था — हालाँकि रेड्डी ने इस संदर्भ का उल्लेख नहीं किया।
दिल्ली SIR विरोध से जोड़: मुख्य आरोप
BJP सांसद ने भारत बांग्लादेश सीमा के ऐतिहासिक संदर्भ को दिल्ली में चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों से सीधे जोड़ा। उनका तर्क था कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण अवैध और अपात्र प्रविष्टियों की पहचान के लिए अनिवार्य है, जो कथित तौर पर अवैध प्रवासन की देन हैं।
SIR के आलोचकों का दावा है कि इस प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं और बड़ी संख्या में पात्र मतदाता भी इसकी चपेट में आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग की है। रेड्डी ने इन विरोधों को खारिज करते हुए पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और असम सहित अन्य क्षेत्रों में कांग्रेस पर निशाना साधा और दावा किया कि कथित अवैध प्रवासन का प्रभाव हैदराबाद, दिल्ली, बिहार और ओडिशा तक फैला है।
विपक्ष पर अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का आरोप
रेड्डी ने अपने आरोपों को और आगे ले जाते हुए दावा किया कि हालिया विरोध प्रदर्शन और डिजिटल अभियान प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को हटाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे एक समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा हैं। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और कुछ अन्य संगठनों पर एक साझा उद्देश्य से काम करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, "उनके (विपक्ष के) पास कोई साझा मुद्दा नहीं है। साझा मुद्दा न तो नीट है, न यूपीआई भुगतान प्रणाली और न ही चुनाव आयोग। साझा उद्देश्य प्रधानमंत्री मोदी को हराना और सत्ता परिवर्तन करना है।" उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में नेतृत्व परिवर्तन चुनावों के ज़रिये होना चाहिए, न कि कथित तौर पर संगठित सड़क प्रदर्शनों से।
सोशल मीडिया हेरफेर और आर्थिक दबाव के दावे
रेड्डी ने आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़े एक स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्ति का उल्लेख करते हुए इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की अचानक बढ़ोतरी को "100 प्रतिशत फर्जी और 100 प्रतिशत भुगतान करके हासिल किया गया" करार दिया। हालाँकि, यह आरोप उन्होंने बिना किसी स्वतंत्र सत्यापन के लगाया।
इसके अलावा उन्होंने मुद्रा में उतार चढ़ाव, तेल व्यापार में व्यवधान और सूचना प्रौद्योगिकी तथा दवा उद्योग पर संभावित बाहरी दबावों को लेकर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, मोदी सरकार इन चुनौतियों के बावजूद भारत की रणनीतिक और आर्थिक स्वायत्तता बनाए रखने में सफल रही है।
दिल्ली SIR पर यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब आगामी चुनावी चक्र को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण गहरा हो रहा है — और मतदाता सूची की शुद्धता बनाम मताधिकार सुरक्षा का विमर्श राष्ट्रीय स्तर पर एक केंद्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।