क्या भारत में मुसलमानों और हिन्दुओं के लिए न्याय की दो आंखें हैं? - सनी धीमान
सारांश
मुख्य बातें
चंडीगढ़, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज करने के बाद जेएनयूएसयू के पूर्व नेता डॉ. सनी धीमान ने कहा कि भारत में न्याय की दो आंखें हैं—एक मुसलमानों के लिए और दूसरी हिन्दुओं के लिए।
सनी धीमान ने चंडीगढ़ में राष्ट्र प्रेस से बातचीत करते हुए कहा कि महाराजा रणजीत सिंह केवल एक आंख से देख सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी प्रजा को समान न्याय प्रदान किया। आज के भारत में न्याय की दो आंखें हैं। यह बात उन्होंने हाल ही में ऊपरी अदालत के आदेश के संदर्भ में कही। मामला अभी ट्रायल में नहीं है, फिर भी गलत जानकारी फैलाने के लिए बार-बार मुसलमानों का चेहरा दिखाया जा रहा है ताकि लोगों का ध्यान भटकाया जा सके।
उन्होंने कपिल मिश्रा के भड़काऊ बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके खिलाफ आज तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। जबकि शरजील इमाम और उमर खालिद को बिना ट्रायल के पांच सालों से जेल में रखा गया है। हमें तो महाराजा रणजीत सिंह जैसा न्याय चाहिए।
सफाई के मुद्दे पर इंदौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इंदौर में सफाई के मामले में नंबर-1 है, वहीं गंदे पानी के कारण कई मौतें हुई हैं। इस मामले से ध्यान हटाने के लिए जेएनयू के नारों को बढ़ावा दिया जा रहा है। कोई भी प्रधानमंत्री मोदी की जान के पीछे नहीं पड़ा है। हम उन्हें पसंद करते हैं और चाहते हैं कि वे 100 साल तक जीवित रहें।
दिल्ली दंगों पर उन्होंने कहा कि हमें नहीं पता कि शरजील और उमर ने सच में ऐसा किया था या असली दोषियों ने। मेरी चिंता यह है कि जिन लोगों की जान गई, उन्हें कब न्याय मिलेगा? इतने सारे लोगों की जान चली गई, उन्हें न्याय कैसे मिलेगा? क्या असली दोषी हिरासत में हैं या नहीं, क्योंकि यह जमानत की याचिका थी। इससे यह तय नहीं होता कि उमर खालिद या शरजील इमाम सच में जिम्मेदार थे।
उन्होंने कहा कि देश में अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जैसे महंगाई और बेरोजगारी, जिन पर चर्चा नहीं की जा रही है। हम भटकते रहेंगे और देश को पीछे ले जाते रहेंगे।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि मैं स्वयं जेएनयू से हूं। भारत का संविधान आपको विरोध करने और अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार देता है।
कांग्रेस या किसी भी सरकार के तहत, युवाओं को अपनी आवाज उठानी चाहिए। हम हिंसा का विरोध करते हैं। संविधान के अनुसार, हम अपनी बात रखना चाहते हैं।