दलाई लामा का घुटने की सर्जरी के बाद लद्दाख में आराम, 91 साल की उम्र में 130 साल जीने की उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने 9 जुलाई 2026 को कहा कि नई दिल्ली में बाएं घुटने की सफल सर्जरी के बाद लद्दाख के लेह का मौसम उनकी सेहत के लिए अनुकूल है और वे अगले कुछ हफ्तों तक वहीं रहेंगे। 91 वर्षीय नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ने अपने जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने वाले अनुयायियों का आभार जताते हुए करुणा और दूसरों की सेवा को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य बताया।
सर्जरी के बाद स्वास्थ्य लाभ
दलाई लामा के अनुसार, नई दिल्ली में पिछले महीने उनके बाएं घुटने की सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इसके बाद से वे लद्दाख में आराम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "पहले की तरह इस समय यहां का मौसम मेरी सेहत के लिए बहुत अनुकूल है, इसलिए मैंने अगले कुछ हफ्तों तक यहीं रहने का फैसला किया है।" उनके कार्यालय के अनुसार, वे पिछले 55 वर्षों से भी अधिक समय से लद्दाख आते रहे हैं।
91वें जन्मदिन का संदेश
6 जुलाई को लेह के शेवात्सेल टीचिंग ग्राउंड में दलाई लामा का 91वां जन्मदिन उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, "जब मैं अपने जीवन को देखता हूं तो महसूस करता हूं कि दूसरों की मदद करने की भावना हमेशा मेरी साधना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। हर सुबह उठते ही सबसे पहले यही विचार मेरे मन में आता है।"
जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने वाले सभी अनुयायियों और शुभचिंतकों का धन्यवाद करते हुए उन्होंने कहा, "दया और करुणा फैलाना आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। अगर हम दुनिया को सभी के लिए बेहतर बनाना चाहते हैं तो यह सोच बहुत जरूरी है।"
करुणा और सेवा का संदेश
दलाई लामा ने दुनिया भर के अनुयायियों — युवा और बुजुर्ग — से अपील की कि वे प्रेम, दया और करुणा का व्यवहार करें। उन्होंने कहा, "मेरे विश्वास के अनुसार, यही एक अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का सही तरीका है — ऐसा जीवन जो दूसरों की सेवा के लिए समर्पित हो।"
130 साल जीने की उम्मीद और तिब्बत वापसी की इच्छा
दलाई लामा ने कहा, "मैं अब 91 साल का हूं, लेकिन मेरे सपनों से मिलने वाले संकेत बताते हैं कि शायद मैं 130 साल तक जीवित रहूं।" उन्होंने उम्मीद जताई कि वे बुद्ध के उपदेशों के ज़रिए चीन के लोगों की भी मदद कर सकेंगे। गौरतलब है कि दलाई लामा 1959 में चीनी सेना द्वारा ल्हासा पर नियंत्रण किए जाने के बाद अपने समर्थकों के साथ तिब्बत छोड़कर भारत आए थे। इसके बावजूद वे एक दिन तिब्बत लौटने की आशा बनाए हुए हैं।
लद्दाख से गहरा नाता
यह ऐसे समय में आया है जब दलाई लामा की सेहत को लेकर उनके वैश्विक अनुयायियों में गहरी चिंता बनी हुई थी। लद्दाख के लोगों का उनके साथ दशकों पुराना भावनात्मक और आस्था से जुड़ा रिश्ता है। दलाई लामा दुनिया में शांति और धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देने वाले सबसे सम्मानित आध्यात्मिक नेताओं में गिने जाते हैं। आने वाले हफ्तों में लेह में उनकी उपस्थिति स्थानीय समुदाय और तीर्थयात्रियों के लिए विशेष महत्व रखती है।