दिल्ली एलजी तरनजीत सिंह संधू ने मेट्रो में किया सफर, यात्रियों और स्ट्रीट वेंडर से की सीधी बातचीत
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने शनिवार, 11 जुलाई को दिल्ली मेट्रो में सफर किया और सह-यात्रियों से सीधे संवाद किया। कनॉट प्लेस जाते समय उन्होंने मेट्रो में यात्रियों से रोज़मर्रा के सफर, नागरिक मुद्दों और शहर से जुड़ी उम्मीदों पर बातचीत की। इस मुलाकात की तस्वीरें उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा कीं।
एलजी ने एक्स पर क्या लिखा
संधू ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा, 'कनॉट प्लेस जाते समय मैंने दिल्ली मेट्रो से सफर किया और रास्ते में साथ सफर करने वाले लोगों से बातचीत करने का मौका मिला। पहले की तरह ही, यह एक बहुत जानकारीपूर्ण अनुभव था। उनसे सीधे उनके रोज़ाना के सफर, नागरिक मुद्दों और हमारे शहर के लिए उनकी उम्मीदों के बारे में जानना। ये बातचीत हमें याद दिलाती है कि अच्छा शासन लोगों की बात सुनने पर ही टिका होता है।'
उन्होंने आगे जोड़ा कि नागरिकों के रोज़मर्रा के अनुभवों से जुड़े रहने से यह सुनिश्चित होता है कि प्रशासन की कोशिशें लोगों की ज़रूरतों के अनुरूप हों और सभी के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने पर केंद्रित रहें।
पालिका बाज़ार में स्ट्रीट वेंडर से मुलाकात
मेट्रो सफर के अलावा, एलजी संधू ने सेंट्रल दिल्ली में पालिका बाज़ार के पास एक स्ट्रीट वेंडर से भी बातचीत की और उसकी झलकियाँ सोशल मीडिया पर साझा कीं। यह उनके उस अंदाज़ का हिस्सा है जिसमें वे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी आम नागरिकों तक सीधे पहुँचने की कोशिश करते हैं।
पहले के जन-संपर्क दौरे
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब संधू इस तरह लोगों के बीच पहुँचे हैं। इससे पहले वे चांदनी चौक, दिल्ली विश्वविद्यालय और आसपास के इलाकों में अचानक दौरा करके स्ट्रीट फूड का स्वाद लेते और लोगों से बातचीत करते देखे गए हैं। अप्रैल में उन्होंने अरुण जेटली स्टेडियम में क्रिकेट मैच के दौरान हज़ारों दर्शकों के बीच बैठकर दिल्ली कैपिटल्स की टीम की टी-शर्ट पहनकर उत्साह बढ़ाया था।
शासन शैली की खास पहचान
अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत रहे तरनजीत सिंह संधू की यह कार्यशैली दिल्ली के प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के जन-संपर्क दौरे शासन की प्राथमिकताओं को समझने का एक सीधा तरीका हैं, हालाँकि नीतिगत बदलावों पर इनका असर समय के साथ ही स्पष्ट होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि ज़मीनी फीडबैक से दिल्ली के नागरिक मुद्दों पर प्रशासनिक प्राथमिकताएँ किस हद तक बदलती हैं।