डोडा में लंपी स्किन डिजीज के 300 से अधिक मामले, पशुपालन विभाग का घर-घर टीकाकरण अभियान जारी
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में मवेशियों के बीच तेज़ी से पाँव पसार रही लंपी स्किन डिजीज (LSD) ने पशुपालकों की नींद उड़ा दी है। जिला पशुपालन विभाग के आँकड़ों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में 300 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिसके बाद विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में युद्धस्तर पर टीकाकरण, जागरूकता और उपचार अभियान शुरू कर दिया है। मुख्य पशुपालन अधिकारी डॉ. इरफान अली वानी ने स्थिति को नियंत्रण में बताते हुए पशुपालकों से अफ़वाहों से बचने की अपील की है।
मुख्य घटनाक्रम
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को पशुपालन विभाग की टीमें बगोर इलाके में घर-घर जाकर पशुओं की जाँच और टीकाकरण कर रही हैं। अधिकारियों के अनुसार यह अभियान जिले के सभी प्रभावित क्षेत्रों में एक साथ चलाया जा रहा है।
डॉ. वानी ने बताया कि लंपी स्किन डिजीज का प्रसार केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर भारत में इसके छिटपुट मामले देखे जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मृत्यु दर मात्र 1 से 2 प्रतिशत है और समय पर उपचार से पशु पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं।
बीमारी कैसे फैलती है
डॉ. वानी के अनुसार, यह वायरस मुख्यतः दो माध्यमों से फैलता है — संक्रमित पशु के सीधे संपर्क से, और मच्छर व मक्खियों के काटने से। जब कोई मच्छर संक्रमित पशु को काटकर किसी स्वस्थ पशु को काटता है तो वायरस का प्रसार होता है। उन्होंने बताया कि जिन पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, उनमें संक्रमण का असर कम या नहीं के बराबर होता है।
पशुपालन अधिकारी ने स्वच्छता पर विशेष ज़ोर दिया और कहा कि पशुओं के रहने की जगह की साफ़-सफ़ाई और समय पर टीकाकरण बीमारी की रोकथाम में सबसे कारगर उपाय हैं।
उपचार और संसाधन
डॉ. वानी ने बताया कि 4 से 5 दिन के उपचार में पशु सामान्यतः ठीक हो जाता है, बशर्ते वह खाना-पीना न छोड़े। विभाग के पास अधिकांश आवश्यक दवाएँ उपलब्ध हैं। कुछ बाहरी दवाओं की ज़रूरत पड़ती है, जिनकी क़ीमत 100 से 200 रुपये के बीच है। उन्होंने पशुपालकों से आग्रह किया कि वे इन दवाओं को स्वयं भी उपलब्ध रखें।
विभाग की टीमें दो स्तरों पर काम कर रही हैं — जागरूकता प्रसार और तत्काल उपचार सेवा। डोडा के दुर्गम पहाड़ी भूगोल और सीमित स्टाफ़ के बावजूद फ़ील्ड कर्मचारी हर गाँव तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं।
पशुपालकों की प्रतिक्रिया
एक स्थानीय किसान ने बताया, 'हम बहुत घबरा गए थे, जब यहाँ यह बीमारी आई। यह हमारे लिए रोज़गार का एकमात्र साधन है, गाँव के सभी लोगों का यही सहारा है। हमने तुरंत पशुपालन विभाग से संपर्क किया। विभाग की टीम तुरंत आई और हमारे पशुओं का टीकाकरण किया।'
एक अन्य पशुपालक ने राहत व्यक्त करते हुए कहा, 'पहले हम सभी लोग बहुत डरे हुए थे कि कहीं हमारी गाय मर न जाए। लेकिन अब समय-समय पर टीकाकरण हो रहा है और डॉक्टर खुद गाँव-गाँव आ रहे हैं।' उन्होंने उम्मीद जताई कि निरंतर टीकाकरण से यह बीमारी दोबारा नहीं लौटेगी।
आगे की राह और चुनौतियाँ
अधिकारियों ने स्वीकार किया कि दुर्गम पहाड़ी इलाके और स्टाफ़ की कमी दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। एक गाँव से दूसरे गाँव तक पहुँचने में लगने वाला समय त्वरित प्रतिक्रिया में बाधा बनता है। डॉ. वानी ने यह भी स्पष्ट किया कि पशु मृत्यु की अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं जो तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं — जब भी विभाग ने सबूत माँगे, कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर भारत के कई राज्यों में LSD के मामले छिटपुट तरीके से रिपोर्ट हो रहे हैं। गौरतलब है कि 2022 में भी लंपी स्किन डिजीज ने राजस्थान और पंजाब समेत कई राज्यों में बड़े पैमाने पर मवेशियों को प्रभावित किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि सक्रिय टीकाकरण और समय पर निगरानी ही इसके प्रसार को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।