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डोडा में डॉग बाइट के मामले बढ़े: जून तक 700 से अधिक केस, सीएमओ डॉ. विनोद शर्मा ने जारी की चेतावनी

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डोडा में डॉग बाइट के मामले बढ़े: जून तक 700 से अधिक केस, सीएमओ डॉ. विनोद शर्मा ने जारी की चेतावनी

सारांश

डोडा में इस साल जून तक ही 700 से अधिक डॉग बाइट केस — पिछले साल के 1,510 के आँकड़े को पार करने की राह पर। सीएमओ डॉ. विनोद शर्मा की चेतावनी: रेबीज 100% जानलेवा है, अधूरा इलाज खतरनाक है, और आवारा कुत्तों की नसबंदी व टीकाकरण ही स्थायी समाधान है।

मुख्य बातें

डोडा जिले में जून 2026 तक 700 से अधिक डॉग बाइट के मामले दर्ज, जबकि पिछले पूरे साल में 1,510 मामले थे।
विनोद शर्मा ने रेबीज को 100% जानलेवा बताया यदि समय पर इलाज न मिले।
सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर रेबीज वैक्सीन उपलब्ध है; पूरा टीकाकरण कोर्स अनिवार्य।
काटने के बाद 10 दिनों तक कुत्ते की निगरानी जरूरी — बीमार या मृत होने पर तत्काल उपचार आवश्यक।
आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण को स्थायी समाधान बताया गया; पालतू कुत्तों का भी नियमित वैक्सीनेशन जरूरी।
झोलाछाप या केमिस्ट से अधूरा इलाज स्थिति को और गंभीर बना सकता है — विशेषज्ञ डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें।

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएँ चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रही हैं। जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. विनोद शर्मा के अनुसार, पिछले वर्ष डोडा में 1,510 डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, जबकि इस वर्ष जून 2026 तक ही 700 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं — यह आँकड़ा स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर संकेत है। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो वर्ष के अंत तक यह संख्या पिछले साल के कुल आँकड़े को पार कर सकती है।

मुख्य घटनाक्रम

डॉ. शर्मा ने बताया कि जानवरों के काटने की अधिकांश घटनाओं में आवारा कुत्ते जिम्मेदार हैं, हालाँकि कुछ मामलों में बंदर या अन्य जंगली जानवर भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुत्ते अक्सर तब आक्रामक होते हैं जब वे खुद को खतरे में महसूस करते हैं, लेकिन कई मामलों में बिना किसी उकसावे के भी काटने की घटनाएँ हो रही हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब डोडा जिले में आवारा कुत्तों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बढ़ती आबादी और मानव-पशु संपर्क के कारण यह समस्या और गहरी होती जा रही है।

रेबीज का खतरा और सरकारी तैयारी

डॉ. विनोद शर्मा ने चेतावनी दी कि रेबीज एक अत्यंत घातक बीमारी है, जो समय पर इलाज न मिलने पर 100 प्रतिशत तक जानलेवा हो सकती है। उन्होंने बताया कि सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर रेबीज वैक्सीन उपलब्ध है, परंतु लोगों की लापरवाही — अधूरा टीकाकरण कोर्स और झोलाछाप या केमिस्ट से आंशिक दवाएँ लेना — स्थिति को और गंभीर बना देती है।

गौरतलब है कि रेबीज के मामले में 10 दिनों की निगरानी का विशेष महत्व है। यदि काटने वाला कुत्ता 10 दिनों तक स्वस्थ रहता है, तो संक्रमण का खतरा सामान्यतः कम माना जाता है। किंतु यदि कुत्ता बीमार पड़ जाए या मर जाए, तो प्रभावित व्यक्ति को तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है।

बचाव के उपाय: सीएमओ की सलाह

डॉ. शर्मा ने कहा कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल इलाज नहीं, बल्कि रोकथाम में निहित है। उन्होंने आवारा कुत्तों की नसबंदी (स्टरलाइजेशन) और नियमित टीकाकरण (वैक्सीनेशन) को अनिवार्य बताया। उनके अनुसार, यदि कुत्तों की संख्या नियंत्रित की जाए और समय पर वैक्सीन दी जाए, तो रेबीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रेबीज का खतरा केवल आवारा कुत्तों से नहीं, बल्कि पालतू कुत्तों से भी हो सकता है — यदि उनका पूर्ण टीकाकरण न हुआ हो। इसलिए पालतू जानवरों के मालिकों को भी नियमित वैक्सीनेशन और निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।

आम जनता पर असर

सीएमओ ने नागरिकों से अपील की कि किसी भी जानवर के काटने की स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें और टीकाकरण का पूरा कोर्स पूरा करें। उन्होंने कहा कि जागरूकता और समय पर उपचार ही रेबीज से होने वाली मौतों को रोकने का एकमात्र प्रभावी तरीका है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, डोडा जैसे पहाड़ी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आवारा पशु प्रबंधन की चुनौती विशेष रूप से जटिल है, जहाँ नगर निकाय संसाधन सीमित हैं। जब तक नसबंदी और टीकाकरण अभियान व्यापक स्तर पर लागू नहीं होता, तब तक डॉग बाइट के मामलों में कमी आना मुश्किल है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिस पर नगर निकाय और स्वास्थ्य विभाग वर्षों से एक-दूसरे की जिम्मेदारी मानते आए हैं। नसबंदी और टीकाकरण की सलाह नई नहीं है — यह हर साल दोहराई जाती है, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन के बिना यह महज एक बयान बनकर रह जाती है। असली सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच कोई ठोस समन्वय तंत्र है — या हर बार बढ़ते आँकड़ों के बाद चेतावनी जारी होती है और फिर सब पहले जैसा हो जाता है।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डोडा में डॉग बाइट के मामले कितने बढ़ गए हैं?
सीएमओ डॉ. विनोद शर्मा के अनुसार, पिछले साल डोडा में 1,510 डॉग बाइट केस दर्ज हुए थे, जबकि इस साल जून 2026 तक ही 700 से अधिक मामले आ चुके हैं। यदि यही रफ्तार जारी रही, तो यह संख्या पिछले साल के कुल आँकड़े को पार कर सकती है।
कुत्ते के काटने पर क्या करना चाहिए?
सीएमओ की सलाह है कि किसी भी जानवर के काटने पर तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करें और रेबीज टीकाकरण का पूरा कोर्स पूरा करें। झोलाछाप या केमिस्ट से अधूरा इलाज लेने से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
रेबीज कितना खतरनाक है और क्या इसका इलाज संभव है?
डॉ. विनोद शर्मा के अनुसार, रेबीज एक अत्यंत घातक बीमारी है जो समय पर इलाज न मिलने पर 100 प्रतिशत तक जानलेवा हो सकती है। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर रेबीज वैक्सीन उपलब्ध है, और समय पर पूरा टीकाकरण कराने से इससे बचा जा सकता है।
डॉग बाइट के बाद 10 दिनों की निगरानी क्यों जरूरी है?
यदि काटने वाला कुत्ता 10 दिनों तक स्वस्थ रहता है, तो रेबीज संक्रमण का खतरा सामान्यतः कम माना जाता है। लेकिन अगर कुत्ता बीमार हो जाए या मर जाए, तो प्रभावित व्यक्ति को तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है।
आवारा कुत्तों की समस्या को स्थायी रूप से कैसे रोका जा सकता है?
सीएमओ डॉ. शर्मा के अनुसार, आवारा कुत्तों की नसबंदी (स्टरलाइजेशन) और नियमित टीकाकरण ही इस समस्या का स्थायी समाधान है। इसके साथ ही पालतू कुत्तों का भी नियमित वैक्सीनेशन जरूरी है, क्योंकि रेबीज का खतरा केवल आवारा नहीं बल्कि अनवैक्सीनेटेड पालतू कुत्तों से भी होता है।
राष्ट्र प्रेस
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