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घुमंतू समुदाय के लिए महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला, त्रिस्तरीय समितियां गठित

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घुमंतू समुदाय के लिए महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला, त्रिस्तरीय समितियां गठित

सारांश

महाराष्ट्र सरकार ने घुमंतू और विमुक्त समुदाय के विकास व सुरक्षा के लिए राज्य, जिला और उपमंडल स्तर पर त्रिस्तरीय समितियां गठित की हैं। मंत्री अतुल सावे की अध्यक्षता में यह व्यवस्था अत्याचार रोकने, सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए बनाई गई है।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र सरकार ने 24 अप्रैल 2025 को घुमंतू और विमुक्त समुदाय के लिए त्रिस्तरीय समिति व्यवस्था लागू की।
अन्य पिछड़ा वर्ग बहुजन कल्याण मंत्री अतुल सावे राज्य स्तरीय समिति की अध्यक्षता करेंगे।
राज्य स्तरीय समिति में कम से कम एक महिला सहित छह गैर-सरकारी सदस्य शामिल होंगे।
समितियों का प्रमुख कार्य अत्याचार पर एफआईआर, चिकित्सा-कानूनी सहायता और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, बिजली, पानी और रोजगार — सभी क्षेत्रों में इस समुदाय के उत्थान पर जोर दिया जाएगा।
रेणके आयोग (2008) की सिफारिशों के बाद यह अब तक की सबसे संरचित नीतिगत पहल मानी जा रही है।

मुंबई, 24 अप्रैल। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के घुमंतू और विमुक्त समुदाय के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक उत्थान के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए त्रिस्तरीय समिति व्यवस्था लागू की है। अन्य पिछड़ा वर्ग बहुजन कल्याण मंत्री अतुल सावे ने इस फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि राज्य, जिला और उपमंडल — तीनों स्तरों पर समितियां बनाई गई हैं, जो इस समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर तत्काल कार्रवाई करेंगी और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे इन तक पहुंचाएंगी।

क्यों जरूरी था यह कदम?

भारत में घुमंतू और विमुक्त जनजातियां दशकों से सामाजिक हाशिये पर रही हैं। ब्रिटिश काल में 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत इन्हें 'जन्मजात अपराधी' घोषित किया गया था, जिसे 1952 में निरस्त किया गया। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी इन समुदायों की पहचान, स्थायी आवास, शिक्षा और रोजगार की समस्याएं बनी हुई हैं। महाराष्ट्र में इनकी आबादी करोड़ों में है, फिर भी सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक पहुंचना अब तक एक बड़ी चुनौती रहा है।

गौरतलब है कि रेणके आयोग (2008) ने अपनी रिपोर्ट में घुमंतू जनजातियों की दुर्दशा को विस्तार से दर्ज किया था और त्वरित नीतिगत हस्तक्षेप की सिफारिश की थी। इस लिहाज से महाराष्ट्र सरकार का यह कदम उस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

त्रिस्तरीय समितियों की संरचना

राज्य स्तरीय समिति की अध्यक्षता स्वयं मंत्री अतुल सावे करेंगे। इसमें विभाग के सचिव सदस्य होंगे और पुणे स्थित अन्य पिछड़ा वर्ग बहुजन कल्याण निदेशालय के निदेशक सदस्य सचिव की भूमिका निभाएंगे। इसके अतिरिक्त संयुक्त सचिव या उप सचिव के साथ घुमंतू समुदाय के लिए कार्यरत छह गैर-सरकारी सदस्य शामिल होंगे, जिनमें कम से कम एक महिला की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

जिला स्तरीय समिति का नेतृत्व जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट करेंगे। इसमें पुलिस आयुक्त या पुलिस अधीक्षक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला जाति सत्यापन अधिकारी और सहायक निदेशक (ओबीसी बहुजन कल्याण) के साथ-साथ समुदाय से चार गैर-सरकारी सदस्य भी जोड़े जाएंगे।

उपमंडल स्तरीय समिति की कमान उपमंडल अधिकारी या उप जिला कलेक्टर के हाथ में होगी। इसमें उपमंडल पुलिस अधिकारी, तहसीलदार, समूह विकास अधिकारी, समूह शिक्षा अधिकारी और संबंधित थाने के अधिकारी शामिल रहेंगे। समुदाय से दो गैर-सरकारी सदस्य भी इस समिति का हिस्सा होंगे।

समितियों के प्रमुख कार्य और जिम्मेदारियां

इन समितियों का सबसे अहम काम अत्याचार की घटनाओं पर तत्काल संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज कराना, पीड़ितों को चिकित्सा और कानूनी सहायता दिलाना और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना होगा। साथ ही समुदाय में कानूनी जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएंगे।

स्वास्थ्य जांच शिविर, अंधविश्वास उन्मूलन और सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना भी समितियों की प्राथमिकता होगी। बच्चों का स्कूलों में नामांकन और शैक्षिक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएंगे।

सड़क, बिजली, पानी और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ रोजगार योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सशक्तीकरण को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

विश्लेषण: कितना असरदार होगा यह फैसला?

विशेषज्ञों का मानना है कि समिति गठन से अधिक जरूरी है उनका प्रभावी क्रियान्वयन। महाराष्ट्र में पहले भी घुमंतू समुदाय के लिए कई योजनाएं घोषित हुई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ सीमित रहा। इस बार गैर-सरकारी सदस्यों को समितियों में शामिल करना एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि इससे समुदाय की आवाज सीधे नीति-निर्माण तक पहुंच सकेगी।

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने भी विमुक्त जनजातियों के लिए विशेष बोर्ड और आयोग गठित किए हैं। महाराष्ट्र की यह त्रिस्तरीय संरचना उन प्रयासों से एक कदम आगे है, क्योंकि इसमें उपमंडल स्तर तक की जवाबदेही तय की गई है।

आने वाले महीनों में इन समितियों की पहली बैठकें और उनके कार्यान्वयन की रिपोर्ट सरकार की मंशा की असली परीक्षा होगी। सामाजिक न्याय के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन इस पहल पर करीबी नजर रखेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह समितियां सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएंगी? रेणके आयोग की सिफारिशों को लागू करने में डेढ़ दशक से अधिक लग गए — यह विडंबना बताती है कि नीतिगत घोषणाएं और जमीनी बदलाव के बीच की खाई कितनी गहरी है। गैर-सरकारी सदस्यों की भागीदारी एक सकारात्मक पहल है, लेकिन जब तक समितियों की बैठकों की नियमितता, शिकायत निवारण की समयसीमा और जवाबदेही तंत्र सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक इसे महज एक और घोषणा ही मानना होगा।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र सरकार ने घुमंतू समुदाय के लिए क्या नई व्यवस्था लागू की है?
महाराष्ट्र सरकार ने घुमंतू और विमुक्त समुदाय की सुरक्षा और विकास के लिए राज्य, जिला और उपमंडल — तीन स्तरों पर समितियां गठित की हैं। ये समितियां अत्याचार रोकने, शिकायत निवारण और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होंगी।
त्रिस्तरीय समितियों की अध्यक्षता कौन करेगा?
राज्य स्तर पर मंत्री अतुल सावे, जिला स्तर पर जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट और उपमंडल स्तर पर उपमंडल अधिकारी या उप जिला कलेक्टर इन समितियों की अध्यक्षता करेंगे। प्रत्येक समिति में सरकारी और गैर-सरकारी दोनों सदस्य शामिल होंगे।
इन समितियों से घुमंतू समुदाय को क्या फायदा होगा?
इन समितियों के जरिए अत्याचार की घटनाओं पर तत्काल एफआईआर, चिकित्सा और कानूनी सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही कानूनी जागरूकता शिविर और अंधविश्वास उन्मूलन अभियान भी चलाए जाएंगे।
विमुक्त जनजाति और घुमंतू समुदाय कौन होते हैं?
विमुक्त जनजातियां वे हैं जिन्हें ब्रिटिश काल में 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत 'जन्मजात अपराधी' घोषित किया गया था और 1952 में इस कलंक से मुक्त किया गया। घुमंतू समुदाय वे लोग हैं जो पारंपरिक रूप से एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते और जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति आज भी कमजोर है।
महाराष्ट्र में घुमंतू समुदाय के लिए पहले क्या प्रयास हुए थे?
2008 में रेणके आयोग ने घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की दुर्दशा पर विस्तृत रिपोर्ट दी थी और नीतिगत हस्तक्षेप की सिफारिश की थी। महाराष्ट्र में पहले भी इनके लिए योजनाएं बनाई गईं, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन सीमित रहा।
राष्ट्र प्रेस
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