28 अगस्त 2026
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वीर चक्र विजेता मेजर मनोज तलवार: 'ऑपरेशन तलवार' से पॉइंट 5,765 बना 'तलवार टॉप'

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वीर चक्र विजेता मेजर मनोज तलवार: 'ऑपरेशन तलवार' से पॉइंट 5,765 बना 'तलवार टॉप'

सारांश

मात्र 29 वर्ष की आयु में, शून्य से 60 डिग्री नीचे के तापमान में, घायल होने के बावजूद मेजर मनोज तलवार ने पॉइंट 5,765 पर तिरंगा फहराया — और इतिहास में 'तलवार टॉप' की इबारत लिख दी। 'ऑपरेशन तलवार' कारगिल युद्ध के उन निर्णायक अभियानों में से एक है जो साहस की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ता है।

मुख्य बातें

मेजर मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 को मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ था; वे सैन्य परंपरा की तीसरी पीढ़ी के अधिकारी थे।
दिसंबर 1992 में 3 महार में कमीशन; 1994 में कमांडो प्रशिक्षण; असम में 'ऑपरेशन राइनो' के लिए सेना मेडल से सम्मानित।
13-14 जून 1999 की मध्यरात्रि को शून्य से 40-60 डिग्री नीचे के तापमान में 'ऑपरेशन तलवार' में पॉइंट 5,765 पर तिरंगा फहराया।
मिशन पूर्ण होने के कुछ क्षणों बाद दुश्मन के मोर्टार छर्रे से 19,000 फीट गहरी खाई में शहीद हुए; मात्र 29 वर्ष की आयु में।
भारत सरकार ने मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया; पॉइंट 5,765 को स्थायी रूप से 'तलवार टॉप' और 'तलवार बेस' नाम दिया गया।
सियाचिन का तीसरा ग्लेशियर 'मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर' के नाम से जाना जाता है; मेरठ में उनके नाम पर मार्ग और प्रतिमा स्थापित।

कारगिल युद्ध के इतिहास में मेजर मनोज तलवार का नाम उन अमर सपूतों में शुमार है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर पॉइंट 5,765 पर तिरंगा फहराया और उस दुर्गम चोटी को हमेशा के लिए 'तलवार टॉप' का नाम दे दिया। 13-14 जून 1999 की मध्यरात्रि को टुरटुक सब-सेक्टर में लड़े गए 'ऑपरेशन तलवार' में उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया।

सैन्य परंपरा और प्रारंभिक जीवन

मेजर मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित गांधी कॉलोनी में हुआ था। वे अपने परिवार की सैन्य परंपरा के तीसरी पीढ़ी के अधिकारी थे। उनके पिता कैप्टन पी.एल. तलवार सेना में सिविल इंजीनियर थे, जिन्होंने 1962 के युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लद्दाख में दुनिया के सबसे ऊँचे हवाई अड्डों में से एक के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पिता की सैन्य तैनाती के चलते मनोज का बचपन कानपुर छावनी के इर्द-गिर्द बीता। मात्र 10 वर्ष की आयु में कँटीले तारों के उस पार परेड करते जवानों को देख उनके मन में देशसेवा की लौ जल उठी — एक चित्रकला प्रतियोगिता में उन्होंने स्वयंस्फूर्त 'युद्ध दृश्य' उकेरा, जो उनके भीतर पल रहे सैनिक की पहली झलक थी।

शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण

मनोज तलवार ने असाधारण मेधा का परिचय देते हुए आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज (AFMC) और नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) दोनों की प्रवेश परीक्षाएँ एक साथ उत्तीर्ण कीं। एक सुरक्षित चिकित्सा जीवन की जगह उन्होंने अग्रिम मोर्चे की इन्फैंट्री को चुना — यह निर्णय उनके चरित्र की सबसे बड़ी पहचान बना।

दिसंबर 1992 में उन्हें महार रेजीमेंट की तीसरी बटालियन (3 महार) में कमीशन मिला। 1994 में उन्होंने महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज से कमांडो प्रशिक्षण पूरा किया। असम में 'ऑपरेशन राइनो' के अंतर्गत उल्फा उग्रवादियों के विरुद्ध अभियानों में उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए उन्हें प्रतिष्ठित सेना मेडल से नवाज़ा गया।

उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए फरवरी 1999 में उनकी विशेष माँग पर उन्हें 'आउट ऑफ टर्न' तैनाती देकर 9 महार बटालियन के साथ सियाचिन के साल्तोरो रिज पर भेजा गया।

ऑपरेशन तलवार: कारगिल की निर्णायक रात

मई 1999 में जब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की चोटियों पर कब्जा जमा लिया, तो टुरटुक सब-सेक्टर में दुश्मन को खदेड़ने के लिए एक विशेष अभियान की रूपरेखा तैयार की गई — जिसे उनके ही नाम पर 'ऑपरेशन तलवार' का कोडनेम दिया गया।

13 जून 1999 की अंधेरी और हाड़ कँपाती रात में, शून्य से 40 से 60 डिग्री नीचे के तापमान और खड़ी बर्फीली चट्टानों के बीच मेजर तलवार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़े। पाकिस्तानी सेना ने ऊपर से भारी तोपखाने और मोर्टार से गोलाबारी आरंभ कर दी। एक जवान के घायल होने पर मेजर तलवार ने स्वयं मशीन गन उठाई और टुकड़ी को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया।

दुश्मन के मोर्टार और ग्रेनेड के छर्रे लगने से वे बुरी तरह घायल हो गए, फिर भी उन्होंने टुकड़ी को सामने से घेरने का रणनीतिक आदेश दिया — एक साहसी और निर्णायक कदम। 13 और 14 जून की मध्यरात्रि को, अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्होंने पॉइंट 5,765 पर कब्जा कर लिया और उस दुर्गम शिखर पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

शहादत और अमर विरासत

तिरंगा फहराने के कुछ ही क्षणों बाद दुश्मन के एक मोर्टार शेल का छर्रा सीधे उनकी आँख में आ लगा और यह वीर सपूत 19,000 फीट गहरी खाई में गिर गया। मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने शहादत की वह इबारत लिखी जिसने कारगिल युद्ध की दिशा बदल दी। उनका पार्थिव शरीर 16 जून 1999 को मेरठ स्थित उनके घर पहुँचा।

भारत सरकार ने उनके अकल्पनीय शौर्य और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया। उनके सामरिक योगदान के सम्मान में पॉइंट 5,765 को स्थायी रूप से 'तलवार टॉप' और 'तलवार बेस' नाम दिया गया। 9 महार ने सियाचिन के तीसरे ग्लेशियर का नाम भी उनके सम्मान में 'मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर' रखा है। मेरठ में कमिश्नरी चौक से उनके घर तक जाने वाले मार्ग और एक प्रतिमा उनकी स्मृति को जीवंत रखती है।

गौरतलब है कि यह वही पीढ़ी थी जिसने 1999 की गर्मियों में न केवल ज़मीन वापस ली, बल्कि राष्ट्र को यह भरोसा भी दिलाया कि हर चोटी पर तिरंगा लहराना संभव है — चाहे कीमत कुछ भी हो।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि टुरटुक सब-सेक्टर की इन चोटियों पर लड़ी गई लड़ाइयाँ रणनीतिक दृष्टि से उतनी ही निर्णायक थीं। यह भी उल्लेखनीय है कि उनके नाम पर ग्लेशियर, चोटी और सड़क — तीनों का नामकरण — सेना की उस परंपरा को दर्शाता है जो शौर्य को संस्थागत स्मृति में बदल देती है।
RashtraPress
28 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेजर मनोज तलवार कौन थे और उन्हें वीर चक्र क्यों मिला?
मेजर मनोज तलवार 9 महार बटालियन के अधिकारी थे, जिन्होंने 13-14 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान 'ऑपरेशन तलवार' में पॉइंट 5,765 पर कब्जा करते हुए वीरगति पाई। घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन को खदेड़ा और तिरंगा फहराया, जिसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया।
'ऑपरेशन तलवार' क्या था?
'ऑपरेशन तलवार' कारगिल युद्ध 1999 के दौरान टुरटुक सब-सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए चलाया गया विशेष सैन्य अभियान था। इस अभियान को मेजर मनोज तलवार के नाम पर ही कोडनेम दिया गया था, और इसमें उन्होंने पॉइंट 5,765 पर भारतीय तिरंगा फहराया।
'तलवार टॉप' नाम कैसे पड़ा?
पॉइंट 5,765 को मेजर मनोज तलवार के सर्वोच्च बलिदान और सामरिक योगदान के सम्मान में स्थायी रूप से 'तलवार टॉप' और 'तलवार बेस' नाम दिया गया। इसके अतिरिक्त 9 महार ने सियाचिन के तीसरे ग्लेशियर का नाम भी 'मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर' रखा।
मेजर मनोज तलवार से पहले उनकी सैन्य उपलब्धियाँ क्या थीं?
दिसंबर 1992 में 3 महार में कमीशन मिलने के बाद उन्होंने 1994 में महू आर्मी वॉर कॉलेज से कमांडो प्रशिक्षण पूरा किया। असम में 'ऑपरेशन राइनो' के तहत उल्फा उग्रवादियों के विरुद्ध अभियानों में उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।
मेरठ में मेजर मनोज तलवार की स्मृति कैसे संजोई गई है?
मेरठ में कमिश्नरी चौक से उनके घर तक जाने वाले मार्ग का नाम उनके नाम पर रखा गया है और वहाँ उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है। उनका पार्थिव शरीर 16 जून 1999 को मेरठ पहुँचा था।
राष्ट्र प्रेस
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