कारगिल वीर कैप्टन अनुज नैय्यर जयंती: बचपन में 22 टांके, 9 दुश्मनों को मारकर शहीद — महावीर चक्र विजेता की अमर गाथा
सारांश
मुख्य बातें
कारगिल युद्ध के शहीद कैप्टन अनुज नैय्यर की 28 अगस्त को जयंती है — वही वीर जिन्होंने 7 जुलाई 1999 को पॉइंट 4875 पर 9 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया और देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। मात्र 24 वर्ष की आयु में शहीद हुए कैप्टन नैय्यर को उनकी असाधारण वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र — भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पदक — से सम्मानित किया गया।
बचपन से असाधारण साहस
कैप्टन अनुज नैय्यर का जन्म 28 अगस्त 1975 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एस.के. नैय्यर प्रोफेसर थे और माँ मीना नैय्यर दिल्ली विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में कार्यरत थीं। परिवार के अनुसार, अनुज के दादा भी सेना में थे, जिनसे उनका विशेष लगाव था और जिनसे उन्हें सैन्य जीवन की प्रेरणा मिली।
बचपन में एक हादसे में गंभीर रूप से घायल होने पर अनुज ने बिना एनेस्थीसिया के 22 टांके लगवा लिए। उपस्थित चिकित्सक भी इस असाधारण धैर्य को देखकर चकित रह गए। परिवार का मानना है कि यही जज्बा आगे चलकर युद्धभूमि में उनकी ताकत बना।
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से 17 जाट रेजिमेंट तक
अनुज ने 12वीं कक्षा के बाद पहले ही प्रयास में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रवेश पाया। 1993 में प्रशिक्षण शुरू कर 1996 में वे NDA से उत्तीर्ण हुए। इसके बाद भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून में प्रशिक्षण लेकर 7 जून 1997 को सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में पास आउट हुए और 17वीं जाट रेजिमेंट में कमीशन मिला। सेना में शामिल होने के केवल दो वर्ष बाद ही वे कारगिल की आग में उतर गए — तब तक लेफ्टिनेंट से कैप्टन के पद पर पदोन्नत होकर 17 जाट की चार्ली कंपनी का हिस्सा बन चुके थे।
पॉइंट 4875 का निर्णायक युद्ध
कारगिल युद्ध के दौरान रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पॉइंट 4875 पर पाकिस्तानी घुसपैठियों का कब्जा था। 6 जुलाई 1999 को 17 जाट की चार्ली कंपनी को यह चोटी मुक्त कराने का आदेश मिला। अभियान के प्रारंभ में ही कंपनी कमांडर घायल हो गए, जिसके बाद कैप्टन नैय्यर ने स्वयं कमान संभाली।
दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच कैप्टन नैय्यर अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ते रहे। उन्होंने 9 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया और पिंपल-2 क्षेत्र में दुश्मन को पीछे धकेल दिया। स्वयं घायल होने के बावजूद उन्होंने मशीनगन से दुश्मन के एक बंकर को नष्ट किया। विजय लगभग सुनिश्चित थी — तिरंगा फहराने की तैयारी थी — कि दुश्मन का एक ग्रेनेड उनके निकट आ गिरा। 7 जुलाई 1999 को कैप्टन अनुज नैय्यर ने राष्ट्र की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
अंगूठी की अनकही कहानी
युद्ध के लिए प्रस्थान से पूर्व कैप्टन नैय्यर ने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को एक अंगूठी सौंपी थी — अनुरोध के साथ कि यदि वे न लौटें तो इसे उनकी होने वाली मंगेतर तक पहुँचा दिया जाए। अधिकारी के यह कहने पर कि वे स्वयं लौटकर देंगे, अनुज ने शांत भाव से कहा था कि युद्ध में जाने वाला सैनिक वापसी की गारंटी नहीं दे सकता। दुर्भाग्यवश वे नहीं लौटे। जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा दिल्ली पहुँचा, तो परिवार के साथ सिमरन भी थीं — वह युवती जिनसे अनुज की सगाई होने वाली थी।
शहादत का सम्मान और विरासत
कैप्टन अनुज नैय्यर को उनके अतुलनीय साहस, दृढ़ नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह ऐसे समय में आया है जब देश कारगिल विजय की रजत जयंती मना रहा है और शहीदों की स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प दोहरा रहा है। गौरतलब है कि 28 अगस्त 1975 को जन्मे इस वीर ने अपनी जयंती से ठीक पहले — 7 जुलाई 1999 को — देश के लिए जीवन का सर्वोच्च मूल्य चुकाया। उनका जीवन आज भी भारतीय युवाओं के लिए साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।