अहमदाबाद स्कूल में मलाला की किताब पर विवाद: स्वामी दर्शन भारती बोले — 'भारत में मलाला का कोई स्थान नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
अहमदाबाद के एक स्कूल में मलाला यूसुफजई की किताब पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने पर देशभर में विवाद छिड़ गया है। देवभूमि रक्षा अभियान के संस्थापक एवं प्रमुख स्वामी दर्शन भारती ने 28 अगस्त को इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि धार्मिक और राष्ट्रीय आधार पर भारत में मलाला का कोई स्थान नहीं है। इस विवाद पर उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन शादाब शम्स और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं।
स्वामी दर्शन भारती का विरोध
स्वामी दर्शन भारती ने मलाला यूसुफजई को 'धर्म विरोधी' करार देते हुए कहा कि एक पाकिस्तानी मूल की लड़की की किताब को भारत के बच्चों के सामने प्रस्तुत करना निंदनीय है। उन्होंने सवाल उठाया कि मलाला को उनके अपने देश पाकिस्तान की किताबों और पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया, 'मैं मलाला नाम की लड़की का विरोध बिल्कुल नहीं करूंगा, लेकिन मैं निश्चित रूप से चाहूंगा कि हमारे देश की किताबों में मलाला का नाम कहीं न आए, क्योंकि यह हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत नुकसानदायक होगा।' स्वामी भारती ने यह भी आरोप लगाया कि मलाला के नाम पर भविष्य में कोई साजिश रची जा सकती है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे सनातन और हिंदू राष्ट्र के लिए काम कर रहे हैं और 'हिंदू राष्ट्र' उनकी राह देख रहा है।
शादाब शम्स की प्रतिक्रिया
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन शादाब शम्स ने कहा कि जो भी भारत-विरोधी है, वे उसके खिलाफ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा, 'अहमदाबाद में मलाला यूसुफजई की किताब को लेकर जिस तरह विवाद और विरोध हो रहा है, कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं तो कुछ विरोध।' उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो भारत-विरोधी होता है, कांग्रेस उसके समर्थन में खड़ी नजर आती है।
शम्स ने यह भी कहा कि भारत में महात्मा गांधी, भीमराव अंबेडकर और भगत सिंह को पढ़ाया जाता है, और यदि मलाला की किताब पढ़ाई भी जाती है तो उसे संविधान और राष्ट्रवाद की कसौटी पर परखा जाएगा।
मौलाना फिरंगी महली का रुख
इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इस विवाद को 'अफसोसनाक' बताया। उन्होंने कहा कि स्कूल में कौन-सी किताब पढ़ाई जाए, यह मुख्यतः स्कूल प्रशासन का अधिकार है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल के शैक्षणिक कार्यों में किसी बाहरी संगठन को गलत तरीके से हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मलाला को संयुक्त राष्ट्र ने भी पुरस्कृत किया है, जो उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान को रेखांकित करता है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह ऐसे समय में आया है जब देश में पाठ्यक्रम और शैक्षणिक सामग्री को लेकर राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान की बहस तेज हो रही है। गौरतलब है कि मलाला यूसुफजई पाकिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए आवाज उठाने के कारण वैश्विक स्तर पर जानी जाती हैं और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिल चुका है। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि भारत के स्कूली पाठ्यक्रम में विदेशी हस्तियों को शामिल करने से पहले राष्ट्रीय हित और मूल्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अहमदाबाद के संबंधित स्कूल या गुजरात राज्य शिक्षा विभाग इस विवाद पर क्या रुख अपनाएगा। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाओं के बाद यह मामला राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है। आने वाले दिनों में इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है।