कारगिल के शहीद: मेजर मनोज तलवार और मेजर विवेक गुप्ता ने 13 जून 1999 को दिया सर्वोच्च बलिदान
सारांश
मुख्य बातें
मेजर मनोज तलवार (3/9 महार रेजिमेंट) और मेजर विवेक गुप्ता (2 राजपूताना राइफल्स) ने 13 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। ऑपरेशन विजय के तहत लड़े गए इस संघर्ष में दोनों अधिकारियों ने पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को पीछे खदेड़ते हुए रणनीतिक चोटियों पर तिरंगा फहराया। उनकी शहादत भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज है।
मेजर मनोज तलवार: मेरठ का वह लाल जो यमराज बन गया
29 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे मेजर मनोज तलवार का बचपन कानपुर में बीता। उनके पिता कैप्टन (सेवानिवृत्त) पी.एल. तलवार भारतीय सेना में तैनात थे, जिसके कारण सैन्य जीवन के प्रति रुझान उनमें बचपन से ही पनपने लगा था।
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) से प्रशिक्षण प्राप्त कर मनोज तलवार ने 1992 में तीसरी महार रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया। सेवाकाल के दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपनी क्षमता सिद्ध की।
टुरटुक पहाड़ी पर तिरंगा
कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सैनिक लगातार गोलीबारी और तोपखाने से हमले कर रहे थे। मेजर तलवार के कुशल नेतृत्व में भारतीय सैन्य टुकड़ी ने दुश्मन को पीछे हटने पर विवश किया और टुरटुक पहाड़ी पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया।
13 जून 1999 को इस विजय के तुरंत बाद दुश्मन के तोपखाने के हमले में मेजर तलवार वीरगति को प्राप्त हुए। अपनी माँ से की गई आखिरी बातचीत में उन्होंने कहा था, 'मैं दुश्मन को सबक सिखाकर ही लौटूंगा।' मरणोपरांत उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
मेजर विवेक गुप्ता: तोलोलिंग की चोटी पर अमर पराक्रम
2 राजपूताना राइफल्स के मेजर विवेक गुप्ता को कमान अधिकारी की ओर से तोलोलिंग की पहाड़ियों से दुश्मन को खदेड़ने का आदेश मिला। 12 जून 1999 की रात को उनके नेतृत्व में टीम तोलोलिंग की चोटी की ओर रवाना हुई।
अदम्य साहस का परिचय देते हुए मेजर गुप्ता ने भीषण मुठभेड़ में हिस्सा लिया। दो गोलियाँ लगने के बावजूद उन्होंने तीन दुश्मन सैनिकों को ढेर किया, बंकर पर कब्जा जमाया और वहाँ तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद वे देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान हो गए।
उनके अदम्य पराक्रम के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया — जो भारत का दूसरा सर्वोच्च सैन्य सम्मान है।
वह खत जो देर से पहुँचा
मेजर विवेक गुप्ता ने अपने पिता को एक खत लिखा था — 'चिंता मत करो, पिताजी, मैं जल्द ही वापस आऊंगा।' यह खत उनके अंतिम संस्कार के दो दिन बाद, 17 जून 1999 को, उनके घर पहुँचा। यह पत्र आज भी उनकी निःस्वार्थ देशभक्ति और अदम्य भावना का जीवंत प्रमाण है।
शहादत की विरासत
कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) हर वर्ष इन वीरों की स्मृति को ताज़ा करता है। मेजर तलवार और मेजर गुप्ता की शहादत इस बात की याद दिलाती है कि ऑपरेशन विजय की सफलता के पीछे अनगिनत ऐसे अधिकारियों और जवानों का बलिदान था, जिन्होंने हिमालय की बर्फीली चोटियों पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनकी वीरगाथाएँ आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।