कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ: पूर्व सैनिकों ने सुनाई बलिदान और साहस की अनकही दास्तान
सारांश
मुख्य बातें
कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर चंडीगढ़ में 26 जुलाई 2026 को सेना के पूर्व सैनिकों ने अपनी सेवा के अनुभव, युद्ध के दौरान किए गए बलिदान और वर्दी पहनने के गर्व को साझा किया। 1999 के कारगिल युद्ध में 527 वीर सैनिकों की शहादत को नमन करते हुए देशभर में यह दिन श्रद्धा और संकल्प के साथ मनाया गया।
पूर्व सैनिकों की आपबीती
सेना की पूर्व अधिकारी ज्योति शर्मा ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान मिली गंभीर चोटों का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि गश्त के दौरान आतंकवादियों की गोलीबारी में उनके दोनों पैरों में गुलियाँ लगीं, जिसके बाद 14-15 सर्जरी करानी पड़ीं।
शर्मा ने कहा, 'भगवान की कृपा से मैं बच गई और अब अपने परिवार के साथ हूँ। मुझे गर्व है कि मुझे देश की सेवा करने का मौका मिला।' कारगिल विजय दिवस के अवसर पर उन्हें पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और पंजाब एंड सिंध बैंक की ओर से स्कूटर प्रदान किया गया, जिसके लिए उन्होंने हृदय से आभार व्यक्त किया।
सेना के मूल मूल्य
सेना के पूर्व मेजर वी.वी. नारायणन ने भारतीय सेना की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि 'सेना में हम मानते हैं कि देश की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण सर्वोपरि है, और सैनिकों की सुरक्षा व सम्मान उसके बाद।' यह वक्तव्य उस अटूट अनुशासन और समर्पण को दर्शाता है जो भारतीय सेना की पहचान है।
पूर्व कर्नल उदय कुमार ने कहा कि कारगिल विजय दिवस उन वीरों की बहादुरी और बलिदान को सम्मान देने का दिन है जिन्होंने 1999 में भारत को निर्णायक जीत दिलाई। उन्होंने स्मरण कराया कि 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल सेक्टर की रणनीतिक ऊँचाइयों पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने उन्हें सफलतापूर्वक खदेड़ दिया।
ऑपरेशन विजय: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मई से जुलाई 1999 के बीच लड़ी गई कारगिल की यह लड़ाई लद्दाख के कारगिल, द्रास, बटालिक, मुश्कोह और काकसर के पहाड़ी इलाकों में 5,000 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर लड़ी गई। यह दुनिया के सबसे कठिन युद्ध-क्षेत्रों में से एक था।
कड़ाके की ठंड, दुर्गम रास्तों और रणनीतिक चोटियों पर दुश्मन की मज़बूत स्थिति के बावजूद भारतीय सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) को पार किए बिना घुसपैठियों को सफलतापूर्वक बाहर खदेड़ा। इस संयम और पेशेवर क्षमता के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना मिली।
आम जनता और राष्ट्र पर असर
ऑपरेशन विजय में 527 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। यह जीत न केवल भारत की सैन्य ताकत का प्रतीक बनी, बल्कि इसने देश की रक्षा तैयारियों, रणनीतिक योजना और राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे को एक नई दिशा भी दी। गौरतलब है कि यह युद्ध परमाणु-सक्षम दो देशों के बीच हुई एक दुर्लभ पारंपरिक सैन्य मुठभेड़ थी, जिसे भारत ने कूटनीतिक और सैन्य — दोनों मोर्चों पर जीता।
हर वर्ष 26 जुलाई को मनाया जाने वाला यह दिन आने वाली पीढ़ियों को उन वीरों की कुर्बानी की याद दिलाता रहेगा जिन्होंने देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।