मालेगांव ब्लास्ट केस: चार आरोपियों की रिहाई पर ओवैसी का बड़ा हमला, एनआईए जांच को बताया 'लचर'

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मालेगांव ब्लास्ट केस: चार आरोपियों की रिहाई पर ओवैसी का बड़ा हमला, एनआईए जांच को बताया 'लचर'

सारांश

मालेगांव 2006 बम धमाका केस में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 'अभिनव भारत' से जुड़े 4 आरोपियों को बरी किया। एआईएमआईएम सांसद ओवैसी ने एनआईए की लचर जांच और पीड़ितों से विश्वासघात का आरोप लगाया। 31 की मौत, 312 घायल — 18 साल बाद भी न्याय नहीं।

Key Takeaways

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मालेगांव बम धमाका केस में अभिनव भारत से जुड़े 4 आरोपियों को बरी किया।
  • 2006 के धमाकों में 31 लोगों की मौत हुई थी और 312 लोग घायल हुए थे।
  • एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एनआईए की जांच को लचर बताते हुए कड़ी आलोचना की।
  • इस मामले में पहले 9 मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें 2016 में बरी किया गया।
  • एनआईए की पूर्व वकील रोहिणी सालियन ने रिकॉर्ड पर कहा था कि उन्हें आरोपियों के प्रति नरम रुख अपनाने को कहा गया था।
  • ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या एनआईए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी।

नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र के मालेगांव में 2006 में हुए बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा चार आरोपियों को बरी किए जाने के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

मालेगांव धमाका: क्या था पूरा मामला?

8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में हुए इन बम धमाकों में 31 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी और 312 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह धमाका शुक्रवार की नमाज के बाद हुआ था, जिसके कारण मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से प्रभावित हुआ था।

ओवैसी ने आरोप लगाया कि यह हमला जानबूझकर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर अंजाम दिया गया था। जांच में सामने आया कि बरी किए गए चारों आरोपी कथित तौर पर 'अभिनव भारत' नामक संगठन से जुड़े थे।

एनआईए की जांच पर ओवैसी के तीखे सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक विस्तृत पोस्ट के जरिए ओवैसी ने लिखा कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में एनआईए की ढीली और लचर जांच की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सबसे पहले नौ मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें अंततः 2016 में बरी कर दिया गया।

ओवैसी ने यह भी पूछा कि क्या एनआईए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी। उनका मानना है कि ऐसा होने की संभावना बेहद कम है और यह सभी पीड़ितों तथा उनके परिजनों के साथ एक तरह का विश्वासघात है।

2008 के धमाका केस से तुलना और रोहिणी सालियन का बयान

ओवैसी ने इस मामले की तुलना 2008 के मालेगांव बम धमाका केस से करते हुए कहा कि दोनों मामलों में जांच की कहानी एक जैसी रही है। उन्होंने याद दिलाया कि एनआईए की तत्कालीन सरकारी वकील रोहिणी सालियन ने रिकॉर्ड पर यह बयान दिया था कि उन्हें एनआईए की ओर से आरोपियों के प्रति नरम रुख अपनाने का निर्देश दिया गया था।

यह बयान उस समय बेहद विवादास्पद रहा था और इसने जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए थे।

न्याय की प्रतीक्षा और पीड़ितों का दर्द

ओवैसी ने अपनी पोस्ट में भावुक होते हुए लिखा कि भारत में एक मुसलमान होने का अर्थ है — बस न्याय का इंतजार करते रहना। उनका कहना है कि यह एक और ऐसा आतंकी हमला बनकर रह जाएगा, जिसमें दोषियों को कभी सजा नहीं मिलेगी।

गौरतलब है कि इस मामले में 18 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवार न्याय की राह देख रहे हैं। पहले निर्दोष मुसलमानों की गिरफ्तारी, फिर उनकी रिहाई, और अब असली आरोपियों का बरी होना — यह पूरी कहानी भारतीय जांच तंत्र की विफलता को उजागर करती है।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एनआईए बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है या नहीं। पीड़ित परिवारों और मानवाधिकार संगठनों की मांग है कि सरकार इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करे और न्याय सुनिश्चित करे।

Point of View

बल्कि भारत की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर एक और प्रश्नचिह्न है। पहले निर्दोष मुसलमानों को वर्षों जेल में रखा गया, फिर असली आरोपी भी 'लचर जांच' के कारण बरी हो गए — यह दोहरी विफलता है। रोहिणी सालियन के उस बयान को भुलाया नहीं जा सकता जिसमें उन्होंने एनआईए पर दबाव का आरोप लगाया था। सवाल यह नहीं कि ओवैसी ने क्या कहा — सवाल यह है कि 31 मृतकों के परिवार 18 साल बाद भी न्याय के लिए क्यों भटक रहे हैं।
NationPress
24/04/2026

Frequently Asked Questions

मालेगांव 2006 बम धमाका केस में क्या हुआ था?
8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में बम धमाके हुए थे जिनमें 31 लोगों की मौत हुई और 312 लोग घायल हुए थे। यह धमाका जुमे की नमाज के बाद हुआ था और मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय इससे प्रभावित हुआ था।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने किन आरोपियों को बरी किया?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मालेगांव धमाका केस में कथित तौर पर 'अभिनव भारत' संगठन से जुड़े चार आरोपियों को बरी किया। कोर्ट ने अपने आदेश में एनआईए की जांच को लचर बताते हुए कड़ी आलोचना की।
ओवैसी ने एनआईए पर क्या आरोप लगाए?
ओवैसी ने कहा कि एनआईए ने पहले नौ निर्दोष मुसलमानों को गिरफ्तार किया जो 2016 में बरी हुए, और अब असली आरोपी भी लचर जांच के कारण छूट गए। उन्होंने एनआईए की पूर्व वकील रोहिणी सालियन के उस बयान का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने आरोपियों के प्रति नरम रुख अपनाने के दबाव की बात कही थी।
क्या एनआईए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी?
ओवैसी ने संदेह जताया है कि एनआईए सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी और इसे पीड़ितों के साथ विश्वासघात बताया। अभी तक एनआईए की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
रोहिणी सालियन का मालेगांव केस से क्या संबंध है?
रोहिणी सालियन एनआईए की पूर्व सरकारी वकील थीं जिन्होंने रिकॉर्ड पर बयान दिया था कि एनआईए ने उन्हें 2008 के मालेगांव धमाका केस में आरोपियों के प्रति नरम रुख अपनाने को कहा था। यह बयान जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है।
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