मनरेगा में 10 साल में 1% परिवारों को भी नहीं मिला 100 दिन का रोज़गार: MP के पूर्व मंत्री दीपक जोशी का PM को पत्र
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य मंत्री दीपक जोशी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मनरेगा योजना की ज़मीनी हकीकत उजागर की है। आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में कुल जॉब कार्डधारी परिवारों में से 1 प्रतिशत को भी पूरे 100 दिन का रोज़गार नहीं मिल सका। यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार मनरेगा को नए नाम 'विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका मिशन' (वीबी-जीआरएएम जी) के तहत 125 दिन के रोज़गार के वादे के साथ पुनः लागू कर रही है।
मुख्य घटनाक्रम
जोशी ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि मनरेगा — जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार गारंटी योजना माना जाता है — में वर्तमान में 15 करोड़ जॉब कार्ड के साथ 26 करोड़ मज़दूर पंजीकृत हैं। योजना में प्रत्येक जॉब कार्डधारी परिवार को वर्ष में 100 दिन रोज़गार देने का कानूनी प्रावधान है। लेकिन राज्य विधानसभा में पेश आंकड़ों के हवाले से जोशी ने कहा कि मध्य प्रदेश में यह लक्ष्य एक दशक में एक बार भी पूरा नहीं हुआ।
वन अधिकार क्षेत्र और सांसद ग्रामों की स्थिति
पूर्व मंत्री ने बताया कि वन अधिकार क्षेत्र के पट्टाधारकों को मनरेगा के तहत 150 दिन रोज़गार देने का विशेष प्रावधान था, किंतु जानकारी जुटाने पर स्थिति 'शून्य' निकली। इसी प्रकार सांसद आदर्श ग्रामों में भी मनरेगा रोज़गार की स्थिति निराशाजनक बताई गई है। गौरतलब है कि ये वे गाँव हैं जिन्हें सांसदों ने आदर्श ग्राम के रूप में गोद लिया है।
आजीविका मिशन में भ्रष्टाचार के आरोप
जोशी ने पत्र में यह भी उठाया कि नई योजना के नाम में 'आजीविका मिशन' जोड़ा गया है, जबकि प्रदेश में आजीविका मिशन पहले से कथित भ्रष्टाचार के घेरे में है। उन्होंने पोषण आहार घोटाले, गणवेश घोटाले, मिशन भर्ती घोटाले और ग्रामीण गरीब, दलित व आदिवासी महिलाओं के समूहों — ग्राम संगठनों और फेडरेशनों — के खातों से लाखों-करोड़ों रुपये निकाले जाने के आरोपों का उल्लेख किया। उनके अनुसार जाँच के नाम पर केवल लीपापोती हो रही है।
PM से पारदर्शिता की माँग
पूर्व मंत्री ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि नई योजना 'वीबी-जीआरएएम जी' में भगवान राम का नाम जुड़ा होने के कारण इसे पारदर्शी तरीके से संचालित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक गरीब जॉब कार्डधारी ग्रामीण मज़दूर परिवारों को वास्तव में 125 दिन का रोज़गार मिल सके। यह पत्र ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब ग्रामीण रोज़गार की माँग और आपूर्ति के बीच की खाई को लेकर राष्ट्रीय बहस तेज़ हो रही है।