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मिजोरम में नशीली दवाओं से हर साल 50 मौतें, 1984 से अब तक 2,051 जानें गईं: अधिकारी

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मिजोरम में नशीली दवाओं से हर साल 50 मौतें, 1984 से अब तक 2,051 जानें गईं: अधिकारी

सारांश

मिजोरम में 1984 से अब तक नशे से 2,051 जानें जा चुकी हैं — हर साल औसतन 50। स्वर्ण त्रिकोण से सटी 910 किलोमीटर की खुली सीमा और 10-14 साल के बच्चों तक पहुँचती नशे की लत इस संकट को और खतरनाक बना रही है।

मुख्य बातें

मिजोरम में नशीली दवाओं से प्रतिवर्ष औसतन 50 मौतें ; 1984 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच कुल 2,051 मौतें दर्ज।
कुल मौतों में 1,799 पुरुष और 252 महिलाएँ शामिल — आँकड़े END विभाग के संयुक्त आयुक्त पीटर जोहमिंगथांगा ने साझा किए।
2022 के सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में 10-14 वर्ष आयु के स्कूली बच्चे गांजे का सेवन कर रहे हैं।
मिजोरम और मणिपुर के 11 जिले म्यांमार के साथ 910 किलोमीटर की बिना बाड़ वाली सीमा साझा करते हैं।
स्वर्ण त्रिकोण (म्यांमार, लाओस, थाईलैंड) की निकटता नशा-तस्करी को बढ़ावा देती है।
मंत्री लालनघिंगलोवा हमार और NEC सचिव सतिंदर कुमार भल्ला ने छात्रों से नशामुक्त जीवन की अपील की।

मिजोरम में नशीली दवाओं से संबंधित कारणों से प्रतिवर्ष औसतन लगभग 50 लोगों की मृत्यु हो रही है। मिजोरम आबकारी एवं मादक पदार्थ विभाग (END) के संयुक्त आयुक्त पीटर जोहमिंगथांगा ने 16 अक्टूबर 2026 को आइजोल में आयोजित एक जागरूकता कार्यक्रम में बताया कि 1984 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच राज्य में नशे से जुड़े कारणों से कुल 2,051 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। यह आँकड़े राज्य में मादक पदार्थों की गहरी पैठ की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।

मौतों का आँकड़ा और लिंग-वार विवरण

जोहमिंगथांगा ने बताया कि 2,051 कुल मौतों में से 1,799 पुरुष और 252 महिलाएँ शामिल हैं। यह अनुपात बताता है कि नशे की चपेट में पुरुष अधिक हैं, लेकिन महिलाओं की संख्या भी चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। यह कार्यक्रम मिजोरम भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (MBOCWWB) के सहयोग से आयोजित किया गया था।

10-14 वर्ष के बच्चे भी नशे की गिरफ्त में

जोहमिंगथांगा ने 2022 के 'ड्रग्स एंड चिल्ड्रन इन मिजोरम' सर्वेक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक और गंभीर पहलू उजागर किया — राज्य में 10 से 14 वर्ष आयु वर्ग के माध्यमिक विद्यालय के छात्र पहले ही गांजे का सेवन शुरू कर चुके हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में किशोरों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति एक राष्ट्रीय चिंता बनी हुई है। अधिकारी ने छात्रों को व्यक्तिगत स्तर पर नशे से दूर रहने और नशामुक्त समाज निर्माण में भागीदारी का आह्वान किया।

सरकार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

मिजोरम उत्पाद शुल्क एवं मादक पदार्थ विभाग के मंत्री लालनघिंगलोवा हमार ने कहा कि मादक पदार्थों के व्यापक प्रसार का प्रमुख कारण उनकी उच्च मांग और खपत है। उन्होंने यह भी बताया कि हालाँकि असम पहले तस्करी का प्रमुख मार्ग रहा है, परंतु वहाँ के लोग आमतौर पर नशे की ओर कम प्रवृत्त रहे हैं। मंत्री ने विशेष रूप से सरकारी चम्फाई कॉलेज के छात्रों से नशे से पूरी तरह दूर रहने की अपील की।

पूर्वोत्तर परिषद (NEC) के सचिव सतिंदर कुमार भल्ला ने मिजो परंपरा 'तलवमंगैहना' — यानी स्वयंसेवा और निस्वार्थ सामुदायिक सेवा — की सराहना की। अपने गृह राज्य पंजाब में नशे की गंभीर चुनौतियों का उल्लेख करते हुए भल्ला ने कहा कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए युवाओं को नशे से मुक्त होकर अपनी ऊर्जा राष्ट्र-निर्माण में लगानी होगी।

स्वर्ण त्रिकोण और सीमा की चुनौती

मिजोरम की भौगोलिक स्थिति इस संकट को और जटिल बनाती है। राज्य के 6 जिले और मणिपुर के 5 जिले मिलकर म्यांमार के साथ 910 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं, जिसका अधिकांश हिस्सा बिना बाड़ के है। गौरतलब है कि मिजोरम और मणिपुर विश्व के प्रमुख अवैध नशीले पदार्थों के उत्पादन क्षेत्र 'स्वर्ण त्रिकोण' के निकट हैं — जो म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के कुछ हिस्सों से मिलकर बना है।

इस सीमा के ज़रिये अत्यधिक नशीली मेथम्फेटामाइन टैबलेट, हेरोइन, विदेशी सिगरेट, उर्वरक और अन्य प्रतिबंधित वस्तुओं की तस्करी होती है। खुली और लंबी सीमा सुरक्षा बलों तथा नशा-निरोधक एजेंसियों के लिए लगातार चुनौती बनी हुई है।

आगे क्या होगा

राज्य सरकार और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की संयुक्त पहलों के बावजूद नशे की समस्या पर काबू पाना कठिन बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक म्यांमार सीमा पर पुख्ता निगरानी तंत्र और किशोरों के लिए व्यापक जागरूकता कार्यक्रम एक साथ नहीं चलाए जाते, तब तक यह संकट और गहरा सकता है। सरकारी स्तर पर स्कूल-आधारित रोकथाम कार्यक्रमों को और विस्तार देने की ज़रूरत महसूस की जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक नीतिगत विफलता का दस्तावेज़ है — 42 वर्षों में 2,051 मौतें और समस्या अभी भी बेकाबू है। असली चिंता यह है कि 10-14 साल के बच्चे नशे की चपेट में आ रहे हैं, यानी अगली पीढ़ी खतरे में है। 910 किलोमीटर की खुली, बिना बाड़ की सीमा को देखते हुए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं — सीमा प्रबंधन और आर्थिक विकल्पों के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी। पंजाब जैसे अनुभव बताते हैं कि जब तक मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों पर एक साथ काम नहीं होता, केवल प्रवर्तन से नशे की जड़ें नहीं कटतीं।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मिजोरम में नशीली दवाओं से कितनी मौतें हुई हैं?
1984 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच मिजोरम में नशीली दवाओं से संबंधित कारणों से कुल 2,051 मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें 1,799 पुरुष और 252 महिलाएँ शामिल हैं। प्रतिवर्ष औसतन लगभग 50 मौतें होती हैं।
मिजोरम में नशे की समस्या इतनी गंभीर क्यों है?
मिजोरम और मणिपुर की म्यांमार के साथ 910 किलोमीटर की खुली, बिना बाड़ की अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो 'स्वर्ण त्रिकोण' के निकट है — यह क्षेत्र अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। इससे मेथम्फेटामाइन टैबलेट और हेरोइन जैसी नशीली वस्तुओं की तस्करी आसान हो जाती है।
मिजोरम में किस उम्र के बच्चे नशे की चपेट में आ रहे हैं?
2022 की 'ड्रग्स एंड चिल्ड्रन इन मिजोरम' सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 10 से 14 वर्ष आयु वर्ग के माध्यमिक विद्यालय के छात्र पहले ही गांजे का सेवन शुरू कर चुके हैं। यह आँकड़ा किशोरों में नशे की शुरुआती उम्र पर चिंताजनक प्रकाश डालता है।
मिजोरम सरकार नशे की समस्या से निपटने के लिए क्या कर रही है?
राज्य सरकार और विभिन्न NGO मिलकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं। END विभाग के अधिकारी स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मंत्री लालनघिंगलोवा हमार ने विशेष रूप से युवाओं से नशामुक्त जीवन जीने की अपील की है।
स्वर्ण त्रिकोण क्या है और इसका मिजोरम से क्या संबंध है?
स्वर्ण त्रिकोण म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के कुछ हिस्सों से मिलकर बना क्षेत्र है, जो दशकों से अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन और तस्करी का केंद्र रहा है। मिजोरम इस क्षेत्र के निकट होने और म्यांमार के साथ लंबी खुली सीमा साझा करने के कारण नशा-तस्करी का प्रमुख गलियारा बन गया है।
राष्ट्र प्रेस
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