मोदी के जन्मदिन पर जानें: 23 दिनों में सिर्फ नींबू पानी पर लिखी थी 'संघर्ष मा गुजरात'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनका जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था, ने 1975 77 की इमरजेंसी के दौरान एक युवा आरएसएस प्रचारक के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इमरजेंसी समाप्त होते ही उन्होंने मात्र 23 दिनों में — बिना किसी संदर्भ पुस्तक के, केवल स्मृति के आधार पर और सिर्फ नींबू पानी पर गुज़ारा करते हुए — 'संघर्ष मा गुजरात' नामक किताब पूरी की। यह पुस्तक उन अनगिनत आम भारतीयों के प्रतिरोध की दस्तावेज़ थी, जिनके त्याग के इतिहास में खो जाने का खतरा था।
इमरजेंसी में मोदी की भूमिका
25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने नागरिकों की आज़ादी छीन ली, प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी और विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया। उस समय मात्र 24 वर्ष के नरेंद्र मोदी गुजरात में आरएसएस प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे। गिरफ़्तारी से बचते हुए उन्होंने भूमिगत रहकर काम किया — संविधान को सार्वजनिक रूप से पढ़ने के कार्यक्रम आयोजित किए और पूरे गुजरात में सामुदायिक तथा धार्मिक नेटवर्क के ज़रिए इमरजेंसी विरोधी साहित्य वितरित करने में सहयोग किया।
21 महीनों तक, जब भय का वातावरण बना दिया गया था, युवा मोदी उस आंदोलन का हिस्सा बने रहे जिसने लोकतांत्रिक प्रतिरोध की भावना को जीवित रखा। गौरतलब है कि यह वही दौर था जब हज़ारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के जेलों में बंद कर दिया गया था।
'संघर्ष मा गुजरात': किताब की पृष्ठभूमि
1977 में इमरजेंसी की समाप्ति के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने यह किताब लिखनी शुरू की। उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने इस पूरी रचना प्रक्रिया में न किसी संदर्भ पुस्तक का सहारा लिया और न ही किसी के साथ परामर्श किया — सारा विवरण उनकी व्यक्तिगत स्मृति पर आधारित था। लिखने के दौरान उन्होंने खाना पीना लगभग छोड़ दिया था और सिर्फ नींबू पानी पर गुज़ारा करते हुए 23 दिनों में पांडुलिपि पूरी की।
यह पुस्तक उन साधारण गुजरातियों की असाधारण कहानियों का संकलन थी, जिन्होंने इमरजेंसी के खिलाफ़ चुपचाप लेकिन दृढ़ता से विरोध किया था। मोदी को आशंका थी कि सरकारी इतिहास लेखन में ये कथाएँ कभी दर्ज नहीं होंगी।
विमोचन और बाबूभाई जशभाई पटेल का संदेश
किताब का पहला संस्करण गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल ने जारी किया था। विमोचन समारोह में उन्होंने पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था, "संघर्ष एक ऐसा विषय है जिस पर कोई भी बड़ी बड़ी बातें लिख सकता है, लेकिन छोटी छोटी बातों को लिखने के लिए शोध की आवश्यकता होती है। इस संघर्ष में गुजरात के आम लोगों का योगदान कभी भी आधिकारिक इतिहास में दर्ज नहीं होगा। उनके लिए, इसे लिखा जाना आवश्यक था।"
पटेल ने इमरजेंसी की व्यापक प्रवृत्ति पर भी टिप्पणी की: "तीस वर्षों में हम धीरे धीरे, इंच इंच करके, तानाशाही की ओर बढ़ते चले गए। शासन करने वाले यह भूल गए कि वे गरीबों के उत्थान की बात करते थे, लेकिन वास्तव में उन्होंने केवल अपना ही उत्थान किया।"
आम जनता पर इमरजेंसी का असर और इस किताब का महत्व
यह ऐसे समय में आया जब इमरजेंसी की स्मृतियाँ अभी भी ताज़ा थीं और सत्ता पक्ष के लिए इन घटनाओं को न्यूनतम करने की प्रवृत्ति थी। 'संघर्ष मा गुजरात' ने जन प्रतिरोध को दस्तावेज़ी स्वरूप दिया — वे चेहरे और घटनाएँ जो किसी सरकारी रिकॉर्ड में नहीं थीं। यह भारत के लोकतंत्र की उस अग्निपरीक्षा का साक्ष्य है जिसने देश को गहरे स्तर पर बदला।
आज, जब मोदी अपना 76वाँ जन्मदिन मना रहे हैं, यह किताब और उसके पीछे की साधना उनके राजनीतिक जीवन की उस नींव की याद दिलाती है जो किसी सत्ता पद से नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष से बनी थी।