16 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

'संघर्ष मा गुजरात': मोदी ने 23 दिनों में नींबू पानी पर लिखी इमरजेंसी की गाथा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
'संघर्ष मा गुजरात': मोदी ने 23 दिनों में नींबू पानी पर लिखी इमरजेंसी की गाथा

सारांश

1977 में इमरजेंसी खत्म होते ही युवा नरेंद्र मोदी ने सिर्फ नींबू पानी के सहारे 23 दिनों में 'संघर्ष मा गुजरात' लिख डाली — बिना किसी संदर्भ पुस्तक के, केवल स्मृति के बल पर। यह उन गुमनाम गुजरातियों की दास्तान थी जिन्होंने 21 महीने भूमिगत रहकर लोकतंत्र की लौ जलाए रखी।

मुख्य बातें

नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था।
इमरजेंसी ( जून 1975 – 1977 ) के दौरान 24 वर्षीय मोदी RSS प्रचारक के रूप में भूमिगत रहकर विरोध में सक्रिय रहे।
इमरजेंसी समाप्त होने के बाद उन्होंने केवल 23 दिनों में, बिना संदर्भ पुस्तकों के और केवल नींबू पानी पर रहते हुए, 'संघर्ष मा गुजरात' पुस्तक लिखी।
पुस्तक का विमोचन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल ने किया।
पुस्तक इमरजेंसी के दौरान गुजरात में आम नागरिकों के गुमनाम प्रतिरोध को दर्ज करती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्म हुआ था। इमरजेंसी के दौर में महज़ 24 वर्ष की आयु में वे एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रचारक के रूप में सक्रिय प्रतिरोध का हिस्सा बने। इमरजेंसी समाप्त होते ही उन्होंने केवल 23 दिनों में, बिना किसी संदर्भ पुस्तक के और केवल नींबू पानी के सहारे, 'संघर्ष मा गुजरात' नामक पुस्तक लिखकर उस दौर के गुमनाम नायकों की कहानी दर्ज की।

इमरजेंसी में मोदी की भूमिका

25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देशभर में आपातकाल लागू किया। नागरिक स्वतंत्रताएँ छीन ली गईं, प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गई और विपक्षी नेताओं को सुबह होने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। इस दमनकारी माहौल में युवा नरेंद्र मोदी ने गिरफ्तारी से बचते हुए भूमिगत रहकर काम किया।

उन्होंने गुजरात भर में सामुदायिक और धार्मिक नेटवर्क के ज़रिए इमरजेंसी-विरोधी साहित्य वितरित करने में सहयोग किया। संविधान को सार्वजनिक रूप से पढ़े जाने के कार्यक्रम आयोजित किए — यह एक प्रतीकात्मक लेकिन साहसिक कदम था। 21 महीनों तक भय के उस वातावरण में उन्होंने लोकतांत्रिक विरोध की लौ को जीवित रखा।

'संघर्ष मा गुजरात' — कैसे लिखी गई यह किताब

1977 में जब इमरजेंसी समाप्त हुई, तब नरेंद्र मोदी ने इस संघर्ष को लिखित रूप देने का निर्णय लिया। उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने यह पुस्तक केवल 23 दिनों में पूरी की — बिना किसी संदर्भ पुस्तक के, पूरी तरह अपनी स्मृति के आधार पर। लेखन के दौरान उन्होंने भोजन त्याग दिया और केवल नींबू पानी पर निर्भर रहे।

यह पुस्तक उन आम भारतीयों की कहानी थी जिन्होंने छिपकर इमरजेंसी का विरोध किया, लेकिन जिनके त्याग के इतिहास के पन्नों में खो जाने का खतरा था। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब सत्ता की ज़्यादतियों का कोई आधिकारिक लेखा-जोखा नहीं रखा जा रहा था।

पुस्तक विमोचन और तत्कालीन मुख्यमंत्री का संदेश

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल ने पुस्तक का पहला संस्करण जारी किया। विमोचन अवसर पर उन्होंने पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट करते हुए कहा, 'संघर्ष एक ऐसा विषय है जिस पर कोई भी बड़ी-बड़ी बातें लिख सकता है, लेकिन छोटी-छोटी बातों को लिखने के लिए शोध की आवश्यकता होती है। इस संघर्ष में गुजरात के आम लोगों का योगदान कभी भी आधिकारिक इतिहास में दर्ज नहीं होगा। उनके लिए, इसे लिखा जाना आवश्यक था।'

उन्होंने आगे कहा, 'तीस वर्षों में हम धीरे-धीरे, इंच-इंच करके, तानाशाही की ओर बढ़ते चले गए। शासन करने वाले यह भूल गए कि वे गरीबों के उत्थान की बात करते थे, लेकिन वास्तव में उन्होंने केवल अपना ही उत्थान किया।' यह वक्तव्य इमरजेंसी की विरासत पर एक तीखी टिप्पणी थी।

ऐतिहासिक महत्त्व और आज की प्रासंगिकता

यह ऐसे समय में आया है जब इमरजेंसी की पाँच दशक पुरानी विरासत पर बहस एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। 'संघर्ष मा गुजरात' न केवल एक व्यक्तिगत अनुभव का दस्तावेज़ है, बल्कि यह उन हज़ारों गुमनाम कार्यकर्ताओं की सामूहिक स्मृति भी है जिन्होंने बिना किसी पहचान के लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

मोदी की 17 सितंबर को मनाई जाने वाली जयंती के अवसर पर यह प्रसंग उनके राजनीतिक जीवन की उस बुनियाद की याद दिलाता है, जो किसी पद या सत्ता से नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष से निर्मित हुई थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

केवल स्मृति के आधार पर यह काम किया, इसे इतिहास-लेखन की दृष्टि से भी उल्लेखनीय बनाता है। हालाँकि, मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इसे मोदी की व्यक्तिगत तपस्या की कहानी तक सीमित कर देती है — जबकि पुस्तक का असली मूल्य उन हज़ारों गुमनाम चेहरों में है जिन्हें इसने दर्ज किया। बाबूभाई जशभाई पटेल के विमोचन भाषण में निहित यह स्वीकृति — कि आम लोगों का योगदान आधिकारिक इतिहास में नहीं आएगा — आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'संघर्ष मा गुजरात' किताब क्या है?
'संघर्ष मा गुजरात' 1977 में नरेंद्र मोदी द्वारा लिखी गई पुस्तक है, जो इमरजेंसी (1975-77) के दौरान गुजरात में आम नागरिकों के भूमिगत प्रतिरोध को दर्ज करती है। यह पुस्तक केवल 23 दिनों में, बिना किसी संदर्भ पुस्तक के और केवल नींबू पानी के सहारे लिखी गई थी।
मोदी ने इमरजेंसी के दौरान क्या भूमिका निभाई थी?
25 जून 1975 को इमरजेंसी लागू होने के बाद 24 वर्षीय नरेंद्र मोदी एक RSS प्रचारक के रूप में गुजरात में भूमिगत रहकर सक्रिय रहे। उन्होंने गिरफ्तारी से बचते हुए इमरजेंसी-विरोधी साहित्य वितरित किया, संविधान-पाठ कार्यक्रम आयोजित किए और सामुदायिक नेटवर्क के ज़रिए प्रतिरोध को जीवित रखा।
पुस्तक का विमोचन किसने किया था?
पुस्तक का पहला संस्करण गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल ने जारी किया था। विमोचन अवसर पर उन्होंने कहा था कि गुजरात के आम लोगों का योगदान कभी आधिकारिक इतिहास में दर्ज नहीं होगा, इसीलिए इसे लिखा जाना ज़रूरी था।
मोदी ने किताब लिखते समय केवल नींबू पानी क्यों पिया?
उपलब्ध विवरणों के अनुसार, मोदी ने 'संघर्ष मा गुजरात' लिखने के दौरान भोजन त्याग दिया था और केवल नींबू पानी पर निर्भर रहे। यह उनके उस संकल्प का प्रतीक माना जाता है कि इमरजेंसी के गुमनाम संघर्ष को जल्द-से-जल्द लिखित रूप दिया जाए, ताकि वह स्मृतियाँ धुंधली न पड़ जाएँ।
इमरजेंसी कब लागू हुई थी और कितने समय तक रही?
इमरजेंसी 25 जून 1975 की आधी रात को लागू की गई थी और 1977 तक, यानी लगभग 21 महीनों तक जारी रही। इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताएँ निलंबित कर दी गई थीं, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई थी और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया था।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 48 मिनट पहले
  2. 2 महीने पहले
  3. 4 महीने पहले
  4. 5 महीने पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले