इमरजेंसी संविधान हत्या का दौर था, लोकतंत्र को अंधेरे में धकेला गया : मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 25 जून 2025 को इमरजेंसी की 50वीं बरसी पर कहा कि 25 जून 1975 को लगाई गई आपातकाल भारत के संविधान की आत्मा को कुचलने और देश को 'तानाशाही के अंधेरे' में धकेलने का सुनियोजित प्रयास था। उन्होंने इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक करार दिया।
मुख्यमंत्री का बयान
मुख्यमंत्री पटेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, '25 जून 1975 को लगाई गई इमरजेंसी सत्ता पाने की कोशिश में भारत के संविधान की भावना को कुचलने और देश को तानाशाही के अंधेरे में धकेलने की एक कोशिश थी।' उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में लोकतंत्र के स्तंभों को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया और नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताएँ सीमित कर दी गईं।
संविधान हत्या दिवस का संदर्भ
पटेल ने बताया कि इस दिन को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाया जाता है ताकि युवा पीढ़ी लोकतांत्रिक मूल्यों को समझे और सत्ता के दुरुपयोग के उस अध्याय के प्रति जागरूक रहे। उनके अनुसार, यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि संविधान नागरिकों के अधिकारों और देश की प्रगति का सबसे मज़बूत सुरक्षा कवच है।
इमरजेंसी विरोधियों को श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री ने उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने 1975-77 के दौरान आपातकाल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने दमन और दबाव के सामने न झुकते हुए भारी कठिनाइयाँ सहीं और अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
इमरजेंसी का ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि इमरजेंसी की घोषणा 25 जून 1975 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत की थी। यह आपातकाल मार्च 1977 तक, यानी 21 महीनों तक लागू रहा। इस दौरान चुनाव स्थगित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई, नागरिक स्वतंत्रताएँ निलंबित की गईं और हज़ारों राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं तथा पत्रकारों को हिरासत में लिया गया।
आज भी प्रासंगिक है यह दौर
संवैधानिक और शैक्षिक संस्थानों ने इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक के रूप में बार-बार रेखांकित किया है। संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर होने वाली हर बहस में यह दौर आज भी एक अहम संदर्भ बिंदु बना हुआ है। यह बरसी एक बार फिर देश को यह सोचने पर विवश करती है कि संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों की रक्षा लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।