संविधान हत्या दिवस: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा — 1975 आपातकाल में संवैधानिक मूल्यों की हुई थी कठोर परीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने 25 जून 2026 को 'संविधान हत्या दिवस' के अवसर पर उन सभी साहसी नागरिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने 1975 के आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी आवाज़ बुलंद रखी। उन्होंने इस दिन को भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक बताया, जब नागरिक स्वतंत्रताएँ निलंबित कर दी गई थीं।
एक्स पर उपराष्ट्रपति का संदेश
राधाकृष्णन ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में लिखा, 'संविधान हत्या दिवस' पर, मैं उन सभी बहादुर लोगों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जो भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक — 1975 में घोषित आपातकाल — के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अडिग रहे और हमारे संविधान की भावना को सुरक्षित रखा।'
उन्होंने आगे कहा, 'आपातकाल उस समय की एक गंभीर याद दिलाता है, जब संवैधानिक मूल्यों की कड़ी परीक्षा हुई थी। नागरिक स्वतंत्रताएँ निलंबित कर दी गई थीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई थी और हमारे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए महत्वपूर्ण संस्थाओं को कमज़ोर किया गया था।'
संविधान के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता का आह्वान
उपराष्ट्रपति ने देशवासियों से आग्रह किया कि वे संविधान को अपना मार्गदर्शक मानते हुए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को दोहराएँ। उन्होंने कहा, 'आइए हम इन मूल्यों पर आधारित भारत का निर्माण जारी रखें।'
भाजपा का देशव्यापी आयोजन
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बिहार, हरियाणा और देश के कई अन्य हिस्सों में 'संविधान हत्या दिवस' मनाया। पार्टी ने कई कार्यक्रमों की योजना बनाई, जिनमें लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर आपातकाल के प्रभाव को उजागर किया गया। गौरतलब है कि यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब भारत 1975 के आपातकाल की 51वीं बरसी मना रहा है।
1975 का आपातकाल: एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की थी, जो 21 मार्च 1977 तक — यानी 21 महीने — लागू रहा। इस दौरान संविधान के तहत प्रमुख लोकतांत्रिक मानदंडों और नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया गया था। इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे विवादास्पद और सत्तावादी घटनाओं में से एक माना जाता है।
आगे का संदेश
यह दिवस हर वर्ष एक अनुस्मारक के रूप में मनाया जाता है — इस संकल्प के साथ कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा किसी भी परिस्थिति में सर्वोच्च प्राथमिकता रहे। उपराष्ट्रपति का यह संदेश संविधान की आत्मा को जीवित रखने की सामूहिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है।