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आपातकाल की 50वीं बरसी: किशन रेड्डी ने कहा — 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय

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आपातकाल की 50वीं बरसी: किशन रेड्डी ने कहा — 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय

सारांश

25 जून 1975 के आपातकाल की बरसी पर BJP ने 'संविधान हत्या दिवस' मनाया। केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताया। जबरन नसबंदी, प्रेस सेंसरशिप और न्यायपालिका पर दबाव की ऐतिहासिक घटनाएँ एक बार फिर चर्चा में आईं।

मुख्य बातें

किशन रेड्डी ने 25 जून 1975 के आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला धब्बा बताया।
BJP इस दिन को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मना रही है।
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बंदी संजय कुमार ने आपातकाल को 'अघोषित तानाशाही' करार दिया और कांग्रेस पर संविधान कमज़ोर करने का आरोप लगाया।
तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष एन.
रामचंद्र राव ने जबरन नसबंदी अभियान और गायक किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध की याद दिलाई।
जस्टिस जगमोहन सिन्हा को अपना ऐतिहासिक फैसला लिखने के लिए 10 दिनों तक छिपकर रहना पड़ा था — भाजपा नेता ने इसे न्यायपालिका पर कांग्रेस के दबाव का उदाहरण बताया।

केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने 25 जून 1975 को स्वतंत्र भारत के इतिहास पर लगे सबसे काले धब्बों में से एक करार दिया। उन्होंने कहा कि इसी तारीख को लागू किए गए आपातकाल ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा, प्रेस पर सेंसरशिप थोपी और राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों तथा कार्यकर्ताओं को बिना किसी मुकदमे के जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया।

संविधान हत्या दिवस और भाजपा का संकल्प

भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस दिन को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मना रही है। इसी अवसर पर किशन रेड्डी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपने विचार साझा करते हुए लिखा, "जब हम 'संविधान हत्या दिवस' मना रहे हैं, तो हम उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि देते हैं, जिन्होंने हिम्मत के साथ तानाशाही का विरोध किया और लोकतंत्र व संविधान की रक्षा के लिए मजबूती से डटे रहे। उनके बलिदानों ने यह सुनिश्चित किया कि अभूतपूर्व चुनौतियों के बावजूद भारत की लोकतांत्रिक भावना बनी रहे।"

उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया, "आइए हम संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करने और उन आज़ादियों की हिफ़ाज़त करने के अपने अटूट संकल्प को दोहराएं, जो हमारे गणतंत्र की नींव हैं।"

बंदी संजय कुमार की तीखी प्रतिक्रिया

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बंदी संजय कुमार ने कहा कि सत्ता की भूख के चलते कांग्रेस पार्टी ने संविधान को कमजोर करने की साजिश रची। उन्होंने आपातकाल को "एक अघोषित तानाशाही" बताते हुए कहा कि इसने नागरिक अधिकारों को कुचला और असहमति की आवाज़ों को दबाया। संजय कुमार के अनुसार, "कांग्रेस द्वारा थोपे गए आपातकाल ने 'भारत माता' की आत्मा को बंधक बना लिया और लोकतंत्र का मजाक उड़ाया।" उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जान देने वाले नायकों के बलिदान को सम्मान देने का आह्वान किया।

जबरन नसबंदी और किशोर कुमार प्रकरण

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष एन. रामचंद्र राव ने एक्स पर पोस्ट करते हुए आपातकाल के दौरान हुए जबरन नसबंदी अभियान की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि सरकारी अधिकारियों को नसबंदी का कोटा पूरा करने का दबाव दिया गया था। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्कूल शिक्षकों को धमकी दी गई कि यदि उन्होंने एक निश्चित संख्या में लोगों को नसबंदी के लिए "प्रेरित" नहीं किया, तो उनका वेतन रोक दिया जाएगा।

इसी दौर में मशहूर गायक किशोर कुमार के गीतों पर रेडियो और टेलीविज़न पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। बताया जाता है कि किशोर कुमार ने यूथ कांग्रेस द्वारा संजय गांधी के नसबंदी अभियान के लिए धन जुटाने हेतु आयोजित 'गीतों भरी शाम' कार्यक्रम में गाने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद उनके गानों पर प्रतिबंध लगाया गया।

न्यायपालिका पर दबाव का ऐतिहासिक संदर्भ

रामचंद्र राव ने जस्टिस जगमोहन सिन्हा का उल्लेख करते हुए बताया कि जिन न्यायाधीश ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से अयोग्य ठहराने वाला ऐतिहासिक फैसला लिखा था, उन्हें प्रयागराज के एक कांग्रेस सांसद ने बेहद परेशान किया। उन्हें अपना फैसला लिखने के लिए दस दिनों तक छिपकर रहना पड़ा। राव के अनुसार, एक स्पेशल सीआईडी टास्क फोर्स ने उस फैसले को खोजने की कोशिश की और देर रात जस्टिस सिन्हा के सेक्रेटरी को धमकाया। उन्होंने कहा, "कांग्रेस इसी तरह संस्थाओं पर दबाव बनाती थी और आज वह बेशर्मी से संविधान की बात करती है।"

आपातकाल की यह बरसी उस दौर की याद दिलाती है जब भारतीय लोकतंत्र अपने सबसे कठिन दौर से गुज़रा था — और यह बहस आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इनका चयनात्मक उपयोग यह भी दर्शाता है कि सत्तारूढ़ दल संस्थागत स्वायत्तता की बात तब सबसे ज़ोर से करता है जब वह विपक्ष में हो। असली सवाल यह है कि क्या 'संविधान हत्या दिवस' महज़ स्मरण है या एक ऐसा राजनीतिक औज़ार जिसे हर चुनावी मौसम में धार दी जाती है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

25 जून 1975 को क्या हुआ था और आपातकाल क्यों लगाया गया था?
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल की घोषणा की थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके चुनाव को अवैध ठहराए जाने के बाद राजनीतिक संकट गहरा गया था, जिसके बाद यह कदम उठाया गया। इस दौरान मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और हज़ारों लोगों को बिना मुकदमे के जेल में डाला गया।
BJP 'संविधान हत्या दिवस' क्यों मनाती है?
भारतीय जनता पार्टी 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाती है ताकि 1975 के आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के कथित हनन को याद किया जा सके। पार्टी इसे कांग्रेस की तानाशाही प्रवृत्ति का प्रतीक मानती है और इस दिन को उन लोगों को श्रद्धांजलि देने के अवसर के रूप में देखती है जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया।
आपातकाल के दौरान किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध क्यों लगा था?
बताया जाता है कि मशहूर गायक किशोर कुमार ने यूथ कांग्रेस द्वारा संजय गांधी के नसबंदी अभियान के लिए आयोजित 'गीतों भरी शाम' कार्यक्रम में गाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद सरकार ने उनके गानों को रेडियो और टेलीविज़न पर प्रतिबंधित कर दिया, जो उस दौर में प्रेस और कलाकारों पर सेंसरशिप का एक प्रमुख उदाहरण बन गया।
जस्टिस जगमोहन सिन्हा कौन थे और उनका आपातकाल से क्या संबंध है?
जस्टिस जगमोहन सिन्हा वह न्यायाधीश थे जिन्होंने इंदिरा गांधी को 1971 के चुनाव में अनियमितताओं के आधार पर प्रधानमंत्री पद से अयोग्य ठहराने वाला ऐतिहासिक फैसला लिखा था। भाजपा नेताओं के अनुसार, उन्हें यह फैसला लिखने के लिए 10 दिनों तक छिपकर रहना पड़ा और एक स्पेशल सीआईडी टास्क फोर्स ने उनके सेक्रेटरी को देर रात धमकाया।
आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी अभियान कैसे चलाया गया था?
आपातकाल के दौरान सरकारी अधिकारियों को नसबंदी का कोटा पूरा करने का दबाव दिया गया था। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्कूल शिक्षकों को धमकी दी गई कि यदि वे एक निश्चित संख्या में लोगों को नसबंदी के लिए 'प्रेरित' नहीं करते, तो उनका वेतन रोक दिया जाएगा। यह अभियान आपातकाल के सबसे विवादास्पद और मानवाधिकार हनन के प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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