आपातकाल के 50 साल: राजनाथ सिंह बोले — '25 जून 1975 लोकतंत्र का सबसे काला दिन, संविधान को कुचलने की हुई थी कोशिश'
सारांश
मुख्य बातें
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 25 जून 2025 को 'संविधान हत्या दिवस' के अवसर पर कहा कि 1975 के आपातकाल के दौरान संविधान के मूल्यों और लोकतांत्रिक परंपराओं को जानबूझकर कमज़ोर करने के प्रयास किए गए थे। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि यह दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है जिसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए।
आपातकाल को 'संविधान हत्या दिवस' क्यों कहा जा रहा है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय के अनुसार 25 जून को अब 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में आधिकारिक रूप से स्मरण किया जाता है। राजनाथ सिंह ने इस संदर्भ में कहा कि यह कदम भावी पीढ़ियों को लोकतंत्र पर हुए उस प्रहार की याद दिलाने के लिए उठाया गया है, ताकि इतिहास की वह भूल दोहराई न जाए।
मौलिक अधिकारों का हनन और प्रेस की आज़ादी पर हमला
राजनाथ सिंह ने अपने पोस्ट में विस्तार से बताया कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सत्ता के अहंकार में कुचला गया। प्रेस की स्वतंत्रता पर पूरी तरह रोक लगाई गई और हजारों राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों तथा आम नागरिकों को बिना किसी ठोस कारण के जेलों में बंद कर दिया गया। असहमति की हर आवाज़ को दबाया गया।
लोकतंत्र के सेनानियों को श्रद्धांजलि
रक्षा मंत्री ने 'संविधान हत्या दिवस' पर उन सभी लोकतंत्र के सेनानियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया, जिन्होंने आपातकाल की तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया, यातनाएँ सहीं और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया। उन्होंने कहा, 'उनका साहस, त्याग और बलिदान हमें सदैव प्रेरित करता रहेगा।'
संविधान की रक्षा का संकल्प
राजनाथ सिंह ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि 'संविधान हमारे देश का सबसे पवित्र ग्रंथ तथा हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य की सुदृढ़ आधारशिला है, जिसकी रक्षा का दायित्व हम सभी का है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह दिन लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को फिर से दृढ़ करने का अवसर है।
राजनीतिक संदर्भ और आगे की राह
गौरतलब है कि 1975 का आपातकाल भारतीय राजनीति में आज भी एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय है। इस दिन को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच व्याख्याओं का अंतर बना रहता है। 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में इसे मान्यता देना सरकार का एक राजनीतिक और ऐतिहासिक संदेश माना जा रहा है। आने वाले समय में इस दिन को लेकर सार्वजनिक विमर्श और गहरा होने की संभावना है।