PM मोदी ने शेयर किया श्रीमद्भागवत का श्लोक: 'भय और पराधीनता से मुक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर श्रीमद्भागवत महापुराण का एक संस्कृत श्लोक साझा किया, जिसमें भय, पराधीनता और आत्मज्ञान के माध्यम से वास्तविक स्वतंत्रता का संदेश निहित है। यह श्लोक उद्धव गीता के 11वें स्कंध के 10वें अध्याय का 33वाँ श्लोक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण उद्धव को जीव की परतंत्रता और उससे उत्पन्न दुख-मोह के बारे में बोध देते हैं।
कौन-सा श्लोक साझा किया
मोदी द्वारा साझा किया गया संस्कृत श्लोक है — 'यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्। य एतत्समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिताः॥' इसका भावार्थ है कि जब तक मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र नहीं समझता, वह किसी न किसी प्रभुत्वशाली शक्ति के भय में जीता रहता है। जो इस विचार को स्वीकार कर लेते हैं, वे भय, दुख और भ्रम से घिरे रहते हैं।
श्लोक का आध्यात्मिक संदर्भ
यह श्लोक उद्धव गीता का अंग है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त उद्धव को जीव की आध्यात्मिक परतंत्रता का स्वरूप समझाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, मन और अहंकार के स्तर पर देखता है, वह प्रकृति के तीन गुणों — सत्व, रज और तम — के अधीन बना रहता है।
इस आध्यात्मिक परतंत्रता में व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों और अपने कर्मों का दास बन जाता है। जो स्वयं को कर्ता मानता है और संसार के द्वंद्वों — सुख-दुख, लाभ-हानि — में उलझा रहता है, वह निरंतर 'काल' के भय से ग्रस्त रहता है।
मोदी का संदेश
प्रधानमंत्री ने इस श्लोक को साझा करते हुए संदेश दिया कि वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि भय और पराधीनता से मुक्त होकर आत्मविश्वास के साथ जीवन जीने की क्षमता में है। श्रीकृष्ण के अनुसार, जो लोग इस अनित्य संसार और शारीरिक पहचान को ही अपना सर्वस्व मान लेते हैं, वे कभी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाते।
श्लोक का मूल संदेश
भागवत के इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जीव जब तक अपने वास्तविक स्वरूप — आत्मा — को भूलकर माया के अधीन रहता है, वह दुखी ही रहेगा। वास्तविक स्वतंत्रता और निर्भयता केवल आत्मज्ञान या ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से ही सम्भव है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर सोशल मीडिया पर ऐसे दार्शनिक और आध्यात्मिक उद्धरण साझा करते रहे हैं, जो सनातन परम्परा की गहराई को आम जनता तक पहुँचाते हैं।