PM मोदी ने एक्स पर साझा किया गीता का श्लोक, बोले — सत्य और प्रिय वाणी ही समाज में शांति और सद्भाव का आधार
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक सुभाषित साझा करते हुए कहा कि विचारपूर्वक बोली गई वाणी समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करती है। इस पोस्ट में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 15वें श्लोक को उद्धृत कर नागरिकों को वाणी की तपस्या का संदेश दिया।
कौन-सा श्लोक साझा किया गया
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पोस्ट में संस्कृत श्लोक — 'अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥' — उद्धृत किया। यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए उपदेश का हिस्सा है, जिसमें 'वाङ्मय तप' अर्थात् वाणी की तपस्या का वर्णन है।
श्लोक का हिंदी भावार्थ यह है कि जो वाणी किसी के मन में उद्वेग या मानसिक कष्ट उत्पन्न न करे, जो सत्य हो, सुनने में प्रिय हो और हितकारी हो — तथा जो वेदों व शास्त्रों के नियमित स्वाध्याय और अभ्यास से संपन्न हो — उसे ही वाणी का सच्चा तप कहा जाता है।
श्लोक का व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि श्रीमद्भगवद्गीता का 17वाँ अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, जिसमें शरीर, वाणी और मन — तीनों स्तरों पर तप की व्याख्या की गई है। वाणी की तपस्या को इस अध्याय में एक स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण साधना के रूप में स्थापित किया गया है।
इस श्लोक का सार यह है कि केवल शारीरिक कष्ट उठाना ही तप नहीं है — हमारे शब्दों में भी असाधारण ऊर्जा होती है। शब्द किसी को आहत कर सकते हैं या उसे संवार सकते हैं। इसलिए बिना अहंकार के, प्रेम और सत्य से भरी वाणी का प्रयोग करना तथा स्वयं को ज्ञान से जोड़ना ही वाणी का सर्वोच्च तप है।
पीएम मोदी का संदेश
प्रधानमंत्री ने पोस्ट के माध्यम से संदेश दिया कि मनुष्य को सदैव ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो और किसी के मन में अशांति उत्पन्न न करे। उन्होंने यह भी कहा कि सद्ग्रंथों का निरंतर स्वाध्याय और चिंतन ही वाणी को वास्तविक सार्थकता प्रदान करता है।
यह ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर वैमनस्य और अपशब्दों को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री का यह सुभाषित-संदेश एक सांस्कृतिक और नैतिक सुझाव के रूप में देखा जा रहा है।
आम जनता पर असर
प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर भारतीय दर्शन, वेद और उपनिषदों के श्लोक अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में साझा करते रहे हैं। इस तरह की पोस्टें व्यापक रूप से साझा होती हैं और लाखों अनुयायियों तक प्राचीन ज्ञान को सुलभ रूप में पहुँचाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति इस प्रकार के सांस्कृतिक संदेश देते हैं, तो उनका सामाजिक प्रभाव व्यापक होता है — विशेषकर युवाओं और डिजिटल उपयोगकर्ताओं पर। आने वाले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि क्या यह संदेश किसी व्यापक नीतिगत या सामाजिक पहल की पूर्वपीठिका बनता है।