24 सितंबर 2026
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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया गीता का श्लोक, बोले — सत्य और प्रिय वाणी ही समाज में शांति और सद्भाव का आधार

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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया गीता का श्लोक, बोले — सत्य और प्रिय वाणी ही समाज में शांति और सद्भाव का आधार

सारांश

प्रधानमंत्री मोदी ने 24 सितंबर को एक्स पर गीता के 'वाङ्मय तप' श्लोक से यह संदेश दिया कि सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी ही समाज में शांति और सकारात्मकता का आधार है — एक ऐसे दौर में जब सोशल मीडिया पर वैमनस्य की चर्चा जोरों पर है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 24 सितंबर 2026 को एक्स पर श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का 15वाँ श्लोक साझा किया।
श्लोक 'अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्…' में वाङ्मय तप अर्थात् वाणी की तपस्या का वर्णन है।
संदेश का सार — सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी तथा शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय ही वाणी का सर्वोच्च तप है।
विचारपूर्वक बोली गई वाणी समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करती है।
यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वैमनस्य को लेकर चल रही बहस के बीच आई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक सुभाषित साझा करते हुए कहा कि विचारपूर्वक बोली गई वाणी समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करती है। इस पोस्ट में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 15वें श्लोक को उद्धृत कर नागरिकों को वाणी की तपस्या का संदेश दिया।

कौन-सा श्लोक साझा किया गया

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पोस्ट में संस्कृत श्लोक — 'अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥' — उद्धृत किया। यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए उपदेश का हिस्सा है, जिसमें 'वाङ्मय तप' अर्थात् वाणी की तपस्या का वर्णन है।

श्लोक का हिंदी भावार्थ यह है कि जो वाणी किसी के मन में उद्वेग या मानसिक कष्ट उत्पन्न न करे, जो सत्य हो, सुनने में प्रिय हो और हितकारी हो — तथा जो वेदों व शास्त्रों के नियमित स्वाध्याय और अभ्यास से संपन्न हो — उसे ही वाणी का सच्चा तप कहा जाता है।

श्लोक का व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि श्रीमद्भगवद्गीता का 17वाँ अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, जिसमें शरीर, वाणी और मन — तीनों स्तरों पर तप की व्याख्या की गई है। वाणी की तपस्या को इस अध्याय में एक स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण साधना के रूप में स्थापित किया गया है।

इस श्लोक का सार यह है कि केवल शारीरिक कष्ट उठाना ही तप नहीं है — हमारे शब्दों में भी असाधारण ऊर्जा होती है। शब्द किसी को आहत कर सकते हैं या उसे संवार सकते हैं। इसलिए बिना अहंकार के, प्रेम और सत्य से भरी वाणी का प्रयोग करना तथा स्वयं को ज्ञान से जोड़ना ही वाणी का सर्वोच्च तप है।

पीएम मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री ने पोस्ट के माध्यम से संदेश दिया कि मनुष्य को सदैव ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो और किसी के मन में अशांति उत्पन्न न करे। उन्होंने यह भी कहा कि सद्ग्रंथों का निरंतर स्वाध्याय और चिंतन ही वाणी को वास्तविक सार्थकता प्रदान करता है।

यह ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर वैमनस्य और अपशब्दों को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री का यह सुभाषित-संदेश एक सांस्कृतिक और नैतिक सुझाव के रूप में देखा जा रहा है।

आम जनता पर असर

प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर भारतीय दर्शन, वेद और उपनिषदों के श्लोक अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में साझा करते रहे हैं। इस तरह की पोस्टें व्यापक रूप से साझा होती हैं और लाखों अनुयायियों तक प्राचीन ज्ञान को सुलभ रूप में पहुँचाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति इस प्रकार के सांस्कृतिक संदेश देते हैं, तो उनका सामाजिक प्रभाव व्यापक होता है — विशेषकर युवाओं और डिजिटल उपयोगकर्ताओं पर। आने वाले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि क्या यह संदेश किसी व्यापक नीतिगत या सामाजिक पहल की पूर्वपीठिका बनता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे किसी ठोस नीतिगत कदम से नहीं जोड़ा गया। प्रश्न यह है कि क्या ये प्रेरणादायक संदेश किसी व्यापक डिजिटल शिष्टाचार नीति या सोशल मीडिया नियमन की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं — या ये केवल सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन हैं। दोनों में अंतर महत्त्वपूर्ण है।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने 24 सितंबर को एक्स पर कौन-सा श्लोक साझा किया?
PM मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का 15वाँ श्लोक — 'अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥' — साझा किया। इस श्लोक में वाणी की तपस्या (वाङ्मय तप) का वर्णन है।
वाङ्मय तप का क्या अर्थ है?
वाङ्मय तप का अर्थ है वाणी की तपस्या — अर्थात् ऐसी वाणी बोलना जो किसी को मानसिक कष्ट न दे, सत्य हो, सुनने में प्रिय हो और हितकारी हो। इसके साथ वेदों व शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय करना भी इसका अंग है।
गीता के 17वें अध्याय का 15वाँ श्लोक किस विषय में है?
यह श्लोक 'श्रद्धात्रयविभागयोग' अध्याय का हिस्सा है, जिसमें तीन प्रकार के तप — शारीरिक, वाचिक और मानसिक — की व्याख्या की गई है। 15वाँ श्लोक विशेष रूप से वाणी के तप को परिभाषित करता है।
PM मोदी के इस संदेश का सामाजिक महत्त्व क्या है?
यह पोस्ट ऐसे समय में आई जब सोशल मीडिया पर वैमनस्यपूर्ण भाषा को लेकर व्यापक बहस चल रही है। प्रधानमंत्री के स्तर से इस प्रकार का सांस्कृतिक संदेश लाखों अनुयायियों तक पहुँचता है और सकारात्मक संवाद को प्रोत्साहित करता है।
क्या PM मोदी पहले भी इस तरह के श्लोक साझा करते रहे हैं?
हाँ, प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद और गीता के श्लोक अपनी सोशल मीडिया पोस्टों में साझा करते रहे हैं। यह उनकी संचार-शैली का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है।
राष्ट्र प्रेस
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