16 अक्टूबर 2026
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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर: मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर: मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

सारांश

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन शुक्ल षष्ठी पर भस्म आरती का अलौकिक आयोजन हुआ। मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सुसज्जित बाबा महाकाल ने निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन दिए और मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गूँज उठा।

मुख्य बातें

16 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि पर उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का आयोजन हुआ।
बाबा महाकाल को मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सुसज्जित कर दिव्य शृंगार किया गया।
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म आरती अर्पित की गई।
भस्म आरती के बाद बाबा महाकाल ने निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन दिए — यही इस आरती की मूल मान्यता है।
रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध होकर उज्जैन पहुँचे और दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 16 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि पर भस्म आरती का अलौकिक आयोजन हुआ, जिसमें बाबा महाकाल को मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सुसज्जित कर निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन दिए गए। इस दिव्य दर्शन के लिए रात से ही श्रद्धालु कतारबद्ध होकर मंदिर परिसर में प्रतीक्षारत थे।

कपाट खुलने की परंपरागत प्रक्रिया

शुक्रवार की तड़के सबसे पहले भगवान वीरभद्र से आज्ञा ली गई, जिसके पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट विधिवत खोले गए। कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। यह पूरी प्रक्रिया सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप निष्पादित की गई।

दिव्य शृंगार और भस्म आरती

पूजा के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के पश्चात बाबा ने मुकुट धारण किया। इसके बाद झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मधुर ध्वनियों के बीच भस्म आरती का आयोजन हुआ। परंपरा के अनुसार यह भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से अर्पित की जाती है।

निराकार से साकार रूप में दर्शन

मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से सुसज्जित बाबा के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पाकर भक्त भाव-विभोर हो उठे। दर्शन के पश्चात पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।

आम जनता पर असर

घंटियों की टनकार, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से भरे इस पावन वातावरण में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भस्म आरती के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया। बाबा महाकाल की इस आरती में सम्मिलित होने के लिए देश के कोने-कोने से भक्त उज्जैन की पावन नगरी पहुँचते हैं। यह आयोजन न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि उज्जैन को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन गंतव्यों में से एक बनाता है।

आगे के आयोजन

आश्विन माह की विशेष तिथियों पर महाकालेश्वर मंदिर में इस प्रकार के दिव्य आयोजन निरंतर जारी रहते हैं। श्रद्धालुओं का आगमन आने वाले दिनों में भी बना रहने की संभावना है, क्योंकि शरद नवरात्रि का पर्व पास होने के कारण उज्जैन में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। शरद नवरात्रि के निकट आने पर इस आयोजन में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है, जो उज्जैन को मध्य भारत के सर्वाधिक सक्रिय धार्मिक-पर्यटन केंद्रों में से एक बनाती है। महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा संचालित यह परंपरा भारतीय मठ-परंपरा और मंदिर प्रशासन के सहजीवन का अनूठा उदाहरण है, जो सदियों से अटूट बनी हुई है।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाली एक विशेष पूजा है, जिसमें महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
16 अक्टूबर 2026 को महाकाल भस्म आरती में क्या विशेष था?
इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि के अवसर पर बाबा महाकाल को मुकुट, रजत चंद्र और त्रिशूल से विशेष रूप से सुसज्जित किया गया। जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक के बाद भस्म आरती संपन्न हुई और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस दिव्य दर्शन का लाभ उठाया।
महाकाल भस्म आरती में कौन सी परंपरा का पालन किया जाता है?
परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान वीरभद्र से आज्ञा ली जाती है, फिर ढोल-नगाड़ों के साथ कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक, घंटाल, कपूर आरती और अंत में महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म आरती संपन्न होती है।
महाकालेश्वर भस्म आरती के दर्शन के लिए कब जाएँ?
भस्म आरती प्रतिदिन तड़के होती है और विशेष हिंदू तिथियों तथा पर्वों पर इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। आश्विन माह में शरद नवरात्रि के निकट श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से अधिक रहती है, इसलिए दर्शन के इच्छुक भक्तों को रात से ही कतार में शामिल होने की सलाह दी जाती है।
उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर का धार्मिक महत्व क्या है?
महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और उज्जैन की पावन नगरी में स्थित है। यह मंदिर शैव परंपरा का एक प्रमुख केंद्र है और प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ भस्म आरती के दर्शन के लिए देश-विदेश से आते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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