उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ नवमी पर भस्म आरती, रजत चंद्र-त्रिशूल से राजा स्वरूप में हुआ शृंगार
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी, मंगलवार 23 जून को बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। रजत चंद्र, त्रिशूल, त्रिपुण्ड और ड्रायफ्रूट से राजा स्वरूप में सुसज्जित बाबा के दर्शन के लिए श्रद्धालु देर रात से ही पंक्तिबद्ध होकर खड़े रहे। 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठा।
कपाट खुलने की परंपरा और अभिषेक विधि
मंगलवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच बाबा महाकाल के कपाट विधिपूर्वक खोले गए। कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के साथ जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। घंटियों की ध्वनि और शंखनाद से पूरा परिसर आस्था के वातावरण में डूब गया।
राजा स्वरूप में दिव्य शृंगार
अभिषेक के उपरांत भगवान महाकाल का रजत चंद्र, त्रिशूल, त्रिपुण्ड और चुनिंदा ड्रायफ्रूट से राजा स्वरूप में विशेष शृंगार किया गया। मंदिर के पुजारियों ने महाआरती संपन्न कराई, जिसके बाद श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
भस्म आरती की परंपरा और नियम
मंदिर सूत्रों के अनुसार, पूर्व में महाकाल को शमशान की राख अर्पित की जाती थी, किंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर एवं औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी धारण करना अनिवार्य है — यह परंपरा मंदिर की पवित्रता और अनुशासन को बनाए रखती है।
देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु
बाबा महाकाल की भस्म आरती की ख्याति देश की सीमाओं से परे है। यहाँ आम श्रद्धालुओं से लेकर विशिष्ट हस्तियाँ तक दर्शन के लिए उपस्थित होती हैं। भीड़ प्रबंधन और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए मंदिर परिसर के आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है। यह आयोजन मध्य प्रदेश की धार्मिक पर्यटन पहचान का अभिन्न अंग बन चुका है।