30 अक्टूबर 2026
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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर: रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

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उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर: रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में उमड़े श्रद्धालु

सारांश

कार्तिक कृष्ण पंचमी पर उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से सुसज्जित हुए। महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा संपन्न भस्म आरती में देशभर से उमड़े श्रद्धालु इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कर भाव विभोर हो गए।

मुख्य बातें

30 अक्टूबर 2026 को कार्तिक कृष्ण पक्ष पंचमी पर श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल को रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से विशेष रूप से सजाया गया।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा अनुसार भस्म आरती अर्पित की गई; मान्यता है कि इसके बाद बाबा निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं।
जलाभिषेक के बाद पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस — से अभिषेक किया गया।
रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध रहे; मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गूंज उठा।

उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 30 अक्टूबर 2026 को कार्तिक कृष्ण पक्ष पंचमी की पावन तिथि पर बाबा महाकाल की भस्म आरती अत्यंत दिव्य एवं भव्य रूप में संपन्न हुई। रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से सुसज्जित बाबा महाकाल के अद्भुत स्वरूप के दर्शन पाकर श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे।

मंदिर के पट खुलने का क्रम

शुक्रवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ बाबा महाकाल के कपाट विधिवत खोले गए। कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से भगवान का अभिषेक संपन्न हुआ। प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया, और कपूर की आरती के बाद बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया।

भस्म आरती का दिव्य क्षण

परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मधुर ध्वनि के बीच यह आरती संपन्न हुई, जिससे समूचा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

श्रद्धालुओं की उपस्थिति

बाबा महाकाल की इस अलौकिक भस्म आरती में शामिल होने के लिए रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन की पावन नगरी में पहुँचे और कतारबद्ध होकर दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से विभूषित बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन पाकर भक्त भाव विभोर हो गए और खुद को धन्य महसूस किया।

धार्मिक महत्व एवं परंपरा

महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहाँ की भस्म आरती देश की सबसे विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में गिनी जाती है। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान मंदिर परिसर ने उपस्थित श्रद्धालुओं को एक अलौकिक अनुभव प्रदान किया। गौरतलब है कि कार्तिक माह की विशेष तिथियों पर यहाँ की आरती और श्रृंगार का विशेष महत्व माना जाता है, जो देश के कोने-कोने से भक्तों को उज्जैन खींच लाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र-बिंदु है — जो प्रतिदिन लाखों भक्तों को डिजिटल युग में भी मंदिर के प्रांगण तक खींचती है। कार्तिक माह की विशेष तिथियों पर यहाँ की आस्था और उमड़ने वाली भीड़ यह सिद्ध करती है कि धार्मिक पर्यटन भारत में एक अटूट सामाजिक शक्ति है। गौरतलब है कि महाकाल लोक परियोजना के विस्तार के बाद से यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो आस्था और बुनियादी ढाँचे के समन्वय का एक सफल उदाहरण है।
RashtraPress
30 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाला एक अनूठा और प्राचीन अनुष्ठान है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। परंपरा के अनुसार, भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।
30 अक्टूबर 2026 को महाकाल का विशेष श्रृंगार कैसा था?
कार्तिक कृष्ण पक्ष पंचमी पर बाबा महाकाल को रजत चंद्र-त्रिशूल और मुकुट से सजाया गया। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पाकर उपस्थित सभी श्रद्धालु भाव विभोर हो गए।
भस्म आरती का अनुष्ठान कौन संपन्न करता है?
महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से परंपरागत रूप से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। यह परंपरा सदियों से अनवरत चली आ रही है और इसे देश की सबसे विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है।
महाकाल भस्म आरती में किस प्रकार का अभिषेक किया जाता है?
मंदिर के कपाट खुलने के बाद सर्वप्रथम जलाभिषेक किया जाता है, इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक होता है। फिर कपूर की आरती और घंटाल के साथ हरिओम जल अर्पित किया जाता है।
उज्जैन महाकाल दर्शन के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा है?
भस्म आरती तड़के होती है और इसके लिए श्रद्धालु रात से ही कतारबद्ध होते हैं। कार्तिक माह की विशेष तिथियों — जैसे पंचमी — पर यहाँ का श्रृंगार और आरती विशेष रूप से भव्य होती है, इसलिए इन तिथियों पर दर्शन को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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